गीता प्रेस जनतांत्रिक, आलोचना दुर्भाग्यपूर्ण
87 की उम्र में भी वही खनकती हुई आवाज! सुबह जबलपुर से ज्ञानरंजन जी (पहल पत्रिका के संस्थापक संपादक) का टेलीफोन आया। दिल में धड़का हुआ कि मुझसे कोई गलती हुई है और डांट पड़ने वाली है। लेकिन मेरी आशंका निर्मूल साबित हुई। ज्ञान जी ने मेरे गीता प्रेस पर लिखे आलेखों (फेसबुक पोस्ट) की तारीफ की और कहा कि गीता प्रेस जैसी दुनिया की अनोखी जनतांत्रिक संस्था की आलोचना दुर्भाग्यपूर्ण है । कांग्रेस के […]Read More






