गीता-संजय चोपड़ा हत्याकांड: 1978 की वह घटना जिसने पूरे देश को झकझोर दिया, ‘राख’ वेब सीरीज से फिर चर्चा में आया मामला
नई दिल्ली: भारत के सबसे चर्चित आपराधिक मामलों में शामिल गीता-संजय चोपड़ा हत्याकांड आज भी लोगों के जेहन में ताजा है। वर्ष 1978 में दिल्ली में हुए इस दोहरे हत्याकांड ने पूरे देश को झकझोर दिया था। अब इस घटना पर आधारित वेब सीरीज ‘राख’ की रिलीज के बाद यह मामला एक बार फिर चर्चा में है। यह मामला केवल दो मासूम बच्चों की हत्या तक सीमित नहीं था, बल्कि इसने देश में बच्चों की सुरक्षा, पुलिस व्यवस्था और आपराधिक जांच को लेकर गंभीर बहस को जन्म दिया।
26 अगस्त 1978: जब घर से निकले लेकिन लौटकर नहीं आए
26 अगस्त 1978 की शाम नौसेना अधिकारी कैप्टन मदन मोहन चोपड़ा की 16 वर्षीय बेटी गीता चोपड़ा और 14 वर्षीय बेटे संजय चोपड़ा घर से आकाशवाणी भवन के एक कार्यक्रम में हिस्सा लेने निकले थे। गीता कार्यक्रम का संचालन करने वाली थीं, जबकि संजय भी उसमें भाग लेने वाले थे। भारी बारिश के बीच दोनों ने रास्ते में एक कार से लिफ्ट ली, लेकिन वे अपने गंतव्य तक कभी नहीं पहुंच सके।
अपहरण के बाद हुई हत्या
जांच के अनुसार, कार में सवार दो अपराधियों ने दोनों भाई-बहन का अपहरण कर लिया। बाद में उन्हें दिल्ली रिज क्षेत्र में ले जाया गया, जहां उनकी हत्या कर दी गई। जांच और अदालत की कार्यवाही में यह भी सामने आया कि दोनों बच्चों ने अंतिम समय तक प्रतिरोध किया। 28 अगस्त 1978 को उनके शव बरामद होने के बाद पूरे देश में आक्रोश फैल गया। यह मामला उस दौर के सबसे चर्चित आपराधिक मामलों में शामिल हो गया।
कैसे हुई आरोपियों की गिरफ्तारी?
घटना के बाद दिल्ली पुलिस ने व्यापक जांच अभियान चलाया। कुछ सप्ताह बाद दोनों आरोपियों को ट्रेन से भागने की कोशिश के दौरान सेना के जवानों ने पकड़ लिया और पुलिस के हवाले कर दिया। जांच के दौरान जुटाए गए भौतिक साक्ष्य और फॉरेंसिक सबूत अदालत में महत्वपूर्ण साबित हुए।
अदालत ने सुनाई थी फांसी की सजा
सत्र अदालत ने दोनों आरोपियों को अपहरण, हत्या और अन्य गंभीर अपराधों में दोषी ठहराते हुए मृत्युदंड की सजा सुनाई। बाद में दिल्ली हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने भी इस फैसले को बरकरार रखा। राष्ट्रपति के समक्ष दायर दया याचिका खारिज होने के बाद 31 जनवरी 1982 को दोनों दोषियों को तिहाड़ जेल में फांसी दी गई। यह मामला भारतीय न्याय व्यवस्था में ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ मामलों के प्रमुख उदाहरणों में गिना जाता है।
देश पर पड़ा गहरा प्रभाव
गीता-संजय चोपड़ा हत्याकांड ने पूरे देश में बच्चों की सुरक्षा को लेकर नई चिंता पैदा कर दी। इसके बाद अभिभावकों ने बच्चों को अकेले भेजने और अनजान लोगों से लिफ्ट लेने जैसी बातों को लेकर अतिरिक्त सतर्कता बरतनी शुरू कर दी। इस घटना ने पुलिस जांच, फॉरेंसिक विज्ञान और आपराधिक मामलों में साक्ष्य जुटाने की प्रक्रिया को भी नई दिशा दी। विशेषज्ञ मानते हैं कि इस केस ने भारत में आधुनिक फॉरेंसिक जांच की उपयोगिता को मजबूती से स्थापित करने में अहम भूमिका निभाई।
बहादुरी के सम्मान में शुरू हुआ पुरस्कार
गीता और संजय चोपड़ा की बहादुरी को सम्मान देने के लिए केंद्र सरकार ने 1978 में ‘गीता चोपड़ा और संजय चोपड़ा वीरता पुरस्कार’ की शुरुआत की। यह पुरस्कार असाधारण साहस और वीरता का प्रदर्शन करने वाले बच्चों को प्रदान किया जाता था और लंबे समय तक राष्ट्रीय स्तर पर दिया गया।
‘राख’ वेब सीरीज से फिर चर्चा में आया मामला
हाल ही में रिलीज हुई वेब सीरीज ‘राख’ इस ऐतिहासिक आपराधिक मामले से प्रेरित है। सीरीज में उस दौर की दिल्ली, पुलिस जांच, परिवार के संघर्ष और अपराध की गंभीरता को नाटकीय रूप में प्रस्तुत किया गया है। हालांकि कहानी में मनोरंजन के उद्देश्य से कुछ काल्पनिक तत्व भी जोड़े गए हैं, लेकिन इसकी मूल प्रेरणा 1978 के इसी चर्चित मामले से जुड़ी मानी जाती है। आज, लगभग पांच दशक बाद भी गीता-संजय चोपड़ा हत्याकांड भारतीय आपराधिक इतिहास के उन मामलों में शामिल है, जिसने समाज, न्याय व्यवस्था और कानून-व्यवस्था पर दूरगामी प्रभाव छोड़ा। यह घटना आज भी बच्चों की सुरक्षा, प्रभावी पुलिसिंग और वैज्ञानिक जांच प्रणाली की आवश्यकता की याद दिलाती है।