• June 28, 2026

दिल्ली के फुटपाथों पर जीवन और सुरक्षा पर सवाल, मासूम की हत्या के बाद बेघर परिवारों की स्थिति पर उठी बहस

नई दिल्ली: दिल्ली में फुटपाथ से एक मासूम बच्ची के कथित अपहरण, बलात्कार और हत्या की घटना ने राजधानी की सड़कों पर रहने वाले बेघर परिवारों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। शहर के विभिन्न इलाकों—फुटपाथों, फ्लाईओवर के नीचे, ट्रैफिक चौराहों और रेलवे स्टेशनों के आसपास—हजारों लोग खुले आसमान के नीचे जीवन गुजारने को मजबूर हैं। इस बीच राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) के पोर्टल के अनुसार वर्ष 2022-23 में सड़कों पर रहने वाले 22,900 से अधिक बच्चों की पहचान की गई थी। इनमें बड़ी संख्या उन बच्चों की थी जो अपने परिवारों के साथ फुटपाथों पर रह रहे थे या दिन में सड़क पर समय बिताते थे। हालांकि, 2023-24 में यह आंकड़ा घटकर 3,466 रह गया, जिस पर विशेषज्ञों का कहना है कि पहचान में कमी का मतलब समस्या का कम होना नहीं है। रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली के विभिन्न हिस्सों में कई परिवार वर्षों से फुटपाथों को ही अपना घर बनाए हुए हैं। इनमें निजामुद्दीन, सराय काले खां और फ्लाईओवर क्षेत्रों के आसपास रहने वाले परिवार शामिल हैं, जिनकी जिंदगी दिहाड़ी मजदूरी और कचरा बीनने जैसे कामों पर निर्भर है। कई परिवारों ने बताया कि वे झुग्गियों के टूटने या आर्थिक मजबूरी के कारण सड़क पर रहने को मजबूर हुए। कई महिलाओं और बच्चों के अनुभव इस असुरक्षा को और उजागर करते हैं, जहां न स्थायी आश्रय है, न सुरक्षा व्यवस्था और न ही निजी जीवन की गारंटी। कई परिवारों को रात में जागकर पहरा देना पड़ता है, जबकि कुछ सार्वजनिक शौचालयों और अस्थायी रैन बसेरों पर निर्भर हैं। इस मुद्दे पर सेंटर फॉर होलिस्टिक डिवेलपमेंट के कार्यकारी निदेशक सुनील कुमार अलेडिया ने कहा कि पलायन, झुग्गियों का टूटना और अनौपचारिक मजदूरी मिलकर लोगों को सड़क पर रहने के लिए मजबूर करते हैं। वहीं सरकार का कहना है कि बेघर और संकटग्रस्त बच्चों के लिए रैन बसेरे, चाइल्ड केयर संस्थान, बाल स्वराज पोर्टल, प्रायोजन योजनाएं और पुनर्वास कार्यक्रम जैसी कई व्यवस्थाएं लागू की गई हैं। दिल्ली के गृह मंत्री आशीष सूद ने भी कहा कि शहर में नाइट शेल्टर और भोजन जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं और संवेदनशील वर्गों की सुरक्षा के लिए प्रयास जारी हैं। हालिया घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि तेजी से विकसित होती राजधानी में क्या सबसे कमजोर तबके अब भी सुरक्षा और सम्मान के साथ जीवन जी पा रहे हैं या नहीं।

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