• March 4, 2026

Story Of Baba Saheb: बाबा साहेब के साथ हुई नेहरू-कांग्रेस की नाइंसाफी, गांधी पर उनके विचारों को पॉलिटिकल पार्टियों ने क्यों छिपाया?

Story Of Baba Saheb: यह कहानी हर उस व्यक्ति के लिए है जिसे लगता है कि किस्मत ने उसके साथ न्याय नहीं किया। बात सवा सौ साल पहले की है, जब एक छोटे बच्चे, भीमराव अंबेडकर (B.R. Ambedkar) को सिर्फ उनकी जाति के कारण स्कूल में बाकी बच्चों से दूर, सबसे आखिरी लाइन में बैठना पड़ता था, जहाँ जूते पड़े होते थे। उन्हें स्कूल के मटके से पानी तक छूने की इजाजत नहीं थी, और उन्हें अपनी दरी तक घर से लानी पड़ती थी। एक पल के लिए कल्पना कीजिए, 5 साल का बच्चा जो हर पल डर में जी रहा है। मगर इसी अपमान और जिल्लत के बावजूद, उस बच्चे ने हार नहीं मानी। उन्होंने न केवल अपनी पढ़ाई पूरी की, बल्कि अपनी जिंदगी में 3 पीएचडी और 35 डिग्रियां हासिल कीं, जिनकी बराबरी शायद ही कोई भारतीय कर पाया हो। लेकिन हैरानी की बात यह है कि इस महान बुद्धिजीवी को देश की पॉलिटिकल पार्टियों ने सिर्फ दलित राजनीति तक ही क्यों सीमित रखा? उनके तीखे और ईमानदार विचार क्यों छिपाए गए? तो चलिए जानते हैं पूरा मामला क्या है, जानते हैं विस्तार से…

अपमान और अदम्य शिक्षा की ललक

डॉ. भीमराव अंबेडकर (Dr. B.R. Ambedkar) का जन्म ऐसे समय में हुआ, जब उनकी जाति के बच्चों को स्कूल जाने की इजाजत नहीं थी। चूंकि उनके पिताजी भारतीय सेना (Indian Army) में सूबेदार के पद पर थे, इसलिए उन्हें स्कूल में प्रवेश तो मिल गया। लेकिन स्कूल में उन्हें सामाजिक बहिष्कार (Social Exclusion) का सामना करना पड़ा। कोई बच्चा उनसे बात नहीं करता था, साथ में खाना नहीं खाता था, और उन्हें उस मटके को छूने तक की इजाजत नहीं थी जिससे बाकी बच्चे पानी पीते थे। उन्हें क्लास की सबसे आखिरी लाइन में, बाकी बच्चों के जूतों के पास अकेले बैठना होता था और दरी भी घर से लानी पड़ती थी। इस निरंतर अपमान और जिल्लत के बावजूद, बाबा साहेब ने अपनी पढ़ाई को ढाल बनाया। उन्होंने विदेश में पढ़ने के लिए वजीफा (Scholarship) प्राप्त किया। उन्होंने कोलंबिया यूनिवर्सिटी (Columbia University) से इकोनॉमिक्स (Economics) में एम.ए. किया, उन्हें लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स (London School of Economics) से डॉक्टर ऑफ साइंस की उपाधि मिली। उनकी व्यक्तिगत लाइब्रेरी में 35,000 किताबें थीं। यह साबित करता है कि “शिक्षा शेरनी के दूध की तरह होती है, जो जितना पीता है, वह उतनी तेज़ी से दहाड़ सकता है।”

गांधी जी और वर्ण व्यवस्था पर बेबाक विचार

बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर (Dr. B.R. Ambedkar) का बौद्धिक स्तर इतना ऊँचा था कि उनकी राय अर्थशास्त्र (Economics) से लेकर कानून (Law), राजनीति (Politics) और सोशल साइंस (Social Science) जैसे विषयों पर समान रूप से मजबूत थी। लेकिन उनकी ईमानदारी उन्हें अन्य नेताओं से अलग करती थी। वह खुलकर अपनी राय रखते थे, जैसे कि वह महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) को ‘महात्मा’ नहीं मानते थे। 1953 में बीबीसी (BBC) को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने गांधी जी पर तीखी राय रखते हुए कहा कि पश्चिमी दुनिया गांधी जी को लेकर इतना बावला क्यों रहती है? उन्होंने गांधी जी को रूढ़िवादी हिंदू (Conservative Hindu) बताया, जो वर्ण व्यवस्था (Varna System) में यकीन रखते थे। अंबेडकर जी ने यह भी आरोप लगाया कि गांधी जी ने अपने विचारों से लोगों को धोखा दिया। उन्होंने उदाहरण दिया कि गांधी जी ने अपने दो अखबार—’हरिजन’ (अंग्रेजी में) और ‘दीनबंधु’ (गुजराती में)—निकाले। अंग्रेजी अखबार में उन्होंने खुद को जाति व्यवस्था का विरोधी बताया, जबकि गुजराती अखबार में उनके विचार रूढ़िवादी थे, क्योंकि उन्हें अच्छे से पता था कि गुजराती पाठकों को अपनी ओर खींचने के लिए क्या लिखना है।

नेहरू और कांग्रेस द्वारा राजनीतिक अपमान

डॉ. अंबेडकर (Dr. B.R. Ambedkar) और कांग्रेस (Congress) पार्टी के बीच टकराव केवल वैचारिक नहीं, बल्कि राजनीतिक भी था। जब संविधान (Constitution) बनाने की बारी आई, तो पहले जवाहरलाल नेहरू (Jawaharlal Nehru) नहीं चाहते थे कि बाबा साहेब को संविधान सभा में शामिल किया जाए। वह मुस्लिम लीग (Muslim League) के समर्थन से संयुक्त बंगाल (United Bengal) से जीतकर संविधान सभा में आए, लेकिन देश के बंटवारे (Partition) के बाद उनकी सदस्यता रद्द हो गई। बाद में उन्हें फिर शामिल किया गया। नेहरू मंत्रिमंडल में कानून मंत्री बनने के बाद, जब अंबेडकर ने महिलाओं को पुरुषों के बराबर हक दिलाने के लिए यूनिफॉर्म सिविल कोड (Uniform Civil Code) और हिंदू कोड बिल (Hindu Code Bill) लाने की कोशिश की, तो नेहरू इसके लिए तैयार नहीं हुए। इसी से नाराज होकर बाबा साहेब ने मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया। कांग्रेस का गुस्सा यहीं शांत नहीं हुआ। 1952 के आम चुनाव में, नेहरू जी ने बाबा साहेब को हराने के लिए उनकी मुंबई नॉर्थ सीट (Mumbai North Seat) पर उनके ही असिस्टेंट नारायण कजरोलकर (Narayan Kajrolkar) को उतारा। नेहरू ने खुद कजरोलकर के पक्ष में दो-दो रैलियां कीं और बाबा साहेब 17,000 वोटों से चुनाव हार गए।

बाबा साहेब के विचार क्यों छिपाए गए?

यह देखकर बड़ा अफसोस होता है कि जिन बाबा साहेब (Dr. B.R. Ambedkar) ने अपनी मेहनत और वजीफे के दम पर दुनिया के सबसे बड़े कॉलेजों से पढ़ाई की, उन्हें जीवन भर अपमानित होना पड़ा, और आजादी के बाद नेहरू जी ने उनका राजनीतिक करियर खत्म कर दिया। हैरानी यह है कि 1956 में उनकी मृत्यु के बावजूद, संसद के सेंट्रल हॉल (Central Hall) में उनकी तस्वीर 1990 तक नहीं लगाई गई, जो उनकी उपेक्षा का स्पष्ट प्रमाण है। आज की पार्टियाँ जो जय मीम और जय भीम की बात करती हैं, या जो कांग्रेस पार्टी खुद को गांधी जी का उत्तराधिकारी बताती है, वे खुलकर क्यों नहीं बतातीं कि अंबेडकर जी के गांधी जी पर क्या विचार थे, या नेहरू जी ने उन्हें हराने के लिए क्या किया? सच तो यह है कि बाबा साहेब सिर्फ बराबरी की बात करते थे। उन्होंने न केवल नीची जातियों, बल्कि औरतों के हक के लिए भी समान रूप से लड़ाई लड़ी। उन्होंने जहाँ हिंदू धर्म में पाखंड का विरोध किया, वहीं उन्होंने अपनी किताब ‘पाकिस्तान या भारत का विभाजन’ में कट्टरपंथी इस्लाम (Radical Islam) पर भी स्पष्ट राय रखते हुए लिखा कि मुसलमान खुद को पहले मुसलमान मानेंगे, फिर भारतीय। आज जरूरत है कि हम उन्हें सिर्फ दलित राजनीति से ऊपर उठकर पढ़ें और उनके विशाल बौद्धिक स्पेक्ट्रम से सीख लें।

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