प्यास बुझाने वाला पानी बना ‘जहर’: इंदौर से बेंगलुरु तक देश के बड़े शहरों में गहराता जल संकट और प्रशासनिक विफलता
नई दिल्ली: भारत एक तरफ ‘जल जीवन मिशन’ के माध्यम से ‘हर घर जल’ पहुंचाने के लक्ष्य की ओर तेजी से बढ़ रहा है, वहीं दूसरी तरफ देश के प्रमुख शहरों से आ रही दूषित पानी की खबरें एक भयावह हकीकत बयां कर रही हैं। केंद्र सरकार के आंकड़ों के अनुसार, अक्टूबर 2025 तक देश के करीब 15.72 करोड़ परिवारों तक नल से जल पहुंचाया जा चुका है। लेकिन विडंबना यह है कि पाइपलाइन के इस नेटवर्क के साथ-साथ बीमारी और मौत का सिलसिला भी घरों तक पहुंच रहा है। देश के सबसे स्वच्छ शहर इंदौर से लेकर हाई-टेक सिटी बेंगलुरु तक, दूषित पानी की समस्या ने सार्वजनिक स्वास्थ्य और नगर निगमों के दावों पर गंभीर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं।
इंदौर: स्वच्छता के शिखर पर बैठे शहर में 20 मौतों का मातम
मध्य प्रदेश का इंदौर शहर, जो लगातार कई वर्षों से देश का सबसे स्वच्छ शहर होने का गौरव प्राप्त कर रहा है, वहां के भागीरथपुरा इलाके से आई खबरों ने पूरे देश को झकझोर दिया है। भागीरथपुरा में दूषित पानी के सेवन से करीब 20 लोगों की मौत होने का मामला सामने आया है। हालांकि, सरकारी आंकड़ों और जमीनी हकीकत में भारी विरोधाभास नजर आता है। राज्य सरकार ने हाई कोर्ट में प्रस्तुत अपनी रिपोर्ट में केवल चार मौतों की पुष्टि की है, जबकि स्वास्थ्य विभाग की रिपोर्ट छह मौतों का जिक्र करती है। स्थानीय लोगों और नागरिक समाज का दावा है कि यह संख्या कहीं अधिक है।
इस त्रासदी की जांच में जो कारण सामने आया, वह प्रशासनिक लापरवाही का चरम उदाहरण है। भागीरथपुरा पुलिस चौकी के पास स्थित एक सार्वजनिक शौचालय के ठीक नीचे से मुख्य पेयजल पाइपलाइन गुजर रही थी। इस पाइपलाइन में लीकेज होने के कारण शौचालय का सीवेज सीधे पीने के पानी में मिल रहा था। इसी जहरीले मिश्रण की आपूर्ति हजारों घरों में हुई, जिससे न केवल मौतें हुईं बल्कि हजारों लोग गंभीर बीमारियों की चपेट में आ गए। यह घटना साबित करती है कि केवल बाहरी सफाई और रैंकिंग सुधारने से नागरिकों का जीवन सुरक्षित नहीं किया जा सकता, जब तक कि बुनियादी ढांचा दुरुस्त न हो।
उज्जैन: महाकाल की नगरी में काला पानी पीने की मजबूरी
धार्मिक नगरी उज्जैन के जयसिंहपुरा इलाके में भी हालात बेहद चिंताजनक हैं। वार्ड क्रमांक 34 स्थित भगत सिंह मार्ग की एक कॉलोनी के निवासी पिछले दो महीनों से नलों से आ रहे काले और बदबूदार पानी को पीने के लिए मजबूर हैं। यहां की पाइपलाइनों में नाली का गंदा पानी रिस कर मिल रहा है। लगभग 265 परिवारों का स्वास्थ्य दांव पर लगा है, लेकिन नगर निगम और संबंधित विभाग अब तक इस समस्या का ठोस समाधान निकालने में नाकाम रहे हैं। रहवासियों का आरोप है कि बार-बार शिकायतों के बावजूद अधिकारी केवल आश्वासन दे रहे हैं, जबकि घरों में आने वाला पानी नाली के पानी जैसा दिखाई देता है।
भोपाल: राजधानी के पानी में मिला ई-कोलाई बैक्टीरिया
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में भी स्थिति कुछ अलग नहीं है। नगर निगम द्वारा हाल ही में की गई जांच में शहर के चार स्थानों के पानी के नमूने फेल पाए गए हैं। सबसे डराने वाली बात यह है कि तीन स्थानों पर पानी में ‘ई-कोलाई’ (E. coli) नामक खतरनाक बैक्टीरिया मिला है, जो मानव मल के संदूषण का संकेत है। इस रिपोर्ट के सार्वजनिक होते ही नगर निगम ने प्रभावित इलाकों में भूगर्भ जल (ग्राउंड वाटर) के इस्तेमाल पर तत्काल रोक लगा दी है। प्रशासन ने लोगों को सलाह दी है कि वे सीधे तौर पर जमीन से निकलने वाले पानी का उपयोग न करें, क्योंकि यह बैक्टीरिया गंभीर संक्रमण और आंतों की बीमारियों का कारण बन सकता है।
गांधीनगर: टाइफाइड का प्रकोप और अस्पतालों में बढ़ती भीड़
गुजरात की राजधानी गांधीनगर में दूषित पानी ने एक बड़े स्वास्थ्य संकट का रूप ले लिया है। शहर के सेक्टर-24, 25, 26, 28 और आदिवाड़ा जैसे इलाकों में अचानक टाइफाइड के मरीजों की बाढ़ आ गई है। गांधीनगर सिविल अस्पताल की मेडिकल सुपरिटेंडेंट डॉ. मीता पारिख के अनुसार, पिछले कुछ दिनों में 100 से अधिक लोग टाइफाइड की शिकायत लेकर अस्पताल पहुंचे हैं, जिनमें बच्चों की संख्या काफी अधिक है। स्वास्थ्य विभाग द्वारा इन क्षेत्रों से लिए गए पानी के नमूनों की जांच में पाया गया कि पेयजल आपूर्ति सुरक्षित नहीं है। पाइपलाइनों में रिसाव और सीवेज के मिलने को ही इस संक्रमण का मुख्य कारण माना जा रहा है।
नोएडा और लखनऊ: उत्तर प्रदेश के प्रमुख शहरों में जल संकट
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ और दिल्ली से सटे ग्रेटर नोएडा में भी पानी की गुणवत्ता को लेकर हाहाकार मचा है। ग्रेटर नोएडा के सेक्टर डेल्टा-एक में दूषित पानी की आपूर्ति से दर्जनों लोग बीमार पड़ गए। हालात इतने बिगड़ गए कि सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र की मेडिकल टीमों को घर-घर जाकर लोगों की जांच करनी पड़ी। कई निवासी उल्टी, दस्त और डिहाइड्रेशन से पीड़ित पाए गए।
वहीं, लखनऊ में गोमती नदी का प्रदूषण सीधे तौर पर पेयजल को प्रभावित कर रहा है। ऐशबाग और बालागंज जलकल के लिए जहां से कच्चा पानी लिया जाता है, वहां नदी में सीधे सीवर और नालों का गंदा पानी मिल रहा है। जल निगम का सीवेज पंपिंग स्टेशन अपनी क्षमता से कम काम कर रहा है, जिसके कारण शोधन के बिना ही प्रदूषित पानी नदी में जा रहा है। यही पानी फिल्टर होकर जब घरों तक पहुंचता है, तो वह पूरी तरह शुद्ध नहीं होता, जिससे राजधानी के बड़े हिस्से में जलजनित बीमारियों का खतरा बना रहता है।
काशीपुर और ऊधमसिंह नगर: उत्तराखंड में दशकों पुरानी पाइपलाइनों का बोझ
उत्तराखंड के काशीपुर और खटीमा जैसे इलाकों में दूषित पानी की समस्या का मुख्य कारण पुराना और जर्जर बुनियादी ढांचा है। काशीपुर के आठ मोहल्लों में दशकों पुरानी पाइपलाइनें बिछी हुई हैं, जो अब जगह-जगह से गल चुकी हैं। लीकेज के कारण मिट्टी और गंदगी पानी में मिलकर घरों तक पहुंच रही है। ऊधमसिंह नगर के खटीमा में तो स्थिति इतनी खराब हो गई कि वार्ड नंबर 14 के निवासियों को जल संस्थान कार्यालय के बाहर प्रदर्शन करना पड़ा। लोगों का कहना है कि वे सालों से टैक्स भर रहे हैं, लेकिन उन्हें पानी खरीदकर पीना पड़ रहा है क्योंकि नलों से केवल कीचड़ युक्त पानी निकल रहा है।
सोनीपत और बेंगलुरु: आधुनिक शहरों में तकनीकी और प्रबंधन की विफलता
हरियाणा के सोनीपत में यमुना से आने वाली मुख्य रेनीवाल लाइन में लीकेज के कारण 10 हजार से ज्यादा लोग दूषित पेयजल की आपूर्ति झेल रहे हैं। सेक्टर-3 के पास हुई इस लीकेज से गंदा पानी पेयजल आपूर्ति में मिल रहा है, जिससे लहराड़ा और कालूपुर जैसी घनी बस्तियों में बीमारियां फैल रही हैं।
दूसरी ओर, देश की सिलिकॉन वैली कहे जाने वाले बेंगलुरु में भी एक अजीबोगरीब मामला सामने आया। लिंगराजपुरम इलाके में जब जल आपूर्ति बोर्ड ने रोबोटिक सर्वे कराया, तो पता चला कि 40 साल पुरानी पेयजल पाइपलाइन के भीतर एक घर से सीवेज का रिसाव हो रहा था। इस तकनीकी जांच के बाद 30 घरों को तुरंत पानी का उपयोग बंद करने का आदेश दिया गया। यह मामला दर्शाता है कि योजनाबद्ध तरीके से विकसित शहरों में भी यदि पाइपलाइनों का नियमित रखरखाव न हो, तो वे जानलेवा साबित हो सकती हैं।
निष्कर्ष: केवल कनेक्शन नहीं, गुणवत्ता पर ध्यान देने की आवश्यकता
देश के विभिन्न शहरों से आ रही ये रिपोर्टें इस बात की गवाह हैं कि दूषित पानी की समस्या केवल एक स्थानीय मुद्दा नहीं है, बल्कि यह एक राष्ट्रीय संकट बनता जा रहा है। पाइपलाइनों का पुराना होना, सीवेज लाइनों का पेयजल लाइनों के करीब होना और नगर निगमों की लापरवाही इस समस्या की जड़ में है। सरकार की ‘हर घर जल’ योजना का लाभ तभी सार्थक होगा जब नल से निकलने वाला पानी वास्तव में पीने योग्य हो। इंदौर जैसी घटनाओं से सबक लेते हुए अब समय आ गया है कि जल आपूर्ति के ऑडिट और बुनियादी ढांचे के आधुनिकीकरण को प्राथमिकता दी जाए, ताकि विकास की दौड़ में आम नागरिक की जान की कीमत न चुकानी पड़े।