• January 19, 2026

दिल्ली दंगा साजिश मामला: सुप्रीम कोर्ट ने उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत अर्जी खारिज की, कहा- ‘ट्रायल में देरी ट्रंप कार्ड नहीं’

दिल्ली : उच्चतम न्यायालय ने आज दिल्ली दंगों के पीछे की कथित ‘बड़ी साजिश’ (Larger Conspiracy) के मामले में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और कड़ा फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने जेएनयू के पूर्व छात्र उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाओं को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने अपने ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट रूप से कहा कि महज लंबे समय तक जेल में बंद रहने के आधार पर गंभीर अपराधों के आरोपियों को जमानत का अधिकार नहीं मिल जाता। इस फैसले ने न केवल कानूनी गलियारों में चर्चा छेड़ दी है, बल्कि यह भी साफ कर दिया है कि यूएपीए (UAPA) जैसे कड़े कानूनों के तहत राहत पाना अब और भी चुनौतीपूर्ण होगा।

सुप्रीम कोर्ट का दो टूक फैसला: प्रक्रियात्मक देरी बनाम अपराध की गंभीरता

न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया की दो सदस्यीय पीठ ने इस मामले की गहन सुनवाई के बाद अपना फैसला सुनाया। पीठ ने एक बहुत ही सख्त कानूनी टिप्पणी करते हुए कहा कि मुकदमे के ट्रायल में हो रही देरी को किसी ‘ट्रंप कार्ड’ की तरह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। बचाव पक्ष की ओर से मुख्य दलील यह दी गई थी कि आरोपी पिछले चार साल से अधिक समय से जेल में बंद हैं और ट्रायल की गति अत्यंत धीमी है, जिससे उनके मौलिक अधिकारों का हनन हो रहा है।

हालांकि, पीठ ने इस दलील को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि यदि केवल समय बीतने के आधार पर जमानत दी जाने लगे, तो इससे वैधानिक सुरक्षा उपाय स्वतः ही निरस्त (automatically displaces statutory safeguards) होने का खतरा पैदा हो जाता है। अदालत का मानना था कि कानून की धाराओं और सुरक्षा मानकों को केवल इसलिए नजरअंदाज नहीं किया जा सकता क्योंकि प्रक्रिया में समय लग रहा है। यह टिप्पणी भविष्य के उन सभी मामलों के लिए एक नजीर बनेगी जहाँ यूएपीए के तहत लंबे समय से लोग जेल में बंद हैं।

उमर और शरजील ‘अलग स्थिति’ में: पांच अन्य आरोपियों को मिली राहत

इस फैसले का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि सुप्रीम कोर्ट ने एक ही मामले में शामिल सात आरोपियों में से पांच को जमानत दे दी, लेकिन उमर और शरजील को राहत नहीं दी। अदालत ने गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा उर रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद की जमानत याचिकाओं को स्वीकार कर लिया।

अदालत ने स्पष्ट किया कि उमर खालिद और शरजील इमाम की भूमिका और उनके खिलाफ लगाए गए आरोप, इस मामले के अन्य आरोपियों की तुलना में “पूरी तरह अलग स्थिति” में हैं। पीठ ने कहा कि इन दोनों के खिलाफ यूएपीए के तहत ‘प्रथम दृष्टया’ (Prima Facie) जो आरोप लगाए गए हैं, वे अत्यंत गंभीर प्रकृति के हैं। अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों और सबूतों के आधार पर अदालत ने माना कि इन दोनों के खिलाफ कानून की धाराएं और शर्तें पूरी तरह लागू होती हैं, इसलिए इस स्तर पर उन्हें रिहा करना उचित नहीं होगा।

दिल्ली पुलिस का आरोप: विरोध प्रदर्शनों की आड़ में रची गई खूनी साजिश

दिल्ली पुलिस ने इस पूरे मामले को एक सुनियोजित और गहरी साजिश के तौर पर पेश किया है। पुलिस की चार्जशीट के अनुसार, साल 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में भड़की हिंसा कोई आकस्मिक घटना नहीं थी, बल्कि इसे नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) के खिलाफ चल रहे प्रदर्शनों की आड़ में बहुत ही बारीकी से तैयार किया गया था।

पुलिस का दावा है कि उमर खालिद और शरजील इमाम इस पूरी साजिश के ‘मास्टरमाइंड’ थे। अभियोजन पक्ष ने अदालत में दलील दी कि इन लोगों ने गुप्त बैठकों, व्हाट्सएप ग्रुप्स और भड़काऊ भाषणों के माध्यम से एक विशेष समुदाय को उकसाया ताकि राजधानी में बड़े पैमाने पर दंगे भड़काए जा सकें। पुलिस के अनुसार, इस हिंसा का मुख्य उद्देश्य भारत सरकार को अस्थिर करना और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की छवि को धूमिल करना था। इसी हिंसा में 53 बेगुनाह लोगों की जान चली गई थी और 700 से अधिक लोग घायल हुए थे, जबकि करोड़ों की संपत्ति खाक हो गई थी।

सुरक्षित रखा गया था फैसला: 10 दिसंबर से था इंतजार

इस मामले में कानूनी प्रक्रिया काफी लंबी और जटिल रही है। गौरतलब है कि विगत 10 दिसंबर, 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। उस समय अदालत ने दोनों पक्षों को 18 दिसंबर तक अपने दावों के समर्थन में अतिरिक्त दस्तावेज और लिखित दलीलें पेश करने का अंतिम अवसर दिया था।

आज का फैसला उसी सुरक्षित रखे गए फैसले का परिणाम है। इस फैसले के आने से पहले ही कयास लगाए जा रहे थे कि क्या अदालत ‘व्यक्तिगत स्वतंत्रता’ को प्राथमिकता देगी या ‘कानून की कठोरता’ को। आज के आदेश ने यह साफ कर दिया कि गंभीर आतंकी साजिशों और देश विरोधी गतिविधियों के आरोपों में अदालत का रुख बेहद सख्त रहने वाला है।

परिवार की चुप्पी और आरोपियों की प्रतिक्रिया

सुप्रीम कोर्ट से जमानत अर्जी खारिज होने के बाद उमर खालिद के परिजनों की प्रतिक्रिया भी सामने आई है। उमर के पिता सैयद कासिम रसूल इलियास ने इस पर बहुत ही संक्षिप्त और गंभीर टिप्पणी की। उन्होंने कहा, “2020 के दिल्ली दंगों की साजिश के मामले में जमानत न मिलने के बारे में मुझे कुछ नहीं कहना है। फैसला आपके सामने है।” उनकी यह संक्षिप्त प्रतिक्रिया उस निराशा को दर्शाती है जो लंबे कानूनी संघर्ष के बाद हाथ लगी है।

वहीँ, दूसरी ओर शरजील इमाम के समर्थकों और उनके कानूनी सलाहकारों ने भी इस फैसले को उनके मौलिक अधिकारों के लिए एक बड़ा झटका माना है। हालांकि, कानूनी प्रक्रिया के तहत अब उनके पास पुनर्विचार याचिका (Review Petition) का विकल्प शेष है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणियों के बाद इसकी सफलता की संभावनाएं काफी कम नजर आती हैं।

दिल्ली दंगों की पृष्ठभूमि: सीएए-एनआरसी और 2020 का वह भयावह दौर

दिल्ली के उत्तर-पूर्वी इलाकों में हुई वह हिंसा आज भी लोगों के जेहन में ताजा है। फरवरी 2020 में जब पूरी दुनिया की नजरें अमेरिकी राष्ट्रपति के भारत दौरे पर थीं, तभी दिल्ली के जाफराबाद, मौजपुर, भजनपुरा और चांद बाग जैसे इलाकों में भीषण आगजनी और कत्लेआम शुरू हो गया था। यह सब नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ शुरू हुए विरोध प्रदर्शनों के बाद हुआ।

आक्रोशित भीड़ ने न केवल पुलिस पर हमला किया, बल्कि दुकानों, घरों और धार्मिक स्थलों को निशाना बनाया। पुलिस का आरोप है कि प्रदर्शनकारियों ने हिंसा का रास्ता केवल विरोध के लिए नहीं, बल्कि एक सुनियोजित रणनीति के तहत अपनाया था। आज के फैसले ने एक बार फिर उन घावों को हरा कर दिया है और यह संदेश दिया है कि इस साजिश में शामिल लोगों को कानून के कड़े शिकंजे से बच पाना आसान नहीं होगा।

निष्कर्ष: भविष्य की राह और ट्रायल की चुनौती

उमर खालिद और शरजील इमाम के लिए अब आगे की राह जेल के अंदर से ही शुरू होगी। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अब सारा दारोमदार निचली अदालत में चलने वाले ट्रायल पर है। यदि ट्रायल की गति में तेजी आती है और साक्ष्य आरोपियों के पक्ष में होते हैं, तभी उनकी रिहाई की कोई उम्मीद बन सकती है।

हालांकि, कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से यह स्पष्ट हो गया है कि भारतीय न्यायपालिका राष्ट्रीय सुरक्षा और आंतरिक शांति से जुड़े मामलों में कोई समझौता करने के मूड में नहीं है। ट्रायल में होने वाली देरी को ‘ढाल’ बनाकर जेल से बाहर आने की रणनीति अब शायद ही काम आए। अब देखना यह होगा कि अन्य पांच आरोपी, जिन्हें जमानत मिली है, उनके मामले में कानूनी प्रक्रिया आगे किस तरह बढ़ती है और मुख्य साजिश के आरोपों का भविष्य क्या होता है।

Digiqole Ad

Related Post

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *