• February 11, 2026

आरएसएस संघचालक का पद जाति की बेड़ियों से मुक्त, केवल ‘हिंदू’ होना ही एकमात्र पात्रता: मोहन भागवत

मुंबई। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में मुंबई में आयोजित एक गरिमामय कार्यक्रम के दौरान संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत ने संगठन की कार्यप्रणाली, भविष्य की दिशा और नेतृत्व चयन की प्रक्रिया को लेकर कई महत्वपूर्ण और दूरगामी बातें साझा कीं। इस कार्यक्रम में देश की कई जानी-मानी हस्तियों की उपस्थिति के बीच भागवत ने स्पष्ट किया कि संघ के सर्वोच्च पद यानी सरसंघचालक के लिए जाति कोई पैमाना नहीं है। उन्होंने इस प्रचलित धारणा को सिरे से खारिज कर दिया कि यह पद किसी विशेष जाति के लिए आरक्षित है। भागवत के अनुसार, संघ का प्रमुख बनने के लिए ब्राह्मण, क्षत्रिय या किसी अन्य विशिष्ट जाति का होना कतई अनिवार्य नहीं है। इस जिम्मेदारी के लिए केवल एक ही मूलभूत शर्त है और वह यह कि व्यक्ति का हिंदू होना आवश्यक है। उन्होंने जोर देकर कहा कि संघ की विचार प्रक्रिया में जाति के आधार पर पद का चयन नहीं किया जाता, बल्कि योग्यता और वैचारिक प्रतिबद्धता ही सर्वोपरि होती है।

नेतृत्व परिवर्तन और अपनी भूमिका पर चर्चा करते हुए मोहन भागवत ने संगठन के भीतर के अनुशासन और निर्णय लेने की पद्धति पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि उनकी आयु 75 वर्ष हो चुकी है और उन्होंने स्वयं संगठन के समक्ष अपनी उम्र का विषय रखा था। आमतौर पर सामाजिक और सांगठनिक जीवन में यह माना जाता है कि 75 वर्ष की आयु के पश्चात व्यक्ति को सक्रिय पदों से मुक्त होकर मार्गदर्शन की भूमिका में आना चाहिए। हालांकि, संघ में पद छोड़ने या बने रहने का निर्णय कोई व्यक्ति स्वयं नहीं लेता, बल्कि यह निर्णय संगठन की सामूहिक इच्छा पर निर्भर करता है। भागवत ने बताया कि उनके द्वारा अपनी आयु का उल्लेख किए जाने के बावजूद संघ ने उन्हें वर्तमान जिम्मेदारी को जारी रखने का निर्देश दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि आरएसएस प्रमुख का चयन किसी चुनावी प्रक्रिया के जरिए नहीं होता, बल्कि विभिन्न क्षेत्रों और प्रांतों के प्रमुख आपस में विचार-विमर्श कर सरसंघचालक का चयन करते हैं। भागवत ने यह भी कहा कि भले ही वे पद से कभी भी मुक्त हो जाएं, लेकिन राष्ट्र सेवा के कार्य से वे कभी सेवानिवृत्त नहीं होंगे।

संगठन की कार्यशैली पर बात करते हुए उन्होंने एक रोचक टिप्पणी की कि आरएसएस अपने स्वयंसेवकों से उनके जीवन के अंतिम क्षण तक और सामर्थ्य की आखिरी बूंद तक काम लेता है। संघ के इतिहास का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि यहां किसी को भी जबरन रिटायर नहीं किया गया है। परिस्थितियों के प्रति दृष्टिकोण पर उन्होंने स्वयंसेवकों और समाज को समाधानपरक होने की सलाह दी। भागवत का मानना है कि जीवन में परिस्थितियां कभी अनुकूल होती हैं तो कभी अत्यंत कठिन, लेकिन व्यक्ति को कठिन परिस्थितियों के बारे में अनावश्यक चिंता करने के बजाय उनका हल निकालने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। उन्होंने कहा कि जब तक हम सत्य की गहराई तक नहीं पहुंचते, तब तक समाज में विभिन्न विषयों को लेकर भ्रम की स्थिति बनी रहती है।

आरएसएस और प्रचार माध्यमों के बीच के संबंधों पर भी मोहन भागवत ने संघ का पारंपरिक रुख स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि संघ का मूल उद्देश्य चुनावी राजनीति में हिस्सा लेना या आत्म-प्रचार करना नहीं है, बल्कि समाज में संस्कारों का बीजारोपण करना है। उन्होंने प्रचार की तुलना बारिश से करते हुए कहा कि यह केवल समय पर और आवश्यकतानुसार ही होनी चाहिए। अत्यधिक प्रचार से संगठन और व्यक्ति के भीतर अहंकार आने का खतरा रहता है, जो संघ के मूल्यों के विपरीत है। यही कारण है कि संघ अपने कार्यों का ढिंढोरा पीटने के बजाय चुपचाप जमीनी स्तर पर काम करने में विश्वास रखता है।

भाषा के विवादित और संवेदनशील विषय पर भी सरसंघचालक ने संतुलित विचार रखे। उन्होंने स्पष्ट किया कि आरएसएस के आंतरिक कामकाज में अंग्रेजी माध्यम नहीं होगी, क्योंकि यह भारत की मूल भाषा नहीं है। लेकिन उन्होंने यह भी जोड़ा कि संघ अंग्रेजी भाषा का विरोधी नहीं है। जहां भी आवश्यकता होती है, वहां अंग्रेजी का उपयोग किया जाता है। भागवत ने कहा कि हमें अंग्रेजी इस स्तर की बोलनी चाहिए कि मूल अंग्रेजी भाषी भी उसे प्रभावित होकर सुनें, परंतु इस प्रक्रिया में अपनी मातृभाषा का त्याग करना या उसे भूलना कदापि उचित नहीं है। उन्होंने बेंगलुरु और विदेशों के अपने अनुभवों को साझा करते हुए बताया कि जब दक्षिण भारत में लोग हिंदी नहीं समझ पाते, तो वे अंग्रेजी में संवाद करते हैं, जबकि विदेशों में बसे भारतीयों से वे हिंदी या उनकी संबंधित मातृभाषा में बात करना पसंद करते हैं।

इस विस्तृत संबोधन के माध्यम से मोहन भागवत ने यह संदेश देने का प्रयास किया है कि आरएसएस एक समावेशी संगठन है जो जातिगत भेदभाव से ऊपर उठकर केवल हिंदू पहचान और राष्ट्रभक्ति को प्राथमिकता देता है। शताब्दी वर्ष के इस पड़ाव पर उन्होंने संगठन की लोकतांत्रिक और सामूहिक निर्णय प्रक्रिया को रेखांकित करते हुए यह स्पष्ट कर दिया कि संघ में व्यक्ति से बड़ा संगठन और संगठन से बड़ा विचार होता है। उनके इस बयान को भविष्य में संघ के नेतृत्व में आने वाले संभावित बदलावों और सामाजिक समरसता की दिशा में एक बड़े कदम के रूप में देखा जा रहा है।

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