औरंगजेब के दक्कन अभियान: मुगल साम्राज्य की सबसे बड़ी गलती
- बीजापुर और गोलकुंडा सल्तनतों पर पूर्ण कब्जा करना।
- मराठा शक्ति को जड़ से खत्म करना।
छत्रपति शिवाजी महाराज ने जो स्वराज्य की नींव रखी थी, वह उनके बाद उनके पुत्र संभाजी और फिर अन्य मराठा नेताओं ने जारी रखी। औरंगजेब ने 1686-87 में बीजापुर और गोलकुंडा पर कब्जा तो कर लिया, लेकिन मराठों का प्रतिरोध कभी कम नहीं हुआ। गुरिल्ला युद्ध की रणनीति ने मुगल सेना को लगातार परेशान किया।कैसे हुआ अभियान की विफलता?औरंगजेब ने 5 लाख से अधिक सैनिकों, हजारों हाथियों, घोड़ों, ऊंटों और तोपखाने के साथ दक्कन पर चढ़ाई की। राजा के साथ उसकी पूरी राजधानी भी चलती थी।
- मराठों की गुरिल्ला रणनीति: मराठा सेना ने छापामार हमले किए, पश्चिमी घाटों के जंगलों और पहाड़ों का फायदा उठाया। मुगल सेना की बड़ी संख्या यहां नुकसानदायक साबित हुई, क्योंकि आपूर्ति लाइनों पर लगातार हमले होते रहे।
- लंबा संघर्ष: लगभग 27 साल (1681-1707) तक औरंगजेब दक्कन में फंसे रहे। इस दौरान मुगल खजाना खाली होता गया, सेना थक गई और मनोबल गिरा।
- उत्तर भारत में विद्रोह: दक्षिण में व्यस्त होने से उत्तर में जाट, सिख और राजपूतों के विद्रोह बढ़े, जिससे साम्राज्य कमजोर हुआ।
- भौगोलिक चुनौतियां: दक्कन की कठिन भूगोल और मराठों की तेज पुनर्गठन क्षमता ने मुगल सेना को बुरी तरह थका दिया।
यह अभियान मुगल साम्राज्य के लिए “घाव” बन गया। संसाधनों की भारी बर्बादी हुई, प्रशासन पर दबाव बढ़ा और आर्थिक संकट गहराया।दिल्ली कभी वापस नहीं लौट सके1705 में वागिंगेरा की घेराबंदी औरंगजेब का आखिरी बड़ा अभियान था। इसके बाद 1706 में वे औरंगाबाद की ओर पीछे हटने लगे, लेकिन मराठों के हमले जारी रहे। 88 वर्ष की उम्र में 3 मार्च 1707 को अहमदनगर (अब औरंगाबाद क्षेत्र) में उनका निधन हो गया। उन्हें खुलदाबाद (औरंगाबाद जिला) में दफनाया गया।औरंगजेब की मौत के साथ मुगल साम्राज्य का तेज पतन शुरू हो गया। दक्कन अभियान ने साम्राज्य को आर्थिक और सैन्य रूप से इतना कमजोर कर दिया कि यह कभी उबर नहीं सका। इतिहासकार इसे औरंगजेब की सबसे बड़ी रणनीतिक भूल मानते हैं, जिसने मुगल साम्राज्य के अंत की नींव रखी।यह अभियान न सिर्फ एक सैन्य असफलता थी, बल्कि मुगल साम्राज्य के पतन का प्रतीक भी बन गया।