• January 20, 2026

न्यायिक सक्रियता: उच्च न्यायालयों में अहम याचिकाओं पर सुनवाई, राष्ट्रीय सुरक्षा से लेकर जेंडर न्यूट्रल कानूनों पर मंथन

नई दिल्ली: देश की न्यायिक व्यवस्था आज कई ऐसे संवेदनशील मामलों की गवाह बन रही है, जिनके फैसले भविष्य की राजनीति और सामाजिक नीतियों की दिशा तय करेंगे। दिल्ली से लेकर कर्नाटक और उत्तर प्रदेश तक, उच्च न्यायालयों में आज रक्षा घोटालों, राजनीतिक रसूख, अंतरराष्ट्रीय पारिवारिक विवादों और कानूनी समानता जैसे गंभीर विषयों पर सुनवाई हो रही है। इन याचिकाओं में न केवल व्यक्तिगत अधिकारों की मांग की गई है, बल्कि केंद्र और राज्य सरकारों की कार्यप्रणाली को भी चुनौती दी गई है।

ऑगस्टावेस्टलैंड मामला: केंद्र ने दिल्ली हाईकोर्ट में दी चुनौती

राष्ट्रीय सुरक्षा और रक्षा सौदों में भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों से घिरे ऑगस्टावेस्टलैंड हेलीकॉप्टर घोटाले में एक नया कानूनी मोड़ आया है। केंद्र सरकार ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस हालिया आदेश को चुनौती दी है, जिसमें अदालत ने घोटाले से जुड़ी एक प्रमुख रक्षा उपकरण निर्माता कंपनी पर लगे निलंबन को रद्द कर दिया था। सरकार का पक्ष है कि रक्षा सौदों में पारदर्शिता और ईमानदारी सर्वोपरि है।

केंद्र सरकार ने अपनी दलील में स्पष्ट किया है कि संबंधित कंपनी पर निलंबन की अवधि बढ़ाना राष्ट्रीय हितों के लिए आवश्यक था। सरकार के अनुसार, मामले की संवेदनशीलता और चल रही जांच को देखते हुए ऐसी कंपनियों पर कड़ी निगरानी रखना अनिवार्य है ताकि भविष्य के सैन्य अनुबंधों की शुचिता बनी रहे। इस याचिका पर हाईकोर्ट का रुख यह तय करेगा कि जांच के घेरे में आई कंपनियों के प्रति प्रशासनिक सख्ती की कानूनी सीमाएं क्या हैं।

कर्नाटक सरकार बनाम भाजपा विधायक: आपराधिक मामले में नई तकरार

कर्नाटक की राजनीति में कानूनी मोर्चे पर हलचल तेज है। राज्य सरकार ने कर्नाटक हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी है, जो भाजपा विधायक बी.ए. बसवराज से जुड़े एक आपराधिक मामले के संदर्भ में दिया गया था। राज्य सरकार का तर्क है कि हाईकोर्ट द्वारा दिए गए दिशा-निर्देश या राहत, राज्य प्रशासन की स्वायत्तता और कानून-व्यवस्था बनाए रखने की शक्ति में हस्तक्षेप कर सकते हैं।

इस मामले में सरकार की चिंता यह है कि यदि उच्च न्यायालय के वर्तमान आदेश को यथावत रखा जाता है, तो इससे न केवल संबंधित मामले की जांच प्रभावित होगी, बल्कि राजनीतिक रसूख रखने वाले व्यक्तियों के खिलाफ कानूनी कार्यवाही में बाधा भी उत्पन्न हो सकती है। यह याचिका राज्य और न्यायपालिका के बीच शक्तियों के संतुलन और राजनीतिक जवाबदेही के मानकों पर केंद्रित है।

अब्बास अंसारी की जमानत शर्तों में ढील की मांग

उत्तर प्रदेश के मऊ से विधायक अब्बास अंसारी, जो जेल में बंद हैं और दिवंगत मुख्तार अंसारी के पुत्र हैं, ने अपनी जमानत की शर्तों में ढील देने के लिए उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। अब्बास अंसारी पर विभिन्न आपराधिक धाराओं और जेल के भीतर अनुचित गतिविधियों के आरोप हैं। उनकी याचिका में स्वास्थ्य या पारिवारिक कारणों का हवाला देते हुए कुछ रियायतें मांगी गई हैं।

हालांकि, अभियोजन पक्ष लगातार उनकी रिहाई या शर्तों में ढील का विरोध कर रहा है। सरकार का तर्क है कि आरोपी का पारिवारिक इतिहास और उनके विरुद्ध दर्ज गंभीर मुकदमों को देखते हुए किसी भी प्रकार की ढील से गवाहों को खतरा हो सकता है और जांच प्रभावित हो सकती है। यह सुनवाई उत्तर प्रदेश में माफिया नेटवर्क के खिलाफ चल रही कानूनी कार्रवाई के संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

अंतरराष्ट्रीय विवाद: रूसी महिला और नाबालिग बच्चे का मामला

एक बेहद जटिल और मानवीय पहलू वाला मामला दिल्ली हाईकोर्ट के समक्ष आया है, जिसमें एक रूसी महिला और उसके नाबालिग बेटे का विवाद शामिल है। आरोप है कि महिला ने कानूनी प्रक्रियाओं और पिता के अधिकारों का उल्लंघन करते हुए बच्चे के साथ अवैध तरीके से मास्को भागने की कोशिश की। इस मामले में याचिकाकर्ता ने अदालत से बच्चे की सुरक्षा सुनिश्चित करने और अंतरराष्ट्रीय बाल अपहरण (Child Abduction) के कानूनों के तहत हस्तक्षेप की मांग की है।

अदालत को अब यह तय करना है कि विदेशी नागरिकता और अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के बीच बच्चे के सर्वोत्तम हितों (Best Interests of the Child) की रक्षा कैसे की जाए। इस तरह के मामले अक्सर कूटनीतिक और कानूनी पेचीदगियों में उलझ जाते हैं, जहां दो अलग-अलग देशों के कानून आपस में टकराते हैं।

घरेलू हिंसा कानून: जेंडर-न्यूट्रल दिशा-निर्देशों की मांग

सामाजिक सुधार की दिशा में एक बड़ी पहल के रूप में, उच्च न्यायालय में घरेलू हिंसा और उत्पीड़न के मामलों के लिए ‘जेंडर-न्यूट्रल’ (लिंग-तटस्थ) कानून बनाने की याचिका पर भी चर्चा हो रही है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि वर्तमान घरेलू हिंसा कानून मुख्य रूप से महिलाओं की सुरक्षा पर केंद्रित हैं, जबकि पुरुष और अन्य लिंग के व्यक्ति भी घरेलू हिंसा और मानसिक उत्पीड़न का शिकार होते हैं।

याचिका में मांग की गई है कि न्यायपालिका को ऐसे दिशा-निर्देश जारी करने चाहिए जहां पीड़ित का लिंग देखे बिना उसे सुरक्षा और न्याय मिले। यह बहस भारतीय कानूनी परिदृश्य में ‘समानता के अधिकार’ को एक नई परिभाषा देने की कोशिश कर रही है। यदि न्यायालय इस पर सकारात्मक रुख अपनाता है, तो भविष्य में घरेलू हिंसा से जुड़े कानूनों में बड़े बदलाव की नींव पड़ सकती है।

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