• February 26, 2026

‘फर्क समझो सरजी’: राहुल गांधी का प्रधानमंत्री मोदी पर बड़ा हमला, ट्रंप के ‘टैरिफ दबाव’ और इंदिरा गांधी के ‘साहस’ का किया जिक्र

नई दिल्ली: लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने बुधवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर विदेशी कूटनीति और राष्ट्रीय स्वाभिमान को लेकर अब तक का सबसे तीखा हमला बोला है। राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दबाव के आगे झुकने और ‘आत्मसमर्पण’ करने का आरोप लगाया। यह विवाद तब शुरू हुआ जब राष्ट्रपति ट्रंप ने दावा किया कि भारत ने अमेरिकी प्रतिबंधों के डर से रूसी तेल की खरीद में भारी कटौती की है और भारतीय निर्यात पर लगाए गए भारी टैरिफ के बावजूद प्रधानमंत्री मोदी ने उनसे मिलने की इच्छा जताई। राहुल गांधी ने इस स्थिति की तुलना 1971 के युद्ध के दौरान पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा अमेरिकी दबाव को ठुकराने वाले ऐतिहासिक घटनाक्रम से की और ‘फर्क’ समझाने की कोशिश की।

ट्रंप का दावा: मोदी ने मिलने का अनुरोध किया और रूसी तेल पर पीछे हटे

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक बयान ने भारतीय राजनीति में हलचल पैदा कर दी है। रिपब्लिकन पार्टी के सांसदों की एक उच्चस्तरीय बैठक को संबोधित करते हुए ट्रंप ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी हाल ही में उनसे मिलने आए थे। ट्रंप के शब्दों में, “प्रधानमंत्री मोदी मुझसे मिलने आए और उन्होंने कहा- सर, क्या मैं आपसे मिल सकता हूँ? मैंने कहा- जी हाँ।” ट्रंप यहीं नहीं रुके, उन्होंने भारत पर लगाए गए कड़े टैरिफ का जिक्र करते हुए कहा कि भारत वर्तमान में ‘बहुत ज्यादा टैरिफ’ चुका रहा है।

ट्रंप ने विशेष रूप से रूसी तेल की खरीद का उल्लेख करते हुए दावा किया कि उनके कड़े रुख के बाद भारत ने रूस से तेल लेना ‘काफी हद तक कम’ कर दिया है। गौरतलब है कि ट्रंप प्रशासन ने भारतीय निर्यात पर कुल 50 फीसदी तक के टैरिफ लगाए हैं, जिसमें 25 फीसदी टैरिफ केवल रूस से व्यापार जारी रखने के दंड स्वरूप लगाया गया था। ट्रंप का यह बयान भारतीय विदेश नीति की उस ‘स्वायत्तता’ पर सवाल खड़े करता है जिसका दावा केंद्र सरकार पिछले दो वर्षों से करती आ रही थी।

‘थोड़ा सा धक्का दो और ये भाग जाते हैं’: राहुल गांधी का तीखा प्रहार

राहुल गांधी ने ट्रंप के इस बयान से संबंधित वीडियो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (पूर्व में ट्विटर) पर साझा किया और प्रधानमंत्री को ‘सरजी’ कहकर संबोधित करते हुए कैप्शन दिया— ‘फर्क समझो सरजी’। राहुल गांधी ने भाजपा और आरएसएस की विचारधारा पर निशाना साधते हुए कहा, “मैं अब इन लोगों को बहुत अच्छी तरह जानता हूँ। थोड़ा सा दबाव डालो, थोड़ा सा धक्का दो और ये डर के मारे भाग जाते हैं।”

राहुल ने आरोप लगाया कि जैसे ही अमेरिका से ट्रंप का इशारा हुआ, भारतीय नेतृत्व ने तुरंत आत्मसमर्पण कर दिया। उन्होंने तंज कसते हुए कहा, “ट्रंप ने वहां से इशारा किया और इन्होंने यहां फोन उठा लिया। ट्रंप ने पूछा कि आप क्या कर रहे हैं? और नरेंद्र मोदी जी ने ‘जी हुजूर’ कहते हुए उनके आदेश का पालन करना शुरू कर दिया।” विपक्ष के नेता का तर्क है कि प्रधानमंत्री मोदी की ‘मजबूत नेता’ वाली छवि अंतरराष्ट्रीय मंच पर ताश के पत्तों की तरह ढह गई है।

1971 का हवाला: इंदिरा गांधी की दृढ़ता बनाम मोदी का ‘सरेंडर’

अपनी बात को वजन देने के लिए राहुल गांधी ने 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान की ऐतिहासिक परिस्थितियों को याद किया। उन्होंने कहा कि एक समय था जब भारत ने महाशक्ति अमेरिका के सीधे सैन्य दबाव के बावजूद अपने राष्ट्रीय हितों से समझौता नहीं किया था। राहुल ने कहा, “आपको वह समय याद होगा जब केवल फोन कॉल नहीं आया था, बल्कि अमेरिका का ‘सातवां बेड़ा’ (Seventh Fleet) बंगाल की खाड़ी में आ गया था। उस बेड़े के साथ परमाणु हथियार और विमानवाहक पोत भी आए थे।”

राहुल गांधी ने आगे कहा कि उस भीषण दबाव के बावजूद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी तनिक भी विचलित नहीं हुईं। उन्होंने अमेरिका को स्पष्ट संदेश दिया था कि ‘मुझे जो करना है, मैं वही करूंगी।’ राहुल ने जोर देकर कहा कि यही वह असली नेतृत्व और साहस का फर्क है, जो एक मजबूत भारत की पहचान हुआ करता था। उन्होंने आरोप लगाया कि आज का नेतृत्व केवल घरेलू प्रचार में मजबूत दिखता है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय दबाव में तुरंत घुटने टेक देता है।

टैरिफ युद्ध और रूसी तेल का कूटनीतिक गणित

डोनाल्ड ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति के तहत भारतीय निर्यात पर लगाए गए 50 फीसदी टैरिफ ने भारतीय उद्योगपतियों और सरकार की चिंता बढ़ा दी है। ट्रंप का दावा है कि भारत अब तेल की खरीद को लेकर उनके साथ तालमेल बिठा रहा है क्योंकि उसे भारी आर्थिक कीमत चुकानी पड़ रही है। भारत अब तक यह कहता रहा है कि वह अपने ऊर्जा हितों के लिए किसी भी देश (रूस) से व्यापार करने के लिए स्वतंत्र है, लेकिन ट्रंप के बयान ने इस दावे की हवा निकाल दी है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि भारत ने वास्तव में रूसी तेल की खरीद कम की है, तो यह देश की ऊर्जा सुरक्षा और रूस के साथ दशकों पुराने रणनीतिक संबंधों को प्रभावित कर सकता है। राहुल गांधी इसी बिंदु को पकड़कर सरकार को घेर रहे हैं कि भारत की विदेश नीति अब स्वतंत्र रहने के बजाय वाशिंगटन के निर्देशों पर चलने लगी है।

भारतीय विदेश नीति पर उठते सवाल और भविष्य की राह

राहुल गांधी के इस हमले ने सरकार को रक्षात्मक मुद्रा में ला दिया है। विपक्ष का आरोप है कि प्रधानमंत्री की ‘हैंडशेक डिप्लोमेसी’ (हाथ मिलाने वाली कूटनीति) देश के आर्थिक हितों की रक्षा करने में विफल रही है। जहां एक ओर सरकार टैरिफ कम कराने में नाकाम रही है, वहीं दूसरी ओर उसे अपनी ऊर्जा नीति में भी बदलाव करना पड़ा है।

यह मुद्दा आने वाले दिनों में संसद और सार्वजनिक विमर्श में और गरमाने की उम्मीद है। राहुल गांधी ने स्पष्ट कर दिया है कि वह मोदी सरकार की ‘राष्ट्रवादी छवि’ को ट्रंप के बयानों के आईने में चुनौती देते रहेंगे। अब जनता की नजरें इस पर टिकी हैं कि विदेश मंत्रालय और प्रधानमंत्री कार्यालय ट्रंप के इन दावों और राहुल गांधी के आरोपों पर क्या आधिकारिक स्पष्टीकरण देते हैं।

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