पीएसएलवी की लगातार विफलताओं पर सरकार की चिंता: पूर्व इसरो अध्यक्ष एस. सोमनाथ और के. विजय राघवन की हाई-लेवल कमिटी गठित, संगठनात्मक मुद्दों की भी जांच होगी!
श्रीहरिकोटा/बेंगलुरु: इसरो के ‘वर्कहॉर्स’ कहे जाने वाले पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (PSLV) की लगातार दो विफलताओं ने देश के अंतरिक्ष कार्यक्रम को झटका दिया है। पहली बार इतिहास में ऐसा हुआ है कि PSLV के फेलियर एनालिसिस के लिए न केवल आंतरिक टीम, बल्कि रिटायर्ड टॉप वैज्ञानिकों की एक बाहरी कमिटी भी बनाई गई है। इस कमिटी की अगुवाई पूर्व प्रिंसिपल साइंटिफिक एडवाइजर प्रो. के. विजय राघवन कर रहे हैं, जबकि पूर्व इसरो चेयरमैन एस. सोमनाथ को-चेयरमैन हैं। कमिटी अप्रैल 2026 से पहले अपनी रिपोर्ट इसरो चेयरमैन वी. नारायणन को सौंपेगी।
PSLV की दो लगातार विफलताएं: तीसरे स्टेज में आई समस्या
- PSLV-C61 (18 मई 2025): EOS-09 (सी-बैंड सिंथेटिक अपर्चर राडार सैटेलाइट) को लॉन्च किया गया, जो देश की सीमाओं की निगरानी और रक्षा के लिए महत्वपूर्ण था। प्रक्षेपण के लगभग 6 मिनट 20 सेकंड बाद तीसरे स्टेज (PS3) में अनियमितता आई, जिससे रॉकेट निर्धारित पथ से भटक गया और सैटेलाइट ऑर्बिट में नहीं पहुंच सका।
- PSLV-C62 (12 जनवरी 2026): DRDO का हाइपरस्पेक्ट्रल इमेजिंग सैटेलाइट EOS-N1 (अन्वेष) और 15 अन्य सह-यात्री सैटेलाइट्स (भारतीय स्टार्टअप्स, ब्राजील, यूके, नेपाल आदि से) लॉन्च हुए। फिर तीसरे स्टेज में ही समस्या आई—रोल रेट में डिस्टर्बेंस और फ्लाइट पाथ में विचलन के कारण रॉकेट समुद्र में गिर गया।
- कुल 16 सैटेलाइट्स खो गए।
यह PSLV के 32+ वर्षों के इतिहास में पहली बार है जब दो मिशन लगातार फेल हुए हैं। दोनों मामलों में समस्या तीसरे स्टेज (सॉलिड प्रोपेलेंट PS3) से जुड़ी है, जो चिंता का विषय है।
कमिटी क्या जांचेगी?इसरो के उच्च पदस्थ सूत्रों के अनुसार, कमिटी केवल तकनीकी कारणों (जैसे कंपोनेंट फेलियर, वाल्व समस्या, चैंबर प्रेशर ड्रॉप आदि) तक सीमित नहीं रहेगी।
यह जांच करेगी:
- क्या संगठनात्मक या प्रोसेस संबंधी मुद्दे (organizational issues) विफलताओं के पीछे हैं?
- रॉकेट के विभिन्न घटकों के निर्माण, खरीद, असेंबली और क्वालिटी कंट्रोल प्रक्रियाएं।
- जवाबदेही तय करने की मौजूदा व्यवस्था कितनी मजबूत है और इसे कैसे बेहतर बनाया जा सकता है?
- निजी कंपनियों की बढ़ती भागीदारी के संदर्भ में सप्लाई चेन और इंटीग्रेशन में कोई कमजोरी तो नहीं।
- अन्य रॉकेट्स (जैसे GSLV, LVM3) पर इसका असर, क्योंकि कई कंपोनेंट्स समान हैं।
यह जांच PSLV को दोबारा भरोसेमंद बनाने के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसरो के कई भविष्य के मिशन (जैसे चंद्रयान, गगनयान, निजी सैटेलाइट लॉन्च) PSLV पर निर्भर हैं।
एस. सोमनाथ को क्यों चुना गया?
एस. सोमनाथ का PSLV से गहरा नाता रहा है। वे 1985 में इसरो जॉइन करने के बाद विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर में PSLV डेवलपमेंट प्रोजेक्ट से जुड़े थे। बाद में GSLV Mk-3 के प्रोजेक्ट डायरेक्टर रहे, जिसे ‘नॉटी बॉय’ कहा जाता था, लेकिन सोमनाथ की अगुवाई में यह इसरो का सबसे विश्वसनीय रॉकेट बन गया। वे रॉकेट सिस्टम इंजीनियरिंग, लिक्विड इंजन, स्ट्रक्चरल डिजाइन, इंटीग्रेशन और पायरो टेक्नोलॉजी के विशेषज्ञ हैं। उनकी विशेषज्ञता PSLV की समस्या सुलझाने में अहम भूमिका निभाएगी।आगे क्या?
लॉन्च में देरी तय,
लेकिन बड़ा नुकसान नहींइसरो ने स्पष्ट किया है कि फेलियर एनालिसिस और सुधार के बाद ही अगले PSLV मिशन की तारीख तय होगी। मंत्री जितेंद्र सिंह के अनुसार, अगला PSLV लॉन्च जून 2026 के आसपास संभव है। हालांकि, दो विफलताओं से सैटेलाइट लॉन्च क्यू प्रभावित होगा और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मिशनों पर असर पड़ सकता है।इसरो अब PSLV को पटरी पर लाने के लिए हर स्तर पर प्रयासरत है। यह जांच न केवल तकनीकी, बल्कि संगठनात्मक मजबूती भी सुनिश्चित करेगी, ताकि भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम और मजबूत हो सके।