भाषा विश्वविद्यालय में ‘ब्रह्मांड और आप’ पर संवाद, तारों की धूल से मानव चेतना तक की यात्रा पर चर्चा
लखनऊ: ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती भाषा विश्वविद्यालय में ब्रह्मांड और मानव अस्तित्व के गहरे संबंधों को समझने के उद्देश्य से ‘ब्रह्मांड और आप : तारों की धूल से आत्मबोध तक’ विषय पर संवादात्मक सत्र आयोजित किया गया। कुलपति प्रो. अजय तनेजा के संरक्षण में हुए इस कार्यक्रम में 50 से अधिक शिक्षक और 100 से अधिक विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की।
कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस एवं उत्तर प्रदेश के पूर्व अपर मुख्य सचिव मनोज सिंह (आईएएस, सेवानिवृत्त) उपस्थित रहे। आयोजन कुलसचिव श्री विकास और वित्त अधिकारी संतोष कुमार के मार्गदर्शन में किया गया। सत्र का समन्वयन डॉ. रत्नेश कुमार सिंह ने किया।
ब्रह्मांड की उत्पत्ति से मानव चेतना तक की यात्रा पर व्याख्यान
अपने व्याख्यान में मनोज सिंह ने ब्रह्मांड की उत्पत्ति, तारों के निर्माण, जीवन के विकास और मानव बुद्धि तथा चेतना के उद्भव की यात्रा को सरल एवं रोचक तरीके से प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि मानव शरीर में मौजूद कई तत्वों का निर्माण तारों के भीतर होने वाली ब्रह्मांडीय प्रक्रियाओं के माध्यम से हुआ है।
इस संदर्भ में उन्होंने ‘स्टारडस्ट’ यानी तारों की धूल की वैज्ञानिक अवधारणा को समझाया। उन्होंने बताया कि मनुष्य का अस्तित्व ब्रह्मांड की व्यापक संरचना से जुड़ा हुआ है और मानव शरीर में पाए जाने वाले तत्व भी ब्रह्मांडीय इतिहास का हिस्सा हैं।
व्याख्यान के दौरान आइंस्टीन के प्रसिद्ध समीकरण E = mc², विमाओं और ज्यामिति, भूवैज्ञानिक समय-मान, ब्रह्मांडीय विकास तथा ज्ञान-विज्ञान की विभिन्न शाखाओं के विकास जैसे विषयों पर भी चर्चा की गई।
ब्रह्मांड और मानव जीवन के संबंधों पर विचार-विमर्श
सत्र का एक प्रमुख पहलू ब्रह्मांड और मानव जीवन के पारस्परिक संबंधों की व्याख्या रहा। वक्ता ने कंपन, आवृत्तियों, चेतना के विकास, बुद्धि और स्मृति जैसे विषयों के माध्यम से मानव अस्तित्व के वैज्ञानिक एवं दार्शनिक आयामों पर प्रकाश डाला।
मनोज सिंह ने कहा कि ब्रह्मांड को समझने की जिज्ञासा के साथ स्वयं को समझने का प्रयास भी जरूरी है। उनके अनुसार, विज्ञान और आत्मबोध से जुड़े सवालों पर विचार करना मानव जिज्ञासा और ज्ञान की खोज का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण और स्वतंत्र चिंतन विकसित करने पर जोर
मनोज सिंह ने विद्यार्थियों और शिक्षकों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण, तार्किक चिंतन, आलोचनात्मक विवेक और स्वतंत्र निर्णय क्षमता विकसित करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि किसी भी निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए तथ्यों और प्रमाणों को आधार बनाना चाहिए।
उन्होंने मान्यताओं पर प्रश्न उठाने और बिना विचार किए किसी धारणा को स्वीकार न करने की आवश्यकता पर बल दिया। साथ ही, सामूहिक दबाव में विवेकहीन अनुसरण और समूह-मानसिकता से बचते हुए स्वतंत्र एवं विवेकपूर्ण चिंतन को प्रोत्साहित किया।
वैज्ञानिक चेतना के साथ मानवीय मूल्यों का महत्व
कार्यक्रम में महात्मा गांधी के सार्वभौमिक मानवीय मूल्यों, विशेष रूप से ‘सर्वधर्म समभाव’ की अवधारणा पर भी चर्चा हुई। वक्ता ने परस्पर सम्मान, धार्मिक सद्भाव, समावेशिता और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व को सभ्य एवं जागरूक समाज की आधारशिला बताया।
उन्होंने वैज्ञानिक चेतना और मानवीय मूल्यों के समन्वय को समाज के समग्र विकास के लिए महत्वपूर्ण बताया। सत्र में विद्यार्थियों और शिक्षकों ने ब्रह्मांड, मानव अस्तित्व, ज्ञान तथा चेतना से जुड़े विषयों पर विचार-विमर्श किया।
विश्वविद्यालय में अंतर्विषयक संवाद को बढ़ावा
संवादात्मक सत्र ने विद्यार्थियों और शिक्षकों को विज्ञान, दर्शन और मानव जीवन के विभिन्न पहलुओं पर एक साथ विचार करने का अवसर दिया। कार्यक्रम के माध्यम से विश्वविद्यालय में वैज्ञानिक जिज्ञासा, तार्किक चिंतन और अंतर्विषयक संवाद को प्रोत्साहित करने की पहल की गई।
आयोजकों के अनुसार, ऐसे संवाद विद्यार्थियों में प्रमाण आधारित सोच, स्वतंत्र निर्णय क्षमता और व्यापक दृष्टिकोण विकसित करने में सहायक हो सकते हैं।
