• January 19, 2026

यूपी विधानसभा 2027 की आहट: बृजभूषण की ‘क्षत्रिय’ सियासत, सतुआ बाबा की रोटी पर ठनी और प्रियंका का ‘मिशन 2029’

लखनऊ/नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों को लेकर सियासी बिसात अभी से बिछनी शुरू हो गई है। राज्य में राजनीतिक हलचलें अपने चरम पर हैं और हर छोटा-बड़ा घटनाक्रम सत्ता के गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है। केसरगंज के पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह के हालिया बयानों ने जहाँ जातिगत समीकरणों को नई हवा दे दी है, वहीं प्रयागराज के माघ मेले में ‘सतुआ बाबा की रोटी’ को लेकर मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री के बीच का विरोधाभास प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में कौतूहल का विषय बना हुआ है। दिल्ली की बात करें तो कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा अब ‘आर-पार’ के मूड में नजर आ रही हैं, जबकि पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र में भी सत्ता के समीकरणों को साधने की जद्दोजहद तेज हो गई है।

उत्तर प्रदेश की राजनीति हमेशा से जातीय गौरव और बाहुबल के इर्द-गिर्द घूमती रही है। वर्तमान परिदृश्य में बृजभूषण शरण सिंह की सक्रियता और उनके बयानों के पीछे के गहरे राजनीतिक अर्थ तलाशे जा रहे हैं। वहीं, सरकारी तंत्र और संतों के बीच के संबंधों ने भी एक नई बहस को जन्म दिया है।

बृजभूषण शरण सिंह की ‘क्षत्रिय’ घेराबंदी और सियासी संदेश

भारतीय कुश्ती संघ के पूर्व अध्यक्ष और कद्दावर नेता बृजभूषण शरण सिंह इन दिनों अपने बयानों से उत्तर प्रदेश की राजनीति में खुद को एक ‘क्षत्रिय क्षत्रप’ के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं। अपने जन्मदिन के अवसर पर आयोजित भव्य उत्सव में उन्होंने जिस तरह से जातिगत कार्ड खेला, उसने भाजपा के भीतर और बाहर खलबली मचा दी है। बृजभूषण ने न केवल सपा प्रमुख अखिलेश यादव को ‘क्षत्रिय’ बताकर सबको चौंका दिया, बल्कि अपने जन्मोत्सव में उन्होंने रक्षामंत्री राजनाथ सिंह को क्षत्रियों का सबसे बड़ा नेता घोषित कर दिया। जानकारों का मानना है कि राजनाथ सिंह को नंबर एक बताकर उन्होंने अघोषित तौर पर खुद को दूसरे पायदान पर रख दिया है।

प्रतापगढ़ के कद्दावर नेता रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया के साथ अपने रिश्तों पर बोलते हुए उन्होंने उन्हें अपने बेटों का दोस्त बताया, जो उत्तर प्रदेश के ठाकुर बाहुल्य क्षेत्रों में एक बड़े गठजोड़ की ओर इशारा करता है। बृजभूषण ने ‘राष्ट्रकथा’ के बहाने अपने शक्ति प्रदर्शन में पक्ष-विपक्ष, बाहुबलियों और क्षत्रिय नेताओं को एक मंच पर लाकर यह संदेश दिया है कि आगामी विधानसभा चुनावों में उनकी भूमिका को नजरअंदाज करना किसी भी दल के लिए आसान नहीं होगा। उनकी यह ‘क्षत्रिय गोलबंदी’ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के प्रभाव वाले क्षेत्रों में एक समानांतर शक्ति केंद्र बनाने की कोशिश के रूप में भी देखी जा रही है।

सतुआ बाबा की रोटी और प्रशासनिक नतमस्तकी पर छिड़ा विवाद

प्रयागराज में चल रहे माघ मेले के बीच एक आध्यात्मिक पीठ और प्रशासनिक अधिकारियों के संबंधों ने राजनीतिक विवाद का रूप ले लिया है। सतुआ बाबा पीठ के महंत संतोष दास, जो अपनी लग्जरी जीवनशैली, प्राइवेट जेट और पोर्श कारों के लिए जाने जाते हैं, आजकल चर्चा के केंद्र में हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ उनके मधुर संबंधों का असर प्रशासन पर इस कदर दिखा कि संगम क्षेत्र की तैयारियों के बीच जिलाधिकारी (DM) खुद बाबा के आश्रम में रोटी सेंकते नजर आए। यह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद विपक्षी दलों ने तंज कसना शुरू कर दिया।

मामला तब और दिलचस्प हो गया जब उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य तैयारियों का जायजा लेने संगम पहुँचे। उन्होंने मंच से तो कुछ नहीं कहा, लेकिन अधिकारियों को सख्त लहजे में नसीहत दी कि वे ‘बाबा के चक्कर’ में न पड़ें और रोटी सेंकने के बजाय मेले के प्रबंधन और अपने काम पर ध्यान दें। मौर्य की यह नसीहत सीधे तौर पर मुख्यमंत्री के करीबी माने जाने वाले संतों के प्रति एक प्रशासनिक चेतावनी मानी जा रही है। हालांकि, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अगले ही दिन संगम पहुँचकर सतुआ बाबा की तारीफ की और यहाँ तक कह दिया कि सभी अफसरों को बाबा के आश्रम जाना चाहिए। यह विरोधाभास दर्शाता है कि उत्तर प्रदेश की सत्ता के शीर्ष दो पदों के बीच ‘आध्यात्मिक प्रभाव’ को लेकर भी मतभेद गहरे हैं।

प्रियंका गांधी का ‘मिशन 2029’ और ‘अब न चूको चौहान’ का मंत्र

कांग्रेस गलियारों से खबर आ रही है कि महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा अब किसी भी ढुलमुल नीति के पक्ष में नहीं हैं। उत्तर प्रदेश और असम जैसे राज्यों में कांग्रेस की खोई हुई जमीन वापस पाने के लिए उन्होंने ‘आर-पार’ की रणनीति तैयार की है। प्रियंका को लगता है कि 2029 के लोकसभा चुनावों के लिए जमीन तैयार करने का यही सही समय है और अब चूकने की कोई गुंजाइश नहीं है। उन्होंने राहुल गांधी और सोनिया गांधी के सामने यह प्रस्ताव रखा है कि पार्टी के अध्यक्ष पद पर किसी ‘दमदार’ चेहरे को लाया जाना चाहिए जो सत्ता पक्ष से सीधा और जोरदार मुकाबला कर सके।

प्रियंका की मंशा है कि कांग्रेस को केवल रैलियों तक सीमित न रखकर एक लड़ाकू विपक्ष के रूप में सड़कों पर उतारा जाए। विशेष रूप से उत्तर प्रदेश में, जहाँ सपा और भाजपा के बीच मुख्य मुकाबला है, प्रियंका कांग्रेस के अस्तित्व को दोबारा जीवित करने के लिए सांगठनिक बदलावों पर जोर दे रही हैं। राहुल गांधी ने उनकी बातों को गंभीरता से सुना है और माना जा रहा है कि जल्द ही कांग्रेस के केंद्रीय ढांचे में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं।

बंगाल में ममता की ‘जमीनी गर्मी’ और भाजपा का स्टाइल

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इन दिनों बेहद सतर्क हैं। उन्हें अंदेशा है कि आगामी चुनावों के लिए आचार संहिता लागू होते ही तृणमूल कांग्रेस (TMC) के कई ‘सिपहसालार’ पाला बदलकर भाजपा में शामिल हो सकते हैं। हाल के दिनों में बांग्लादेश के घटनाक्रमों के बाद पश्चिम बंगाल के हिंदू मतदाताओं और बंगाली समाज के बीच जो हलचल बढ़ी है, उसने दीदी की चिंता बढ़ा दी है। इस डैमेज कंट्रोल के लिए ममता बनर्जी ने अपने कैडर को एक खास और कड़ा संदेश भेजा है।

ममता ने अपने जमीनी कार्यकर्ताओं से कहा है कि यदि भाजपा से निपटना है, तो उनकी अपनी आक्रामक शैली को अपनाना होगा। उन्होंने ‘टीएमसी की गर्मी’ दिखाने का आह्वान किया है ताकि भाजपा के बढ़ते प्रभाव को रोका जा सके। टीएमसी के रणनीतिकार जानते हैं कि इस बार लड़ाई पिछली बार से कहीं अधिक कठिन होने वाली है, इसलिए वे एक-एक नेता की गतिविधियों पर नजर रख रहे हैं और दलबदल की संभावनाओं को कम करने के लिए हर संभव विकल्प तैयार रखे हुए हैं।

महाराष्ट्र में ‘धुरंधर’ फडणवीस का करिश्मा और विरोधियों की चुप्पी

महाराष्ट्र की राजनीति में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस एक ‘अजेय योद्धा’ के रूप में उभरे हैं। उनकी प्रचार टीम ने उन्हें ‘धुरंधर’ का जो तमगा दिया है, उसे हालिया चुनावी नतीजों ने सही साबित कर दिया है। फडणवीस ने जिस तरह से पहले शरद पवार की एनसीपी को तोड़ा, फिर उद्धव ठाकरे की शिवसेना में सेंधमारी की और एकनाथ शिंदे को साथ लेकर सरकार बनाई, वह भारतीय राजनीति के सबसे जटिल ‘वॉरगेम’ में से एक माना जाता है। फडणवीस ने न केवल अपनी पार्टी को सत्ता में वापस लाया, बल्कि मुख्यमंत्री पद से उपमुख्यमंत्री पद स्वीकार कर जो त्याग दिखाया था, उसका फल उन्हें अब मुख्यमंत्री के रूप में दोबारा मिला है।

बीएमसी और अन्य नगर निकायों के चुनावों में भाजपा के परचम ने अजीत पवार और एकनाथ शिंदे जैसे सहयोगियों के साथ-साथ उद्धव ठाकरे और शरद पवार जैसे विरोधियों को भी सन्न कर दिया है। दिल्ली की भाजपा टीम भी फडणवीस के इस ‘महाराष्ट्र मॉडल’ की मुरीद हो गई है। विरोधियों को अब समझ आ रहा है कि फडणवीस की ‘धुरंधरी’ का मतलब केवल सत्ता हासिल करना नहीं, बल्कि विपक्ष को सांगठनिक रूप से पंगु बना देना है। महाराष्ट्र के ताजा चुनावी नतीजे बताते हैं कि आने वाले समय में फडणवीस का कद राष्ट्रीय राजनीति में और भी ऊंचा होने वाला है।

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