• January 31, 2026

इसरो के PSLV-C62 मिशन में आई तकनीकी बाधा: ‘अन्वेषा’ उपग्रह की लॉन्चिंग के तीसरे चरण में खराबी, देश की सुरक्षा और निगरानी क्षमताओं पर टिकी थीं नजरें

श्रीहरिकोटा: भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के लिए आज का दिन उम्मीदों और चुनौतियों का मिला-जुला संगम रहा। आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से इस वर्ष के पहले और बहुप्रतीक्षित मिशन PSLV-C62 का प्रक्षेपण किया गया। करीब 260 टन वजनी पीएसएलवी रॉकेट ने अपने निर्धारित समय पर उड़ान भरी, लेकिन मिशन के तीसरे चरण में अचानक तकनीकी खराबी आ जाने के कारण अभियान को बड़ा झटका लगा है। इस मिशन के जरिए भारत के सबसे शक्तिशाली निगरानी उपग्रह ‘अन्वेषा’ सहित कुल 15 उपग्रहों को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित किया जाना था।

इसरो का यह मिशन रक्षा और प्रौद्योगिकी के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा था। पीएसएलवी रॉकेट की यह 64वीं उड़ान थी, जिसमें दो सॉलिड स्ट्रैप-ऑन मोटर वाले विशेष ‘पीएसएलवी-डीएल’ वेरिएंट का उपयोग किया गया। मिशन का मुख्य उद्देश्य ‘अन्वेषा’ (EOS-N1) उपग्रह को धरती से लगभग 600 किलोमीटर ऊपर पोलर सन-सिंक्रोनस ऑर्बिट में तैनात करना था। अन्वेषा को भारत का ‘आकाश में सीसीटीवी’ कहा जा रहा है, क्योंकि यह देश की सीमाओं और सामरिक हितों की रक्षा के लिए एक अभूतपूर्व निगरानी तंत्र के रूप में विकसित किया गया है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) द्वारा तैयार किया गया यह उपग्रह हाइपरस्पेक्ट्रल सेंसर तकनीक से लैस है, जो इसे साधारण कैमरों की तुलना में कहीं अधिक स्मार्ट और सटीक बनाता है।

तकनीकी विशेषज्ञों के अनुसार, मिशन की शुरुआत बेहद सटीक रही थी। रॉकेट ने पहले और दूसरे चरण को सफलतापूर्वक पार कर लिया था, लेकिन तीसरे चरण के दौरान डेटा और इंजन के प्रदर्शन में विसंगतियां देखी गईं। इसरो के वैज्ञानिक अब इस खराबी के कारणों का विश्लेषण कर रहे हैं ताकि यह पता लगाया जा सके कि क्या उपग्रहों को वांछित कक्षा प्राप्त हो सकी है या मिशन विफल हो गया है। यह प्रक्षेपण न केवल भारत की घरेलू रक्षा जरूरतों के लिए बल्कि वैश्विक स्मॉल-सैटेलाइट लॉन्च मार्केट में भारत की साख को और मजबूत करने के उद्देश्य से भी किया गया था।

अन्वेषा उपग्रह की क्षमताओं की बात करें तो यह भारतीय सेना के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। इसमें मौजूद हाइपरस्पेक्ट्रल इमेजिंग तकनीक हर पिक्सेल में सैकड़ों लाइट बैंड को रिकॉर्ड करने की क्षमता रखती है। इसका अर्थ यह है कि यह उपग्रह केवल तस्वीरें ही नहीं लेता, बल्कि उन तस्वीरों के भीतर छिपी सूक्ष्म जानकारी का भी विश्लेषण कर सकता है। यह तकनीक जंगलों के घने कवर के नीचे छिपे दुश्मनों, जमीन के नीचे बने बंकरों या रात के अंधेरे में होने वाली घुसपैठ को भी पकड़ने में सक्षम है। इसे विशेष रूप से आतंकियों और उपद्रवियों की गतिविधियों पर पैनी नजर रखने के लिए डिजाइन किया गया है।

निगरानी के अलावा, अन्वेषा उपग्रह के पास नागरिक उपयोग के भी व्यापक आयाम हैं। इसकी हाइपरस्पेक्ट्रल क्षमताएं फसलों के स्वास्थ्य की निगरानी, मिट्टी में नमी की मात्रा का सटीक आकलन, खनिज संसाधनों की खोज और शहरी विस्तार के प्रबंधन में मील का पत्थर साबित हो सकती हैं। पर्यावरणीय बदलावों और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को समझने के लिए भी यह डेटा काफी महत्वपूर्ण होने वाला था। डीआरडीओ का लक्ष्य इस उपग्रह के माध्यम से एक ऐसा आत्मनिर्भर तंत्र विकसित करना था, जो विदेशी उपग्रह डेटा पर भारत की निर्भरता को पूरी तरह समाप्त कर दे।

पीएसएलवी रॉकेट का इतिहास भारत की अंतरिक्ष यात्रा में बेहद गौरवशाली रहा है। इसे इसरो का ‘वर्कहॉर्स’ यानी सबसे भरोसेमंद लॉन्च व्हीकल माना जाता है। अब तक इसने चंद्रयान-1, मार्स ऑर्बिटर मिशन (मंगलयान), आदित्य-L1 और एस्ट्रोसैट जैसे ऐतिहासिक मिशनों को सफलतापूर्वक अंजाम दिया है। साल 2017 में इसी रॉकेट ने एक साथ 104 उपग्रहों को अंतरिक्ष में भेजकर विश्व रिकॉर्ड कायम किया था। अपनी 63 सफल उड़ानों के बाद 64वीं उड़ान में आई यह तकनीकी बाधा इसरो के वैज्ञानिकों के लिए एक नई चुनौती पेश करती है।

सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि अन्वेषा जैसे उपग्रहों की तैनाती भारत की ‘एक्टिव डिफेंस’ नीति का हिस्सा है। सीमा पार से होने वाली घुसपैठ और पड़ोसी देशों की संदिग्ध गतिविधियों पर लगाम लगाने के लिए रीयल-टाइम डेटा की आवश्यकता होती है, जो अन्वेषा प्रदान करने में सक्षम है। इसके रडार और सेंसर किसी भी मौसम और किसी भी समय स्पष्ट तस्वीरें भेजने की ताकत रखते हैं। इस मिशन के साथ भेजे गए अन्य 14 उपग्रह भी विभिन्न वैज्ञानिक और व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए थे, जो भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था को नई गति देने वाले थे।

फिलहाल, इसरो के मिशन कंट्रोल सेंटर में डेटा का गहन अध्ययन जारी है। अंतरिक्ष क्षेत्र में इस तरह की तकनीकी चुनौतियां नई नहीं हैं, लेकिन अन्वेषा जैसे रणनीतिक उपग्रह का भविष्य अधर में लटकना देश की रक्षा तैयारियों के लिहाज से चिंता का विषय जरूर है। इसरो प्रमुख और उनकी टीम आने वाले समय में एक विस्तृत रिपोर्ट साझा कर सकती है कि तीसरे चरण की विसंगति का मिशन के अंतिम परिणाम पर क्या प्रभाव पड़ा है। भारत की नजरें अब इस बात पर टिकी हैं कि क्या मिशन को आंशिक रूप से बचाया जा सका है या भविष्य में एक नए प्रक्षेपण की योजना बनानी होगी।

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