भारतीय क्रिकेट में ‘गंभीर’ संकट: उपलब्धियों की ओट में छिपते ऐतिहासिक हार के जख्म और टूटता घरेलू वर्चस्व
नई दिल्ली: भारतीय क्रिकेट इतिहास में पिछले एक दशक को स्वर्णिम युग के रूप में देखा गया, जहां टीम इंडिया ने न केवल दो आईसीसी ट्रॉफियां जीतीं, बल्कि दुनिया के हर कोने में अपनी धाक जमाई। लेकिन वर्तमान में ‘गौतम गंभीर युग’ के दौरान भारतीय क्रिकेट एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है, जहां उपलब्धियों से कहीं ज्यादा हार के अनचाहे रिकॉर्ड शोर मचा रहे हैं। गंभीर के मुख्य कोच बनने के बाद से टीम इंडिया ने चैंपियंस ट्रॉफी जीतकर सफलता का स्वाद तो चखा, लेकिन टेस्ट और वनडे प्रारूप में टीम का प्रदर्शन इस कदर गिरा है कि अब प्रशंसकों और विशेषज्ञों के बीच बेचैनी का माहौल है। विशेष रूप से घरेलू सरजमीं पर न्यूजीलैंड के खिलाफ मिली हालिया हार ने इस बहस को और तेज कर दिया है कि क्या टीम इंडिया अपनी दिशा और पहचान खो चुकी है?
पिछले कुछ महीनों में टीम इंडिया ने वे रिकॉर्ड्स देखे हैं जिन्हें कोई भी भारतीय प्रशंसक याद नहीं रखना चाहेगा। घर में न्यूजीलैंड के खिलाफ टेस्ट सीरीज में 0-3 से सूपड़ा साफ होना और फिर दक्षिण अफ्रीका के हाथों करारी शिकस्त ने उस ‘अजेय घरेलू किले’ को ढहा दिया है जिसे खड़ा करने में दशकों लगे थे। अब न्यूजीलैंड के खिलाफ घर में ही 1-2 से वनडे सीरीज गंवाना उस ताबूत में आखिरी कील जैसा साबित हो रहा है। सवाल यह उठ रहा है कि जो टीम कुछ समय पहले तक दुनिया की सबसे संतुलित टीम मानी जाती थी, वह गंभीर के मार्गदर्शन में इतनी अस्थिर कैसे हो गई?
द्विपक्षीय सीरीज में गिरता ग्राफ और वनडे विश्व कप 2027 की चिंता
गौतम गंभीर की कोचिंग में भारत ने अब तक पांच प्रमुख द्विपक्षीय वनडे सीरीज खेली हैं, और इनके नतीजे किसी भी शीर्ष टीम के लिए खतरे की घंटी से कम नहीं हैं। भारत ने इन पांच में से तीन सीरीज गंवाई हैं, जिसमें घर और बाहर दोनों जगह की हार शामिल है। 2023 वनडे विश्व कप के फाइनल तक पहुंचने वाली टीम अब द्विपक्षीय सीरीज में संघर्ष करती नजर आ रही है। संतुलन पूरी तरह से टूटा हुआ महसूस होता है, जहां बल्लेबाजी और गेंदबाजी के बीच वह तालमेल गायब है जो रवि शास्त्री या राहुल द्रविड़ के दौर में दिखाई देता था।
मिशन 2027 वनडे विश्व कप अब दूर नहीं है, और जिस तरह से वर्तमान में ‘एक्सपेरिमेंट’ के नाम पर टीम के साथ खिलवाड़ हो रहा है, उसने भविष्य की चिंताओं को बढ़ा दिया है। गंभीर काल में बने 17 अनचाहे रिकॉर्ड्स केवल आंकड़े नहीं हैं, बल्कि वे भारतीय क्रिकेट की गिरती साख के दस्तावेज हैं। प्रशंसकों का मानना है कि इतिहास के इन धब्बों को केवल एक चैंपियंस ट्रॉफी की जीत के पीछे नहीं छिपाया जा सकता।
कप्तानी विवाद और सीनियर खिलाड़ियों के संन्यास पर उठते सवाल
गौतम गंभीर के कार्यकाल में सबसे ज्यादा आलोचना जिस बात की हो रही है, वह है ड्रेसिंग रूम का माहौल और सीनियर खिलाड़ियों का जाना। विराट कोहली, रोहित शर्मा और आर अश्विन जैसे दिग्गजों ने टेस्ट क्रिकेट को अलविदा कह दिया, लेकिन क्रिकेट गलियारों में यह चर्चा आम है कि यह विदाई स्वाभाविक नहीं थी। आरोप लग रहे हैं कि टीम मैनेजमेंट और कोच की ओर से ऐसा दबाव बनाया गया कि इन दिग्गजों को मजबूरन संन्यास लेना पड़ा। सच्चाई जो भी हो, लेकिन इन दिग्गजों के जाने के बाद टेस्ट टीम में जो खालीपन आया है, उसे भरने के लिए गंभीर के पास कोई ठोस विकल्प नजर नहीं आ रहा है।
कप्तानी को लेकर की गई ‘म्यूजिकल चेयर’ की राजनीति ने भी टीम के आत्मविश्वास को हिला कर रख दिया है। चैंपियंस ट्रॉफी की ऐतिहासिक सफलता के तुरंत बाद रोहित शर्मा को कप्तानी से हटाना किसी के गले नहीं उतरा। इसके अलावा, टी20 टीम में शुभमन गिल को उपकप्तान बनाकर जबरदस्ती शामिल करने की रणनीति भी बैकफायर कर गई है। नेतृत्व में स्पष्टता की कमी का असर मैदान पर खिलाड़ियों के प्रदर्शन में साफ दिखाई देता है, जहां संकट के समय कोई भी जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं दिखता।
टेस्ट क्रिकेट में रणनीति की विफलता और घर में ढहती दीवार
भारतीय टेस्ट टीम, जिसे कभी घरेलू सरजमीं पर ‘अजेय दीवार’ कहा जाता था, अब अपनी ही बिछाई गई बिसात में फंस रही है। गंभीर की यह चाहत थी कि भारत ऐसी पिचें बनाए जहां गेंद पहले दिन से ही शार्प टर्न ले, ताकि भारतीय स्पिनर्स हावी हो सकें। लेकिन यह रणनीति पूरी तरह से आत्मघाती साबित हुई। न्यूजीलैंड और फिर दक्षिण अफ्रीका के बल्लेबाजों ने इन पिचों पर भारतीय स्पिनर्स से बेहतर खेल दिखाया, जबकि भारतीय मध्यक्रम ताश के पत्तों की तरह बिखर गया।
दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ खेली गई टेस्ट सीरीज में भारत की ओर से एक भी शतक नहीं लगा और टीम किसी भी पारी में 202 का आंकड़ा पार नहीं कर सकी। यह आंकड़े डराने वाले हैं। सेट कॉम्बिनेशन की जगह ऑलराउंडर्स को तरजीह देने और विशेषज्ञों को बाहर बैठाने की नीति ने टेस्ट क्रिकेट की बुनियादी ताकत को कमजोर कर दिया है। लगातार टीम और रणनीति बदलने से खिलाड़ियों में असुरक्षा की भावना पैदा हुई है, जिससे उनका स्वाभाविक खेल प्रभावित हो रहा है।
चयन में विसंगतियां और अनुभवी खिलाड़ियों की अनदेखी
कोच गंभीर के कुछ चयन संबंधी फैसले विशेषज्ञों की समझ से परे रहे हैं। मोहम्मद शमी, जिन्होंने विजय हजारे ट्रॉफी में शानदार प्रदर्शन कर अपनी फिटनेस साबित की, उन्हें चैंपियंस ट्रॉफी के बाद से ही टीम में शामिल नहीं किया गया है। वहीं, अक्षर पटेल को वनडे टीम से ड्रॉप करना और वॉशिंगटन सुंदर को प्राथमिकता देना भी सवाल खड़े करता है। जसप्रीत बुमराह के ‘वर्कलोड मैनेजमेंट’ के नाम पर उन्हें महत्वपूर्ण मैचों से दूर रखा जा रहा है, जबकि हार्दिक पांड्या जैसे खिलाड़ी जो टीम को संतुलन देते हैं, उन्हें भी आराम दिया जा रहा है।
ऋतुराज गायकवाड़ जैसे खिलाड़ी, जिन्होंने दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ अपनी क्लास दिखाई थी, उन्हें बिना किसी ठोस कारण के टीम से बाहर कर दिया गया। इन फैसलों ने टीम की दिशा में अस्थिरता पैदा की है। क्रिकेट पंडितों का मानना है कि चैंपियंस ट्रॉफी में भारत की जीत इसलिए हुई क्योंकि वह टीम राहुल द्रविड़ और रोहित शर्मा की बनाई हुई थी, जिसमें गंभीर ने बहुत कम बदलाव किए थे। लेकिन जैसे ही गंभीर ने अपनी ‘नई रणनीति’ लागू की, परिणाम हार के रूप में सामने आने लगे।
सोशल मीडिया का गुस्सा और भविष्य की अनिश्चितता
भारतीय क्रिकेट फैंस अब खामोश नहीं हैं। सोशल मीडिया पर मुख्य कोच गौतम गंभीर और मुख्य चयनकर्ता अजीत अगरकर को हटाने की मांग जोर पकड़ रही है। प्रशंसकों का कहना है कि गंभीर अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में जिन उपलब्धियों का जिक्र करते हैं, वे भारतीय क्रिकेट के नुकसान की तुलना में बहुत छोटी हैं। एक वायरल पोस्ट ने गंभीर के कार्यकाल की विफलता को इस प्रकार गिनाया—श्रीलंका से हार, न्यूजीलैंड से घर में व्हाइटवॉश, बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी गंवाना, रोहित-विराट का संन्यास और अब न्यूजीलैंड से पहली बार घर में वनडे सीरीज हारना।
गौतम गंभीर के लिए अब यह सिर्फ मैच जीतने का सवाल नहीं है, बल्कि भारतीय क्रिकेट की उस पहचान को बचाने का सवाल है जिसे दशकों की मेहनत से बनाया गया था। 2027 का विश्व कप संभवतः रोहित और कोहली का आखिरी बड़ा टूर्नामेंट हो सकता है, ऐसे में भारत को ‘अभी नहीं तो कभी नहीं’ की नीति अपनानी होगी। क्या गंभीर अपनी जिद्द छोड़कर टीम को स्थिरता देंगे या भारतीय क्रिकेट का यह पतन इसी तरह जारी रहेगा? यह आने वाला समय तय करेगा, लेकिन फिलहाल तो टीम इंडिया अपनी पुरानी चमक खोती नजर आ रही है।