प्रयागराज मौनी अमावस्या 2026: संगम तट पर भारी बवाल, शंकराचार्य के रथ को रोकने पर भड़की हिंसा और तनाव
प्रयागराज: संगम नगरी में मौनी अमावस्या के पावन पर्व पर जहाँ करोड़ों श्रद्धालु मौन व्रत धारण कर आस्था की डुबकी लगा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर माघ मेला क्षेत्र में जबरदस्त तनाव और टकराव की स्थिति उत्पन्न हो गई है। ज्योतिष्पीठाधीश्वर शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के रथ को रोके जाने के बाद संगम क्षेत्र एक युद्ध के मैदान में तब्दील हो गया। प्रशासन और साधु-संतों के बीच हुई इस तीखी झड़प ने मेले की व्यवस्थाओं और पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
विवाद उस समय शुरू हुआ जब शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद अपने लाव-लश्कर और समर्थकों के साथ शाही स्नान के लिए संगम की ओर बढ़ रहे थे। जैसे ही उनका भव्य रथ पांटून पुल संख्या चार के पास पहुँचा, वहां तैनात भारी पुलिस बल ने उन्हें आगे बढ़ने से रोक दिया। पुलिस का तर्क था कि मौनी अमावस्या पर भीड़ का दबाव अत्यधिक है और सुरक्षा कारणों से बड़े रथों को संगम के मुख्य स्नान घाट तक ले जाने की अनुमति नहीं दी जा सकती। प्रशासन ने शंकराचार्य से रथ से उतरकर केवल पांच लोगों के साथ पैदल जाकर स्नान करने का आग्रह किया, जिसे शंकराचार्य और उनके शिष्यों ने अपना अपमान बताते हुए सिरे से खारिज कर दिया।
पांटून पुल पर भड़की हिंसा और तोड़फोड़
पुलिस द्वारा रोके जाने से नाराज शंकराचार्य के समर्थकों का गुस्सा फूट पड़ा। देखते ही देखते शांतिपूर्ण माहौल तनाव में बदल गया। समर्थकों और पुलिस के बीच तीखी नोकझोंक शुरू हो गई, जो जल्द ही धक्का-मुक्की और झड़प में तब्दील हो गई। शंकराचार्य के समर्थकों ने आरोप लगाया कि पुलिस ने उनके साथ बदसलूकी की है। इस दौरान आक्रोशित साधु-संतों और समर्थकों ने पांटून पुल संख्या चार के पास लगी बैरिकेडिंग को उखाड़ फेंका और वहां जमकर तोड़फोड़ की।
मेला क्षेत्र में हुई इस तोड़फोड़ के बाद भगदड़ जैसी स्थिति बन गई। पुलिस के आला अधिकारियों ने जब वायरलेस पर इस झड़प की सूचना प्रसारित की, तो पूरे संगम क्षेत्र में हड़कंप मच गया। कुछ ही मिनटों में पीएसी और आरएएफ की अतिरिक्त टुकड़ियों ने मोर्चा संभाल लिया। स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि श्रद्धालुओं की भीड़ के बीच सुरक्षा बल ही सुरक्षा बल नजर आने लगे और पूरा क्षेत्र एक पुलिस छावनी जैसा दिखने लगा।
शंकराचार्य के गंभीर आरोप और प्रशासन की घेराबंदी
अपने रथ पर अडिग बैठे शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने पुलिस और मेला प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने सीधे तौर पर प्रशासन को “तानाशाह” करार देते हुए कहा कि यह सनातन परंपराओं पर आघात है। शंकराचार्य ने आरोप लगाया कि पुलिस ने उनके शिष्यों के साथ मारपीट की है और उन्हें उनके धार्मिक अधिकारों से वंचित किया जा रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब तक उन्हें ससम्मान स्नान के लिए नहीं जाने दिया जाता और उनके शिष्यों के साथ हुए दुर्व्यवहार पर माफी नहीं मांगी जाती, वे रथ से नीचे नहीं उतरेंगे।
शंकराचार्य ने कहा कि मेला प्रशासन मनमानी पर उतारू है। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर बड़े जुलूसों को नहीं आने देना था, तो इसकी पूर्व सूचना क्यों नहीं दी गई? उन्होंने इसे शासन की सोची-समझी साजिश बताया। दूसरी ओर, पुलिस कमिश्नर और मेलाधिकारी का कहना है कि मौनी अमावस्या पर करोड़ों की भीड़ को नियंत्रित करना उनकी प्राथमिकता है और किसी भी बड़े वाहन को संवेदनशील क्षेत्रों में ले जाने की अनुमति देना जोखिम भरा हो सकता था।
प्रशासनिक अमले में मची खलबली, सुलह की कोशिशें जारी
बवाल की गंभीरता को देखते हुए प्रयागराज की मंडलायुक्त सौम्या अग्रवाल, पुलिस कमिश्नर जोगेंद्र कुमार और मेलाधिकारी ऋषिराज समेत तमाम वरिष्ठ अधिकारी मौके पर पहुँच गए। अधिकारियों ने शंकराचार्य को मनाने और समझाने की काफी कोशिश की, लेकिन बात बनती नहीं दिख रही है। शंकराचार्य के समर्थकों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है, जिससे सुरक्षा बलों के हाथ-पांव फूल रहे हैं।
मामला इतना संवेदनशील हो गया है कि अब इसे सुलझाने के लिए सीधे मुख्यमंत्री कार्यालय (सीेएमओ) से संपर्क साधा जा रहा है। मंडलायुक्त ने शासन के वरिष्ठ अधिकारियों को पल-पल की रिपोर्ट भेजी है। बताया जा रहा है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की ओर से निर्देश मिलने के बाद ही प्रशासन कोई बड़ा निर्णय लेगा। इस बीच, शंकराचार्य के समर्थकों ने चेतावनी दी है कि यदि उनके गुरु के साथ सम्मानजनक व्यवहार नहीं हुआ, तो वे पूरे मेला क्षेत्र में चक्का जाम कर देंगे।
श्रद्धालुओं की परेशानी और मेले की सुरक्षा पर संकट
एक तरफ जहाँ यह विवाद चरम पर है, वहीं दूसरी तरफ दूर-दराज से आए आम श्रद्धालुओं को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। पुल संख्या चार और उसके आसपास के रास्तों को सील कर दिए जाने के कारण लोगों को मीलों पैदल चक्कर काटकर घाटों तक पहुँचना पड़ रहा है। संगम की रेती पर जहाँ मौन रहकर साधना की जाती है, वहाँ आज नारों और विरोध प्रदर्शनों की गूँज सुनाई दे रही है।
इस घटना ने माघ मेले की सुरक्षा और क्राउड मैनेजमेंट की पोल खोल दी है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या प्रशासन को शंकराचार्य के आने के कार्यक्रम की जानकारी नहीं थी? और अगर थी, तो अंतिम समय पर रथ रोकने के बजाय पहले ही समन्वय क्यों नहीं स्थापित किया गया? विवाद के चलते मौनी अमावस्या के स्नान पर्व का उल्लास फीका पड़ता नजर आ रहा है।
तनावपूर्ण शांति और आगे की अनिश्चितता
वर्तमान में संगम तट पर तनावपूर्ण शांति बनी हुई है। भारी पुलिस बल तैनात है और शंकराचार्य अभी भी अपने रथ पर ही विराजे हुए हैं। उन्होंने संकल्प लिया है कि यदि उन्हें रोका गया, तो वे बिना स्नान किए ही वापस लौट जाएंगे, जो प्रशासन के लिए एक बड़ी विफलता मानी जाएगी। पुलिस अधिकारी लगातार साधु-संतों के बीच बैठकर बातचीत का रास्ता निकालने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन समर्थकों का आक्रोश कम होने का नाम नहीं ले रहा है।
अगले कुछ घंटे प्रयागराज प्रशासन के लिए काफी चुनौतीपूर्ण होने वाले हैं। यदि मामला शांत नहीं हुआ, तो यह विवाद बड़े सांप्रदायिक और धार्मिक विरोध का रूप ले सकता है। संगम की धरती, जो मेल-मिलाप का प्रतीक है, आज सत्ता और आस्था के बीच संघर्ष की गवाह बनी हुई है।