• January 8, 2026

ट्रंप की टैरिफ चेतावनी पर भारत में सियासी घमासान: कांग्रेस का केंद्र पर तंज, कहा- ‘नमस्ते ट्रंप’ और ‘जबरन गले मिलने’ से कुछ हासिल नहीं हुआ

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत पर टैरिफ (आयात शुल्क) बढ़ाने की हालिया चेतावनी ने भारत के राजनीतिक गलियारों में एक नया विवाद छेड़ दिया है। ट्रंप के इस बयान के बाद मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने केंद्र की मोदी सरकार की विदेश नीति और व्यक्तिगत कूटनीति पर तीखे सवाल उठाए हैं। कांग्रेस ने तंज कसते हुए कहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और डोनाल्ड ट्रंप के बीच की कथित ‘घनिष्ठ मित्रता’, ‘हाउडी मोदी’ जैसे भव्य आयोजन और ‘जबरन गले मिलने’ की कूटनीति भारत के आर्थिक हितों की रक्षा करने में विफल रही है। यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब ट्रंप ने रूस से तेल खरीदने के मुद्दे पर भारत को एक बार फिर कड़े आर्थिक परिणामों की चेतावनी दी।

ट्रंप का ‘कभी नरम, कभी सख्त’ रवैया: रूसी तेल बना विवाद की जड़

सोमवार को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने व्हाइट हाउस में और एयर फोर्स वन में पत्रकारों से बातचीत के दौरान भारत के प्रति अपनी ‘हॉक’ (सख्त) नीति के संकेत दिए। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि वॉशिंगटन नई दिल्ली पर बहुत जल्द टैरिफ बढ़ा सकता है। ट्रंप का यह बयान मुख्य रूप से भारत द्वारा रूस से तेल के निरंतर आयात पर केंद्रित था। ट्रंप ने कहा कि हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक “बहुत अच्छे इंसान” और “नेक दिल” व्यक्ति हैं, लेकिन वे यह भी अच्छी तरह जानते हैं कि अमेरिका भारत के रूसी तेल व्यापार से खुश नहीं है।

ट्रंप ने अपने चिर-परिचित अंदाज में कहा, “उन्हें (मोदी को) पता था कि मैं खुश नहीं हूं, इसलिए मुझे खुश करना उनके लिए जरूरी था। वे रूस से व्यापार करते हैं और हम उन पर बहुत जल्दी टैरिफ बढ़ा सकते हैं। यह उनके लिए बहुत बुरा होगा।” ट्रंप का यह बयान दर्शाता है कि वे द्विपक्षीय संबंधों में व्यक्तिगत प्रशंसा और कूटनीतिक दबाव के बीच एक महीन रेखा पर चल रहे हैं, जिसे कांग्रेस ने ‘कभी नरम, कभी सख्त’ (Blow hot, blow cold) रवैया करार दिया है।

कांग्रेस का पलटवार: ‘नमस्ते ट्रंप’ और ‘हाउडी मोदी’ पर उठाए सवाल

अमेरिकी राष्ट्रपति के इस बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर मोदी सरकार को आड़े हाथों लिया। रमेश ने कहा कि प्रधानमंत्री के “करीबी दोस्त” कहे जाने वाले ट्रंप ने एक बार फिर भारत को धमकी दी है। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर व्यक्तिगत मित्रता इतनी ही प्रगाढ़ थी, तो भारत के व्यापारिक हितों पर इस तरह का खतरा क्यों मंडरा रहा है?

जयराम रमेश ने अपने पोस्ट में लिखा, “वे सभी नमस्ते ट्रंप और हाउडी मोदी के भव्य कार्यक्रम, वे सभी (जबरदस्ती के) गले मिलना और अमेरिकी राष्ट्रपति की प्रशंसा करने वाले सोशल मीडिया पोस्ट बहुत कम कारगर साबित हुए हैं।” कांग्रेस का तर्क है कि प्रधानमंत्री मोदी ने ट्रंप के साथ अपनी केमिस्ट्री को जिस तरह से प्रचारित किया था, उसका ठोस लाभ देश को मिलने के बजाय भारत को अब अतिरिक्त टैरिफ की धमकी मिल रही है। विपक्षी दल का मानना है कि केवल कार्यक्रमों और दिखावे की कूटनीति से देश की अर्थव्यवस्था को सुरक्षा नहीं दी जा सकती।

सीनेटर लिंडसे ग्राहम की 500 प्रतिशत टैरिफ वाली चेतावनी

इस पूरे विवाद में अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम के बयानों ने आग में घी डालने का काम किया है। ग्राहम, जो ट्रंप के करीबी माने जाते हैं, एयर फोर्स वन में राष्ट्रपति के साथ मौजूद थे। उन्होंने कहा कि अमेरिका ने रूसी तेल खरीदने पर भारत पर पहले ही 25 प्रतिशत का टैरिफ लगाया है और इसी का परिणाम है कि भारत ने रूस से तेल खरीदना कम कर दिया है।

ग्राहम यहीं नहीं रुके; उन्होंने अपने उस प्रस्तावित ‘टैरिफ बिल’ का जिक्र किया जिसका उद्देश्य रूसी तेल खरीदने वाले देशों से होने वाले आयात पर 500 प्रतिशत तक का भारी-भरकम शुल्क लगाना है। ग्राहम का तर्क है कि रूस-यूक्रेन संघर्ष को समाप्त करने के लिए व्लादिमीर पुतिन के ‘ग्राहकों’ पर दबाव डालना आवश्यक है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत जैसे देश, जो रूस के लिए राजस्व का बड़ा स्रोत हैं, उन्हें आर्थिक दंड का सामना करना होगा। ग्राहम की यह टिप्पणी भारत के लिए चिंता का विषय है क्योंकि 500 प्रतिशत टैरिफ का मतलब भारतीय निर्यात का अमेरिकी बाजार में पूरी तरह से खत्म हो जाना होगा।

रूस को नुकसान और भारत पर दबाव: अमेरिका की रणनीति

डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार को यह भी दावा किया कि उनके द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों से रूस को “बहुत नुकसान” हो रहा है। ट्रंप प्रशासन की रणनीति यह है कि रूस को आर्थिक रूप से अलग-थलग करने के लिए उसके बड़े व्यापारिक साझेदारों पर शिकंजा कसा जाए। इस कड़ी में भारत सबसे महत्वपूर्ण देश बनकर उभरा है। यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए रूस से सस्ते तेल का आयात जारी रखा है, जिसे अमेरिका अपनी प्रतिबंध नीति में एक बड़ी बाधा मानता है।

ट्रंप के बयानों से यह साफ है कि वे भारत को ‘कैरोट एंड स्टिक’ (लालच और डंडा) की नीति से साधने की कोशिश कर रहे हैं। एक तरफ वे पीएम मोदी को “नेक इंसान” बताते हैं और दूसरी तरफ टैरिफ के जरिए भारतीय अर्थव्यवस्था पर चोट करने की धमकी देते हैं। भारत के लिए यह स्थिति काफी जटिल हो गई है, क्योंकि अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है और वहां से मिलने वाला अधिशेष भारत के लिए महत्वपूर्ण है।

भारत-अमेरिका व्यापारिक संबंधों में तनाव के नए आयाम

विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप का यह रवैया भारत-अमेरिका के सामरिक संबंधों के लिए एक चुनौतीपूर्ण समय का संकेत है। हालांकि दोनों देश चीन के मुद्दे पर एक साथ हैं, लेकिन व्यापार और रूस के मुद्दे पर उनके बीच गहरी खाई दिखाई दे रही है। भारत हमेशा यह कहता आया है कि वह अपनी स्वतंत्र विदेश नीति का पालन करता है और अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए तेल कहीं से भी खरीदने का अधिकार रखता है।

लेकिन ट्रंप प्रशासन के आने के बाद, अमेरिका का रुख अधिक लेन-देन (Transactional) वाला हो गया है। ट्रंप के लिए ‘अमेरिका फर्स्ट’ सर्वोपरि है, और वे किसी भी मित्र देश को व्यापारिक रियायत देने के मूड में नहीं दिख रहे हैं, खासकर तब जब वह देश रूस जैसे अमेरिका के प्रतिद्वंद्वी के साथ खड़ा दिखाई दे। कांग्रेस इसी मुद्दे को उठाते हुए कह रही है कि सरकार की वर्तमान विदेश नीति भारत को अंतरराष्ट्रीय मंच पर दबाव में ला रही है।

निष्कर्ष: क्या कूटनीति से सुलझेगा टैरिफ का पेच?

डोनाल्ड ट्रंप की धमकी और कांग्रेस के सियासी हमले के बीच अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि भारत सरकार इस स्थिति से कैसे निपटती है। क्या भारत रूस से तेल खरीदना कम करेगा या फिर अमेरिका को यह समझाने में सफल होगा कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा उसके लिए क्यों महत्वपूर्ण है?

कांग्रेस ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्वाभिमान और आर्थिक सुरक्षा से जोड़ दिया है। ‘नमस्ते ट्रंप’ जैसे आयोजनों की सफलता अब इस बात पर निर्भर करेगी कि वे भविष्य में भारत को इन भारी-भरकम टैरिफ से बचा पाते हैं या नहीं। फिलहाल, ट्रंप और ग्राहम की इन टिप्पणियों ने भारतीय निर्यातकों और नीति निर्माताओं की नींद उड़ा दी है। यदि अमेरिका वास्तव में टैरिफ बढ़ाता है, तो यह भारतीय फार्मा, आईटी और कपड़ा उद्योग के लिए एक बड़ा संकट साबित हो सकता है।

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