उत्तर प्रदेश में ‘वोटर लिस्ट’ पर घमासान: सपा के बेईमानी के आरोपों पर चुनाव आयोग का पलटवार, कहा- ‘नसीहत’ नहीं ‘तथ्य’ देखिए
लखनऊ: उत्तर प्रदेश की राजनीति में इन दिनों ‘एसआईआर’ (Special Integrated Revision) यानी मतदाता सूची का विशेष पुनरीक्षण कार्य सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच युद्ध का नया मैदान बन गया है। समाजवादी पार्टी (सपा) द्वारा मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर धांधली और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर उठाए गए सवालों के बाद, आयोग ने अभूतपूर्व रूप से सख्त रुख अपनाते हुए जवाब दिया है। निर्वाचन आयोग ने न केवल सपा के दावों को खारिज किया है, बल्कि बिना वास्तविकता की पड़ताल किए संवैधानिक संस्था की निष्पक्षता पर संदेह करने को ‘अन्यायपूर्ण’ करार दिया है। यह विवाद एक भाजपा विधायक के उस कथित बयान से शुरू हुआ जिसमें उन्होंने एक सप्ताह के भीतर हजारों वोट जुड़वाने का दावा किया था।
विवाद की जड़: भाजपा विधायक का बयान और सपा का हमला
इस पूरे सियासी ड्रामे की शुरुआत यूपी भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी की एक रैली के दौरान हुई। आरोप है कि इस रैली में भाजपा के एक स्थानीय विधायक ने सार्वजनिक रूप से यह दावा किया कि उन्होंने अपनी विधानसभा में पिछले एक सप्ताह के भीतर 18 हजार से अधिक नए वोट बढ़वा लिए हैं। इस बयान का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होते ही समाजवादी पार्टी ने इसे चुनाव आयोग के खिलाफ एक बड़े हथियार के रूप में इस्तेमाल किया। सपा ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल ‘एक्स’ (पूर्व में ट्विटर) पर पोस्ट करते हुए इसे ‘भाजपा विधायक की स्वीकारोक्ति’ बताया और आरोप लगाया कि मतदाता पुनरीक्षण कार्य में बड़े पैमाने पर बेईमानी और हेरफेर किया जा रहा है। सपा ने सीधे तौर पर चुनाव आयोग की निष्पक्षता को कटघरे में खड़ा कर दिया।
चुनाव आयोग का डिजिटल पलटवार: ‘एक्स’ पर दिया तथ्यों के साथ जवाब
समाजवादी पार्टी के आरोपों पर चुनाव आयोग ने इस बार चुप्पी साधने के बजाय सोशल मीडिया पर ही तथ्यों के साथ मोर्चा संभाला। आयोग ने सपा की पोस्ट का रिप्लाई करते हुए स्पष्ट किया कि किसी के भी बयान मात्र को सच्चाई मान लेना गलत है। चुनाव आयोग ने आधिकारिक आंकड़े जारी करते हुए लिखा, “सशंकित होने की आवश्यकता नहीं है। संबंधित विधानसभा क्षेत्र में पिछले एक सप्ताह में मतदाता सूची में नाम जोड़ने के लिए मात्र 14,707 फॉर्म-6 ही प्राप्त हुए हैं।” आयोग ने आगे कहा कि 6 जनवरी 2026 को ड्राफ्ट वोटर लिस्ट (प्रारूप मतदाता सूची) के प्रकाशन के बाद से अब तक उस विधानसभा में वास्तव में ‘एक भी’ नया वोट नहीं बढ़ा है, क्योंकि फॉर्म जमा होने और नाम जुड़ने के बीच एक लंबी सत्यापन प्रक्रिया होती है।
निष्पक्षता पर सवाल उठाना ‘अन्यायपूर्ण’: आयोग की नसीहत
चुनाव आयोग ने समाजवादी पार्टी को नसीहत देते हुए कहा कि केवल राजनीतिक बयानों के आधार पर चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए ठीक नहीं है। आयोग ने अपने जवाब में जोर देकर कहा कि निर्वाचन प्रक्रिया पूरी तरह से पारदर्शी है और इसमें किसी भी राजनीतिक दल या व्यक्ति के हस्तक्षेप की कोई गुंजाइश नहीं है। आयोग के इस जवाब को राजनीतिक विश्लेषक एक कड़ा संदेश मान रहे हैं, जिसमें संस्था ने यह साफ कर दिया है कि वह अपनी छवि को धूमिल करने वाले निराधार आरोपों को बर्दाश्त नहीं करेगी। आयोग ने स्पष्ट किया कि वोटर लिस्ट में नाम जोड़ना या काटना एक तय कानूनी प्रक्रिया है जिसे बूथ स्तर के अधिकारियों (BLO) और पंजीकरण अधिकारियों द्वारा पूरी सावधानी से किया जाता है।
एसआईआर (SIR) को लेकर विपक्ष की बढ़ती बेचैनी
उत्तर प्रदेश में आगामी चुनावों को देखते हुए मतदाता सूची का पुनरीक्षण दोनों ही खेमों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। विपक्ष, विशेषकर समाजवादी पार्टी को अंदेशा है कि सत्ता पक्ष अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर उनके समर्थकों के नाम काट सकता है या फर्जी वोट जुड़वा सकता है। यही कारण है कि सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव और उनके नेता लगातार एसआईआर कार्य की निगरानी की बात कर रहे हैं। सपा का आरोप है कि भाजपा प्रशासनिक मशीनरी का दुरुपयोग कर रही है, जबकि भाजपा का कहना है कि विपक्ष अपनी संभावित हार को देखते हुए पहले से ही बहाने और संस्थानों पर आरोप मढ़ने की जमीन तैयार कर रहा है।
भाजपा विधायक का दावा और धरातल की हकीकत
भाजपा विधायक के ’18 हजार वोट’ वाले बयान ने पार्टी को भी असहज स्थिति में डाल दिया है। एक तरफ जहां चुनाव आयोग ने आंकड़ों से इसे गलत साबित कर दिया है, वहीं विपक्ष इसे ‘ग्राउंड रियलिटी’ बता रहा है। जानकारों का कहना है कि कई बार विधायक अपने कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ाने के लिए अतिशयोक्तिपूर्ण बयान देते हैं, लेकिन चुनाव आयोग जैसे संवेदनशील विषय पर ऐसे दावे सीधे तौर पर विवादों को जन्म देते हैं। फिलहाल, चुनाव आयोग के स्पष्टीकरण के बाद भाजपा ने राहत की सांस ली है, लेकिन सपा अभी भी इस मुद्दे को छोड़ने के मूड में नहीं दिख रही है।
निष्कर्ष: लोकतंत्र में विश्वास की चुनौती
यह विवाद केवल एक विधानसभा या कुछ हजार वोटों का नहीं है, बल्कि यह चुनाव जैसी पवित्र प्रक्रिया में जनता और राजनीतिक दलों के विश्वास का है। चुनाव आयोग ने अपनी ओर से स्पष्टीकरण देकर संदेह के बादलों को छांटने की कोशिश की है, लेकिन उत्तर प्रदेश की तपती राजनीति में मतदाता सूची का जिन्न अभी शांत होता नहीं दिख रहा है। आने वाले दिनों में जब अंतिम मतदाता सूची का प्रकाशन होगा, तब यह देखना दिलचस्प होगा कि विपक्ष के पास अपनी शिकायतों को लेकर और क्या तर्क बचते हैं।