• February 12, 2026

ऐतिहासिक कानूनी संग्राम: सुप्रीम कोर्ट में आज वकील की भूमिका में दिख सकती हैं ममता बनर्जी, खुद करेंगी केस की पैरवी

नई दिल्ली: भारत के न्यायिक और राजनीतिक इतिहास में आज एक ऐतिहासिक अध्याय जुड़ने जा रहा है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी आज एक बिल्कुल नई और साहसिक भूमिका में नजर आ सकती हैं। देश की राजधानी में स्थित सुप्रीम कोर्ट के गलियारों में आज सबकी निगाहें मुख्यमंत्री बनर्जी पर टिकी होंगी, क्योंकि वे न केवल एक याचिकाकर्ता के रूप में बल्कि संभवतः एक अधिवक्ता के तौर पर अपनी बात स्वयं शीर्ष अदालत के सामने रख सकती हैं। यदि उन्हें अनुमति मिलती है, तो वे भारत के इतिहास में सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष किसी मुकदमे की पैरवी स्वयं करने वाली पहली मौजूदा मुख्यमंत्री बन जाएंगी। यह पूरा मामला पश्चिम बंगाल में निर्वाचन आयोग द्वारा चलाए जा रहे ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ यानी एसआईआर प्रक्रिया से जुड़ा है, जिसे लेकर राज्य सरकार और तृणमूल कांग्रेस ने कड़ा रुख अपनाया है।

आज बुधवार को होने वाली इस सुनवाई का केंद्र पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपनी कानूनी टीम के माध्यम से भारत के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष एक अंतरिम आवेदन दायर किया है। इस आवेदन में उन्होंने एक प्रशिक्षित अधिवक्ता के रूप में खुद जिरह करने की अनुमति मांगी है। ममता बनर्जी का तर्क है कि यह मुद्दा सीधे तौर पर राज्य के लाखों नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों और उनके वोट देने की शक्ति से जुड़ा है, इसलिए वे खुद कोर्ट को जमीनी वास्तविकताओं से अवगत कराना चाहती हैं। पश्चिम बंगाल की राजनीति में यह पल बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि एक मुख्यमंत्री का सीधे अदालत में जिरह करना संवैधानिक मर्यादा और सक्रियता के एक नए संतुलन को पेश करेगा।

मुख्यमंत्री की इस कानूनी लड़ाई का मुख्य आधार भारत निर्वाचन आयोग द्वारा वर्ष 2025 में जारी किए गए कुछ विशिष्ट आदेश हैं। ममता बनर्जी ने अपनी याचिका में चुनाव आयोग द्वारा 24 जून, 2025 और 27 अक्तूबर, 2025 को जारी किए गए एसआईआर संबंधी सभी आदेशों और निर्देशों को तत्काल प्रभाव से रद्द करने की मांग की है। बनर्जी का कहना है कि वर्तमान में अपनाई जा रही एसआईआर प्रक्रिया साल 2002 की आधारभूत मतदाता सूची पर निर्भर है। उनके अनुसार, दो दशक से भी अधिक पुरानी सूची को आधार मानकर सत्यापन करना न केवल अव्यावहारिक है, बल्कि यह बेहद कठिन भी है। उनका आरोप है कि इस जटिल सत्यापन प्रक्रिया के कारण लाखों वास्तविक और वैध मतदाताओं के नाम कटने का खतरा पैदा हो गया है, जो सीधे तौर पर संविधान प्रदत्त मताधिकार का उल्लंघन है।

इस मामले की गंभीरता को देखते हुए मुख्यमंत्री ने सुप्रीम कोर्ट से ‘परमादेश’ की भी मांग की है। उन्होंने अपनी याचिका में शीर्ष अदालत से यह निर्देश देने का अनुरोध किया है कि पश्चिम बंगाल में आगामी विधानसभा चुनाव बिना किसी बदलाव के वर्ष 2025 की मौजूदा मतदाता सूची के आधार पर ही कराए जाएं। ममता बनर्जी का पक्ष है कि चुनाव आयोग की नई पुनरीक्षण प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है और इससे चुनावी प्रक्रिया की शुचिता प्रभावित हो सकती है। टीएमसी नेतृत्व का कहना है कि जिस तरह से एसआईआर के तहत नोटिस भेजे जा रहे हैं और सत्यापन के नाम पर लोगों को परेशान किया जा रहा है, वह लोकतंत्र के लिए एक स्वस्थ संकेत नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट और कार्यसूची के अनुसार, इस महत्वपूर्ण विषय पर सुनवाई के लिए एक विशेष पीठ का गठन किया गया है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की खंडपीठ आज इन याचिकाओं पर विचार करेगी। इस सुनवाई के दौरान न केवल मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की व्यक्तिगत याचिका, बल्कि तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ सांसदों डेरेक ओ’ब्रायन और डोला सेन द्वारा दायर की गई याचिकाओं पर भी विस्तार से चर्चा होगी। इसके साथ ही मोस्तरी बानू की याचिका को भी इसी समूह में शामिल किया गया है। यह पूरा कानूनी घटनाक्रम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें चुनावी मशीनरी की कार्यप्रणाली और राज्य सरकार के क्षेत्राधिकार के बीच एक स्पष्ट टकराव दिखाई दे रहा है।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि ममता बनर्जी का स्वयं जिरह करने का निर्णय एक बड़ा राजनीतिक दांव भी हो सकता है। एक ओर जहाँ वे खुद को राज्य के लोगों के ‘अधिकारों के रक्षक’ के रूप में पेश कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर वे सीधे तौर पर चुनाव आयोग की स्वायत्तता और उसके निर्णयों को चुनौती दे रही हैं। निर्वाचन आयोग का कहना रहा है कि एसआईआर प्रक्रिया केवल त्रुटिमुक्त मतदाता सूची सुनिश्चित करने के लिए है, ताकि फर्जी मतदान को रोका जा सके। लेकिन मुख्यमंत्री का दावा है कि इसकी आड़ में विपक्षी दलों के प्रभाव वाले क्षेत्रों के मतदाताओं को निशाना बनाया जा रहा है।

आज की सुनवाई के दौरान कोर्ट रूम में सुरक्षा और प्रोटोकॉल के विशेष इंतजाम किए गए हैं। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पहले ही दिल्ली पहुंच चुकी हैं और उन्होंने अपने वकीलों की टीम के साथ लंबी चर्चा की है। यदि सुप्रीम कोर्ट आज उन्हें अपनी बात रखने की अनुमति देता है, तो यह देखना दिलचस्प होगा कि वह अपनी दलीलों में कौन से संवैधानिक प्रावधानों और तथ्यों का उल्लेख करती हैं। विपक्षी दलों की नजरें भी इस सुनवाई पर हैं, क्योंकि मतदाता सूची का यह विवाद बंगाल के भविष्य के चुनावी नतीजों पर गहरा असर डाल सकता है।

पूरी याचिका में मुख्यमंत्री ने इस बात पर जोर दिया है कि किसी भी नागरिक को उसकी नागरिकता या पहचान के संदेह के नाम पर मताधिकार से वंचित करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध है। उन्होंने एसआईआर के तहत अपनाए जा रहे तरीकों को ‘कठोर’ और ‘भयभीत करने वाला’ बताया है। अब गेंद सुप्रीम कोर्ट के पाले में है। क्या अदालत मुख्यमंत्री को खुद बहस करने की इजाजत देगी? क्या चुनाव आयोग के 2025 के आदेशों पर रोक लगेगी? इन सभी सवालों के जवाब आज दोपहर तक मिलने की उम्मीद है। फिलहाल, पूरा पश्चिम बंगाल और देश के कानूनी हलके इस ऐतिहासिक सुनवाई के साक्षी बनने के लिए तैयार हैं।

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