पश्चिम एशिया में भारत की बढ़ती साख: पीएम मोदी की इज़राइल यात्रा से मजबूत हो रहे रणनीतिक संबंध!
- दिसंबर 2025: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जॉर्डन, इथियोपिया और ओमान की तीन-देशीय यात्रा की। जॉर्डन में यह 37 वर्षों बाद किसी भारतीय पीएम की पूर्ण द्विपक्षीय यात्रा थी, जो दोनों देशों के बीच 75 वर्ष पूरे होने के अवसर पर हुई। ओमान में भी गहन चर्चा हुई, जिसमें जियो-पॉलिटिकल मुद्दे, व्यापार, रक्षा और ऊर्जा सहयोग प्रमुख रहे।
- जनवरी 2026: संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान ने 19 जनवरी को भारत की आधिकारिक यात्रा की। यह उनकी हाल के वर्षों में पांचवीं और राष्ट्रपति बनने के बाद तीसरी यात्रा थी। पीएम मोदी के साथ हुई वार्ता में आर्थिक, व्यापार, निवेश, एआई, और रक्षा सहयोग को और मजबूत किया गया। दोनों देशों के बीच व्यापार 100 अरब डॉलर से अधिक पहुंच चुका है।
- जनवरी 2026 अंत: दूसरी भारत-अरब विदेश मंत्रियों की बैठक (India-Arab Foreign Ministers’ Meeting) नई दिल्ली में 30-31 जनवरी को हुई, जिसमें कई अरब देशों के विदेश मंत्री शामिल हुए। बैठक में क्षेत्रीय स्थिरता, आर्थिक साझेदारी और बहुपक्षीय मुद्दों पर गहन चर्चा हुई।
पीएम मोदी की इज़राइल यात्रा: नया अध्याय25-26 फरवरी 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इज़राइल की दो दिवसीय राज्य यात्रा पर हैं—यह उनकी 2017 के बाद दूसरी यात्रा है। इज़राइली पीएम बेंजामिन नेतन्याहू के निमंत्रण पर हो रही इस यात्रा में प्रमुख एजेंडा शामिल हैं:
- रक्षा और सुरक्षा सहयोग
- व्यापार, श्रम और प्रौद्योगिकी (विशेषकर AI, साइबर सिक्योरिटी और इनोवेशन)
- IMEC (इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर) जैसी कनेक्टिविटी परियोजनाएं
- पीएम मोदी इज़राइली संसद (Knesset) को संबोधित करेंगे, होलोकॉस्ट मेमोरियल Yad Vashem का दौरा करेंगे, और राष्ट्रपति Isaac Herzog से मुलाकात करेंगे।
यह यात्रा ऐसे समय में हो रही है जब क्षेत्र में अमेरिका-ईरान तनाव बढ़ रहा है, लेकिन भारत अपनी तटस्थ और क्रेडिबल छवि बनाए रखते हुए सभी पक्षों से संतुलित संबंध रख रहा है।भारत की मजबूत छवि के प्रमाणपश्चिम एशिया के कई देशों ने पीएम मोदी को अपने सर्वोच्च नागरिक सम्मानों से नवाजा है, जो व्यक्तिगत और राजकीय स्तर पर भारत की बढ़ती साख को दर्शाता है। भारत को अब क्षेत्र में एक न्यूट्रल, भरोसेमंद और क्रेडिबल पार्टनर माना जाता है, जो बिना किसी औपनिवेशिक इतिहास के बोझ के काम करता है।ये सभी कदम भारत की ‘थिंक वेस्ट’ नीति को मजबूत करते हैं, जिसमें रणनीतिक साझेदारियां गहरी जड़ें जमा चुकी हैं। पश्चिम एशिया में भारत अब निवेश, संतुलन और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए एक महत्वपूर्ण हितधारक बन चुका है। आने वाले समय में ये संबंध और मजबूत होने की उम्मीद है, जो भारत की वैश्विक ताकत को नई ऊंचाइयों पर ले जाएंगे।