• June 30, 2026

साउथ अफ्रीका में अवैध प्रवासियों पर शिकंजा: 30 जून की डेडलाइन के बीच 25 हजार लोगों का पलायन, बढ़ा हिंसा का खतरा

जोहान्सबर्ग: साउथ अफ्रीका में अवैध प्रवासियों के खिलाफ चल रहा विरोध अब गंभीर मानवीय संकट का रूप लेता दिखाई दे रहा है। कट्टरपंथी नागरिक समूहों ने बिना वैध दस्तावेज वाले विदेशी नागरिकों को 30 जून तक देश छोड़ने की चेतावनी दी थी। डेडलाइन समाप्त होने से पहले ही करीब 25 हजार प्रवासी देश छोड़ चुके हैं। वहीं हिंसा, धमकियों और डर के माहौल के चलते हजारों लोग राहत शिविरों में शरण लेने को मजबूर हैं। हालात को देखते हुए सरकार ने संवेदनशील इलाकों में भारी पुलिस बल तैनात किया है।

अब तक क्या हुआ?

हाल के दिनों में साउथ अफ्रीका में प्रवासियों के खिलाफ हिंसा की कई घटनाएं सामने आई हैं। ताजा अशांति में मोजाम्बिक के दो और मलावी के एक नागरिक की हत्या कर दी गई। पुलिस इन मामलों की जांच कर रही है। बॉर्डर मैनेजमेंट अथॉरिटी (BMA) के अनुसार, जून महीने में 988 घाना और करीब 600 नाइजीरिया के नागरिक हवाई मार्ग से अपने देशों लौट चुके हैं। इसके अलावा 15 हजार से अधिक लोग जमीनी रास्ते से जिम्बाब्वे, मलावी और मोजाम्बिक की सीमाएं पार कर चुके हैं। कुल मिलाकर हाल के हफ्तों में करीब 25 हजार प्रवासी साउथ अफ्रीका छोड़ चुके हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, कई इलाकों में स्थानीय लोग विदेशी नागरिकों के दस्तावेज जांचने की मांग कर रहे हैं। कुछ जगहों पर मकान मालिकों और नियोक्ताओं ने भी प्रवासियों से घर और नौकरी छोड़ने को कहा, क्योंकि उन्हें कार्रवाई या भीड़ के हमले का डर था।

कई देशों ने शुरू कराई नागरिकों की वापसी

हिंसा और धमकियों के बढ़ते मामलों के बीच केन्या, युगांडा और डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो समेत कई अफ्रीकी देशों ने अपने नागरिकों की स्वैच्छिक वापसी की व्यवस्था शुरू कर दी है। वहीं हजारों विदेशी नागरिक डरबन, जोहान्सबर्ग और केप टाउन में बनाए गए अस्थायी राहत शिविरों में अपने घर लौटने के इंतजार में हैं। सरकार ने लोगों से शांति बनाए रखने की अपील करते हुए कहा है कि अवैध प्रवासियों के खिलाफ कार्रवाई कानून के तहत की जा रही है। साथ ही सीमा सुरक्षा और दस्तावेज जांच को भी और सख्त किया जाएगा।

कौन चला रहा है यह आंदोलन?

इस विरोध की अगुवाई छोटे राजनीतिक दलों और स्थानीय नागरिक समूहों द्वारा की जा रही है। कई प्रदर्शनकारियों को पारंपरिक जुलू पोशाक और हाथों में लाठी-ढाल के साथ मार्च करते देखा गया। इन समूहों का आरोप है कि अवैध प्रवासी अपराध बढ़ा रहे हैं और स्थानीय लोगों की नौकरियां छीन रहे हैं। हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह आंदोलन केवल अवैध प्रवास का मुद्दा नहीं है। उनका कहना है कि इसके पीछे राजनीतिक लाभ हासिल करने की कोशिश भी शामिल है। विशेषज्ञों के अनुसार, सोशल मीडिया के जरिए भ्रामक जानकारी फैलाकर लोगों की नाराजगी को प्रवासियों के खिलाफ मोड़ा जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषक सैंडिले स्वाना का कहना है कि यह आंदोलन देश के आर्थिक संकट के असली कारणों से लोगों का ध्यान भटका रहा है और अश्वेत समुदायों के बीच टकराव को बढ़ावा दे रहा है।

सरकार को क्यों सता रहा है पुराना डर?

साउथ अफ्रीका सरकार को वर्ष 2021 में हुए भीषण दंगों की याद भी परेशान कर रही है। उस दौरान हिंसा और लूटपाट में करीब 350 लोगों की मौत हुई थी। इसी वजह से इस बार प्रशासन ने पहले से ही सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी है ताकि किसी बड़े उपद्रव को रोका जा सके।

अभी क्यों भड़का विवाद?

पिछले साल के अंत में बिना वैध दस्तावेज वाले विदेशी नागरिकों को सरकारी अस्पतालों और क्लीनिकों में इलाज से रोके जाने के बाद विरोध की शुरुआत हुई थी। इस वर्ष कई समूहों ने अवैध प्रवासियों को 30 जून तक देश छोड़ने की चेतावनी दी, जिसके बाद तनाव और बढ़ गया। विशेषज्ञों का मानना है कि इस पूरे विवाद की जड़ में साउथ अफ्रीका की करीब 33 प्रतिशत बेरोजगारी, बढ़ता अपराध, संसाधनों पर दबाव और आर्थिक संकट है। नवंबर में होने वाले स्थानीय निकाय चुनावों से पहले राजनीतिक दल भी इस मुद्दे को चुनावी लाभ के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। साउथ अफ्रीका में फिलहाल करीब 30 लाख प्रवासी रहते हैं, जो देश की कुल आबादी का लगभग 5.1 प्रतिशत हैं। इनमें से 63 प्रतिशत से अधिक लोग दक्षिणी अफ्रीका के पड़ोसी देशों से आए हैं, जहां आर्थिक संकट और राजनीतिक अस्थिरता लगातार बनी हुई है।

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