उत्तर भारत का सुरक्षा कवच खतरे में: अरावली के विनाश से रेगिस्तान बनने की ओर बढ़ रहा है दिल्ली-एनसीआर
उत्तर भारत की भौगोलिक संरचना में अरावली पर्वत श्रृंखला का स्थान किसी मूक प्रहरी जैसा है। दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत श्रेणियों में शुमार अरावली महज पत्थरों का ढेर नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों के लिए जीवनदायिनी और जलवायु का संतुलन बनाए रखने वाला एक प्राकृतिक सुरक्षा कवच है। हालांकि, हाल ही में आई ‘संकला फाउंडेशन’ की एक विस्तृत रिपोर्ट ने इस कवच के तेजी से कमजोर होने की चेतावनी दी है। रिपोर्ट के अनुसार, मानवीय हस्तक्षेप, अवैध खनन और अनियंत्रित शहरीकरण ने अरावली के अस्तित्व पर संकट पैदा कर दिया है, जिसका सीधा खामियाजा दिल्ली-एनसीआर सहित पूरे गंगा के मैदानी इलाकों को भुगतना पड़ सकता है।
प्राकृतिक रक्षा दीवार पर मानवीय प्रहार
अरावली पर्वत श्रृंखला राजस्थान के रेगिस्तान को दिल्ली और उत्तर भारत की उपजाऊ जमीन की ओर बढ़ने से रोकने के लिए एक ‘ग्रीन बैरियर’ के रूप में काम करती है। लेकिन संकला फाउंडेशन की ‘अरावली लैंडस्केप का इको-रेस्टोरेशन’ नामक स्टडी बताती है कि यह बैरियर अब जर्जर हो चुका है। रिपोर्ट के अनुसार, 1980 के दशक के बाद से अरावली के प्रति मानवीय दृष्टिकोण में भारी बदलाव आया। सरिस्का और बरडोद वन्यजीव अभयारण्यों जैसे संवेदनशील क्षेत्रों के आसपास बड़े पैमाने पर वन भूमि का डायवर्जन किया गया। जंगलों को काटकर वहां कंक्रीट के जंगल खड़े कर दिए गए या अवैध रूप से जमीन पर कब्जा कर लिया गया। इस वजह से न केवल हरियाली कम हुई, बल्कि अरावली का पूरा इकोसिस्टम ही बिखर गया है।
रिपोर्ट में बड़े खतरों का खुलासा
केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव द्वारा जारी की गई इस रिपोर्ट में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। अरावली का विस्तार भारत के चार राज्यों के 29 जिलों तक है, जहां लगभग पांच करोड़ से अधिक आबादी निवास करती है। रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि अवैध खनन और जंगलों की कटाई ने पहाड़ों की उस श्रृंखला को तोड़ दिया है जो धूल भरी हवाओं और बढ़ते तापमान को रोकने का काम करती थी। जब पहाड़ ही नहीं रहेंगे और उन पर मौजूद जंगल खत्म हो जाएंगे, तो भूजल रिचार्ज की प्रक्रिया पूरी तरह ठप हो जाएगी। वर्तमान में अरावली क्षेत्र के कई हिस्सों में जल स्तर इतनी तेजी से नीचे गया है कि आने वाले समय में यहां पीने के पानी का भीषण अकाल पड़ सकता है।
जैव विविधता पर विदेशी प्रजातियों का कब्जा
संकला फाउंडेशन की स्टडी, जिसे डेनमार्क दूतावास और हरियाणा वन विभाग के सहयोग से तैयार किया गया है, एक और गंभीर खतरे की ओर इशारा करती है। अध्ययन में पाया गया कि जंगलों के छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटने से वहां के स्थानीय वन्यजीवों का ठिकाना छीन गया है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि अरावली के मूल देसी पेड़-पौधों की जगह अब ‘विलायती कीकर’, ‘लैंटाना’ और ‘गाजर घास’ जैसी आक्रामक विदेशी प्रजातियों ने ले ली है। ये पौधे जमीन से अधिक पानी सोखते हैं और स्थानीय वनस्पतियों को पनपने नहीं देते। इससे अरावली की प्राकृतिक जैव विविधता नष्ट हो रही है और पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ रहा है।
ग्रामीण आजीविका और जल संकट का गहरा संबंध
अरावली के आसपास बसे गांवों का जीवन पूरी तरह से इन पहाड़ों और जंगलों पर निर्भर है। स्टडी के दौरान गुरुग्राम के चार गांवों का गहराई से विश्लेषण किया गया, जहाँ पाया गया कि करीब 43 प्रतिशत परिवार आज भी लकड़ी, चारे और औषधीय पौधों के लिए अरावली के जंगलों पर ही निर्भर हैं। इन संसाधनों को जुटाने में महिलाओं की भूमिका सबसे प्रमुख है, लेकिन जंगलों के खत्म होने से उनके सामने आजीविका का संकट खड़ा हो गया है। इसके अलावा, ये ग्रामीण पूरी तरह से खेती के लिए भूजल पर निर्भर हैं। जैसे-जैसे जंगलों की कटाई हो रही है, बारिश का पानी जमीन के भीतर जाने के बजाय बह जा रहा है, जिससे कुएं और बोरवेल सूख रहे हैं।
जलवायु परिवर्तन और अनियमित मौसम की चुनौती
अरावली क्षेत्र अब ‘अर्ध-शुष्क’ से ‘शुष्क’ की श्रेणी में जाने की कगार पर है। रिपोर्ट के मुताबिक, इस इलाके में तापमान में निरंतर वृद्धि दर्ज की जा रही है और बारिश का चक्र पूरी तरह अनियमित हो गया है। कभी बहुत कम समय में अत्यधिक बारिश हो जाती है जिससे मिट्टी का कटाव होता है, तो कभी महीनों तक सूखा रहता है। ऐसी चुनौतीपूर्ण स्थिति में अरावली के जंगलों को फिर से जीवित करना न केवल जरूरी है बल्कि एक बड़ी वैज्ञानिक चुनौती भी है। पर्यावरणविदों का मानना है कि यदि अब भी कड़े कदम नहीं उठाए गए, तो दिल्ली-एनसीआर में हवा की गुणवत्ता और अधिक खराब होगी और रेगिस्तान का विस्तार सीधे तौर पर शहरी इलाकों तक पहुँच जाएगा।
समाधान: इको-रेस्टोरेशन का प्रस्तावित मॉडल
संकला फाउंडेशन ने केवल समस्याओं को ही उजागर नहीं किया है, बल्कि सुधार के लिए एक व्यावहारिक मॉडल भी सुझाया है। इस मॉडल के तहत गुरुग्राम के चार गांवों में एक पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया गया है। इसमें वैज्ञानिक आंकड़ों और तकनीक के साथ-साथ स्थानीय समुदाय की भागीदारी को सबसे ऊपर रखा गया है। इको-रेस्टोरेशन मॉडल के तीन मुख्य चरण प्रस्तावित किए गए हैं: पहला, जमीन और मौजूदा वनस्पतियों की गहन जांच। दूसरा, स्थानीय जलवायु के अनुकूल देसी प्रजातियों के पौधों का रोपण और जल संचयन के ढांचे तैयार करना। तीसरा, लंबे समय तक इसकी निगरानी करना और इसे सरकारी नीतियों के साथ जोड़ना।
केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव ने इस बात पर जोर दिया है कि अरावली को बचाने के लिए अब केवल सरकारी प्रयास काफी नहीं होंगे। इसमें जनभागीदारी और उद्योगों के साथ-साथ कड़े कानूनी प्रावधानों की भी आवश्यकता है। संकला फाउंडेशन का यह मॉडल यदि सफल रहता है, तो इसे अरावली के अन्य शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में भी लागू किया जा सकता है। अरावली का पुनरुद्धार केवल पर्यावरण संरक्षण का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह करोड़ों लोगों के मानवाधिकार और उनके सुरक्षित भविष्य से जुड़ा सवाल है।