• February 11, 2026

उत्तराखंड में करीब 20 लाख मतदाताओं पर मंडराया वोट कटने का खतरा, बीएलओ मैपिंग में बरती जा रही लापरवाही बन सकती है मुसीबत

देहरादून: उत्तराखंड की राजनीति और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को लेकर एक बड़ी और चिंताजनक खबर सामने आ रही है। प्रदेश के लगभग 19.79 लाख मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए जा सकते हैं। निर्वाचन आयोग द्वारा बार-बार दी जा रही चेतावनियों और बीएलओ (Booth Level Officer) के अथक प्रयासों के बावजूद, बड़ी संख्या में नागरिकों ने अभी तक बीएलओ मैपिंग की प्रक्रिया पूरी नहीं की है। मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि आगामी ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (SIR) के दौरान इन मतदाताओं ने अपनी जानकारी अपडेट नहीं की, तो उन्हें नोटिस जारी किया जाएगा और संतोषजनक जवाब न मिलने की स्थिति में उनका मताधिकार छीन लिया जाएगा यानी उनका नाम मतदाता सूची से काट दिया जाएगा।

उत्तराखंड में वर्तमान में कुल मतदाताओं की संख्या 84,42,263 है। राज्य निर्वाचन तंत्र इस समय विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की तैयारी में जुटा है, जिससे पहले ‘प्री-एसआईआर’ गतिविधियां संचालित की जा रही हैं। इस प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बीएलओ मैपिंग है। ताजा आंकड़ों के अनुसार, अब तक राज्य के 64,63,099 मतदाताओं की सफलतापूर्वक बीएलओ मैपिंग की जा चुकी है। हालांकि, अभी भी 19,79,164 मतदाता ऐसे हैं जो इस प्रक्रिया के दायरे से बाहर हैं। यह संख्या कुल मतदाता आबादी का एक बड़ा हिस्सा है, जो आने वाले चुनावों में निर्णायक भूमिका निभा सकती है।

निर्वाचन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि बीएलओ मैपिंग का काम चरणबद्ध तरीके से किया जा रहा है। पहले चरण में उन मतदाताओं और परिवारों को लक्षित किया गया था जिनके नाम साल 2003 की उत्तराखंड की आधारभूत मतदाता सूची में दर्ज थे। अब दूसरे चरण में मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय ने उन निवासियों पर ध्यान केंद्रित करना शुरू किया है जो वर्तमान में उत्तराखंड में रह रहे हैं, लेकिन जिनका वोट साल 2003 में उत्तर प्रदेश या किसी अन्य राज्य की सूची में दर्ज था। यह एक जटिल प्रक्रिया है, क्योंकि इसमें अंतर-राज्यीय डेटा का मिलान और सत्यापन शामिल है।

प्रशासन के लिए सबसे बड़ी चुनौती वह 19 लाख से अधिक मतदाता हैं जो बीएलओ के बार-बार घर आने और चुनाव आयोग की सार्वजनिक अपीलों के बावजूद मैपिंग के लिए आगे नहीं आ रहे हैं। एसआईआर (Special Intensive Revision) शुरू होते ही निर्वाचन आयोग प्रत्येक मतदाता तक बीएलओ के माध्यम से एसआईआर फॉर्म पहुंचाएगा। यहाँ यह समझना आवश्यक है कि जिन मतदाताओं की बीएलओ मैपिंग पहले ही पूरी हो चुकी है, उनके लिए प्रक्रिया काफी सरल होगी। उन्हें केवल फॉर्म भरकर वापस जमा करना होगा और किसी भी अतिरिक्त दस्तावेज की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।

इसके विपरीत, जिन मतदाताओं की मैपिंग नहीं हुई है, उनके लिए नियम काफी सख्त रहने वाले हैं। इन मतदाताओं को एसआईआर फॉर्म के साथ साल 2003 के अपने वोट से संबंधित पुख्ता दस्तावेज और प्रमाण देने होंगे। यदि कोई मतदाता यह दस्तावेज उपलब्ध कराने में विफल रहता है, तो निर्वाचन आयोग की ओर से उन्हें औपचारिक नोटिस जारी किया जाएगा। नोटिस जारी होने के बाद भी यदि निर्धारित समय सीमा के भीतर जवाब नहीं दिया गया या दस्तावेज जमा नहीं किए गए, तो आयोग के पास उनका नाम मतदाता सूची से विलोपित करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तराखंड की भौगोलिक परिस्थितियों और पलायन की समस्या के कारण भी बीएलओ मैपिंग में बाधा आ रही है। कई मतदाता रोजगार या अन्य कारणों से अपने मूल निवास स्थान पर उपलब्ध नहीं हैं, जिससे बीएलओ उन तक नहीं पहुंच पा रहे हैं। हालांकि, मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय ने स्पष्ट किया है कि तकनीक के इस युग में मतदाताओं को जागरूक होना चाहिए और अपने मताधिकार की रक्षा के लिए स्वयं पहल करनी चाहिए।

एसआईआर की यह कवायद मतदाता सूची को पूरी तरह शुद्ध और पारदर्शी बनाने के उद्देश्य से की जा रही है। इसका मुख्य लक्ष्य फर्जी मतदाताओं और एक से अधिक स्थानों पर पंजीकृत नामों को हटाना है। लेकिन इस प्रक्रिया की सख्ती अब उन वैध मतदाताओं के लिए भी खतरा बन गई है जो इसे गंभीरता से नहीं ले रहे हैं। आयोग का तर्क है कि 2003 की आधारभूत सूची पर निर्भरता और कठिन सत्यापन प्रक्रिया वास्तविक मतदाताओं के अधिकारों को सुरक्षित करने के लिए ही अपनाई जा रही है।

उत्तराखंड के सभी जिलों के जिलाधिकारियों और जिला निर्वाचन अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में बीएलओ मैपिंग की गति बढ़ाएं और लोगों को इसके परिणामों के प्रति सचेत करें। आने वाले कुछ हफ़्ते उत्तराखंड के उन 19 लाख से अधिक मतदाताओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। यदि वे अभी सक्रिय नहीं हुए, तो भविष्य में होने वाले विधानसभा या स्थानीय चुनावों में वे अपने पसंदीदा जनप्रतिनिधि को चुनने का अधिकार खो सकते हैं। निर्वाचन आयोग ने एक बार फिर जनता से अपील की है कि वे अपने क्षेत्र के बीएलओ से संपर्क करें और अपनी मैपिंग सुनिश्चित करें ताकि लोकतंत्र के इस महापर्व में उनकी भागीदारी सुनिश्चित रह सके।

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