• February 11, 2026

भारत-अमेरिका अंतरिम व्यापार समझौते पर छिड़ा सियासी घमासान: सरकार ने बताया ‘ऐतिहासिक उपलब्धि’, विपक्ष ने कहा- ‘नमस्ते ट्रंप’ की जीत और भारत की हार

नई दिल्ली। भारत और अमेरिका के बीच बहुप्रतीक्षित अंतरिम व्यापार समझौते (Interim Trade Agreement) की रूपरेखा जारी होने के बाद देश के राजनीतिक और व्यापारिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। जहां केंद्र सरकार और विभिन्न औद्योगिक संगठनों ने इसे भारतीय निर्यात, निवेश और रोजगार के लिए एक ‘स्वर्ण युग’ की शुरुआत बताया है, वहीं विपक्षी दलों ने इस समझौते की शर्तों को लेकर सरकार पर तीखे हमले किए हैं। इस समझौते के केंद्र में टैरिफ कटौती और बाजार पहुंच जैसे मुद्दे हैं, जिसे लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच दावों और प्रतिदावों का दौर शुरू हो गया है।

सरकार का रुख: निर्यात और रोजगार को मिलेगा नया आयाम

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने समझौते की अंतरिम रूपरेखा की पुरजोर सराहना करते हुए इसे भारत की आर्थिक विकास यात्रा का एक मील का पत्थर करार दिया है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि इस समझौते से भारतीय उत्पादों को दुनिया के सबसे बड़े बाजार यानी अमेरिका में व्यापक पहुंच मिलेगी। राजनाथ सिंह के अनुसार, यह समझौता विशेष रूप से श्रम-प्रधान उद्योगों (Labor-Intensive Industries) को मजबूती प्रदान करेगा, जिससे बड़े पैमाने पर रोजगार के नए अवसर सृजित होंगे। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार ने समझौते के दौरान भारतीय किसानों और डेयरी क्षेत्र के हितों से कोई समझौता नहीं किया है और उनके संरक्षण को प्राथमिकता दी गई है। रक्षा मंत्री ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व की प्रशंसा करते हुए कहा कि यह ढांचा वैश्विक निवेश को आकर्षित करने और भारत को दीर्घकालिक रूप से आर्थिक शक्ति बनाने में सहायक सिद्ध होगा।

व्यापार समझौते के विवरण के अनुसार, अमेरिका ने भारतीय उत्पादों पर लगने वाले टैरिफ में 50% से लेकर 18% तक की भारी कटौती करने का निर्णय लिया है। सरकार का मानना है कि इस कदम से सीधे तौर पर भारत के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSME) को लाभ होगा, क्योंकि उनके उत्पाद अमेरिकी बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी हो जाएंगे।

विपक्ष का कड़ा प्रहार: ‘नमस्ते ट्रंप’ की जीत और ‘हाउडी मोदी’ की हार

दूसरी ओर, विपक्षी दल कांग्रेस ने इस समझौते को पूरी तरह से एकतरफा और अमेरिका के पक्ष में झुका हुआ बताया है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सांसद जयराम रमेश ने केंद्र सरकार पर तंज कसते हुए कहा कि इस समझौते में “नमस्ते ट्रंप” की जीत हुई है और “हाउडी मोदी” की हार। रमेश ने सरकार द्वारा जारी संयुक्त बयान की पारदर्शिता पर सवाल उठाते हुए पांच प्रमुख बिंदुओं पर ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने दावा किया कि इस समझौते के तहत भारत पर रूस से तेल न खरीदने का दबाव बनाया गया है और यदि भारत ऐसा करता है, तो अमेरिका 25 प्रतिशत का भारी जुर्माना (टैरिफ) लगा सकता है।

जयराम रमेश ने आशंका जताई कि अमेरिका से आने वाले कृषि उत्पादों पर आयात शुल्क कम करने या खत्म करने से भारतीय किसानों की आजीविका पर संकट मंडरा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि इस समझौते के चलते भारत का अमेरिका से आयात हर साल तीन गुना तक बढ़ सकता है, जिससे वर्तमान में भारत के पक्ष में रहने वाला व्यापार संतुलन (Trade Surplus) घाटे में बदल सकता है। कांग्रेस नेता ने इस बात पर भी हैरानी जताई कि इस पूरे समझौते में भारत के मजबूत आईटी और सेवा क्षेत्र (Service Sector) का कोई उल्लेख नहीं है, जबकि भारतीय उत्पादों पर निर्यात शुल्क बढ़ने की संभावना है।

अमेरिकी प्रतिक्रिया: नेतृत्व और दूरदर्शिता की सराहना

भारत में अमेरिका के राजदूत सर्जियो गोर ने इस समझौते को दोनों देशों के संबंधों के लिए एक नया सवेरा बताया। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व की सराहना करते हुए कहा कि इस उपलब्धि का पूरा श्रेय दोनों नेताओं की दूरदर्शिता को जाता है। वहीं, अमेरिका के व्यापार प्रतिनिधि राजदूत ग्रियर ने भी इस समझौते का स्वागत करते हुए कहा कि इससे टैरिफ और गैर-टैरिफ बाधाएं दूर होंगी। ग्रियर ने स्पष्ट किया कि यह समझौता अमेरिकी मजदूरों और किसानों के लिए भारत का एक बड़ा बाजार खोलेगा, जिससे दोनों देशों के आर्थिक रिश्ते और प्रगाढ़ होंगे। उन्होंने विशेष रूप से भारत के वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल की सक्रिय भूमिका की भी प्रशंसा की।

उद्योग जगत और विशेषज्ञों का समर्थन

व्यापारिक जगत से इस समझौते को लेकर सकारात्मक प्रतिक्रियाएं मिल रही हैं। स्पाइसजेट के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक अजय सिंह ने इसे ‘ऐतिहासिक’ करार देते हुए कहा कि यह ‘मेड इन इंडिया’ ब्रांड को वैश्विक स्तर पर एक नई पहचान दिलाएगा। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी ने वैश्विक चुनौतियों के बावजूद 140 करोड़ भारतीयों के हितों को सर्वोपरि रखा है।

इसी क्रम में, इंडियन फार्मास्युटिकल एलायंस (IPA) के महासचिव सुदर्शन जैन ने दवाओं के क्षेत्र में इस सहयोग का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि जेनेरिक दवाओं को टैरिफ से छूट मिलना भारतीय फार्मा क्षेत्र के लिए बड़ी राहत है। फेडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (FICCI) के अध्यक्ष अनंत गोयनका ने कहा कि जब भारत एक वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग हब बनने की ओर अग्रसर है, तब यह समझौता तकनीकी प्रतिस्पर्धा और सप्लाई चेन को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

पूर्व विदेश सचिव और राज्यसभा सांसद हर्षवर्धन श्रृंगला ने भी इस समझौते को युवाओं के लिए बड़ी खुशखबरी बताया। उन्होंने विश्लेषण करते हुए कहा कि यूरोपीय संघ (EU) के साथ हुए हालिया समझौते और अब अमेरिका के साथ इस डील के बाद भारतीय निर्यातकों की पहुंच लगभग 60 ट्रिलियन डॉलर के वैश्विक बाजार तक हो जाएगी, जो देश की अर्थव्यवस्था के लिए क्रांतिकारी साबित होगा।

आलोचना के अन्य स्वर: राष्ट्रीय स्वाभिमान का मुद्दा

हालांकि, सभी तरफ से प्रशंसा नहीं मिल रही है। जेडकेपीसीसी अध्यक्ष तारीक हमीद कर्रा ने इस समझौते को भारत की विदेश नीति की विफलता और एक तरह का ‘राष्ट्रीय अपमान’ बताया। उन्होंने कहा कि सरकार जिसे बड़ी उपलब्धि बता रही है, वह वास्तव में देश की संप्रभुता के लिए चिंताजनक है। आम आदमी पार्टी (AAP) के नेता सौरभ भारद्वाज ने भी तीखी प्रतिक्रिया देते हुए सवाल उठाया कि क्या भारत अब अमेरिका के दबाव में अपनी नीतियां बनाएगा? उन्होंने सरकार की आलोचना करते हुए कहा कि भारत को इतिहास में कभी भी किसी विदेशी शक्ति के सामने इतना कमजोर होते नहीं देखा गया।

निष्कर्ष

भारत-अमेरिका अंतरिम व्यापार समझौते ने देश में एक नई बहस छेड़ दी है। जहां आर्थिक विशेषज्ञ और सरकार इसे भविष्य की समृद्धि का द्वार मान रहे हैं, वहीं विपक्ष इसे घरेलू उद्योगों और संप्रभुता के लिए खतरा बता रहा है। समझौते के पूर्ण विवरण सार्वजनिक होने के बाद ही इसके वास्तविक प्रभाव और लाभ-हानि का सटीक आकलन संभव हो पाएगा, लेकिन वर्तमान में इसने आगामी चुनावी और राजनीतिक विमर्श को एक नई दिशा दे दी है।

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