भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर सियासी घमासान: मल्लिकार्जुन खरगे ने मोदी सरकार पर लगाया राष्ट्रीय हितों के ‘सौदा’ करने का आरोप, बताया ‘पारदर्शिता में लिपटी हार’
नई दिल्ली: केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा हाल ही में अमेरिका के साथ किए गए व्यापार समझौते को लेकर देश की मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने मोर्चा खोल दिया है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने मंगलवार को इस समझौते को भारत के रणनीतिक राष्ट्रीय हितों के साथ एक बड़ा विश्वासघात करार दिया है। खरगे ने आरोप लगाया है कि इस समझौते की आड़ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने न केवल भारत की संप्रभुता को चोट पहुंचाई है, बल्कि देश के करोड़ों किसानों, डेयरी व्यवसायियों और कपड़ा उद्योगपतियों के भविष्य को भी संकट में डाल दिया है।
मल्लिकार्जुन खरगे ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर सिलसिलेवार तरीके से सरकार की व्यापारिक नीतियों की आलोचना की। उन्होंने इस समझौते को ‘पीआर (जनसंपर्क) में लिपटी हुई हार’ बताते हुए कहा कि सरकार जिस समझौते को ऐतिहासिक जीत के रूप में पेश कर रही है, उसके ‘छिपे हुए प्रिंट’ और बारीक शब्दों ने भारत के राष्ट्रीय हितों को गिरवी रखने का काम किया है। खरगे का दावा है कि इस समझौते का असली सच अब धीरे-धीरे सामने आ रहा है और यह स्पष्ट हो गया है कि इसके बदले भारत को अपनी सामरिक स्वतंत्रता की भारी कीमत चुकानी पड़ी है।
इस विवाद का सबसे संवेदनशील पहलू रूसी तेल की खरीद से जुड़ा है। खरगे ने आरोप लगाया कि भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के तहत मोदी सरकार को रूसी तेल पर प्रतिबंध लगाने के लिए मजबूर किया गया है। उन्होंने कहा कि यह देश की सामरिक स्वतंत्रता पर सीधा हमला है। कांग्रेस अध्यक्ष ने सवाल उठाया कि एक तरफ भारत सरकार का संयुक्त बयान रूसी तेल पर चुप्पी साधे हुए था, लेकिन दूसरी तरफ व्हाइट हाउस द्वारा जारी ‘फैक्ट शीट’ में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि भारत को रूसी तेल खरीदना बंद करना होगा। खरगे ने पूछा कि क्या इसे जीत कहा जा सकता है या यह देश के रणनीतिक हितों की बलि चढ़ाकर किया गया एक विश्वासघात है?
समझौते के कृषि पहलुओं पर प्रहार करते हुए खरगे ने कहा कि मोदी सरकार ने पहली बार भारत के कृषि क्षेत्र को विदेशी उत्पादों के लिए पूरी तरह खोलकर किसानों के साथ धोखा किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि भारत-अमेरिका संयुक्त बयान में जिस ‘अतिरिक्त उत्पाद’ शब्द का अस्पष्ट इस्तेमाल किया गया था, उसका असली मतलब अब समझ में आ रहा है। खरगे ने दावा किया कि व्हाइट हाउस की फैक्ट शीट में ‘दाल’ को अचानक जोड़ दिया गया है, जबकि यह मूल संयुक्त बयान में शामिल नहीं था। उन्होंने कहा कि विदेशी दालों के आयात से भारतीय किसानों को उनकी उपज का सही दाम मिलना मुश्किल हो जाएगा।
कृषि के साथ-साथ खरगे ने भारत के विशाल डेयरी उद्योग और पशुधन की सुरक्षा पर भी गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने इस व्यापार समझौते के उस प्रावधान की कड़ी आलोचना की जिसमें अमेरिकी पशु आहार के आयात को मंजूरी दी गई है। खरगे का कहना है कि अमेरिका से आने वाला पशु आहार प्रायः जीएम (जीन संवर्धित यानी जेनेटिकली मॉडिफाइड) होता है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि भारतीय मवेशियों को यह आहार दिया गया, तो इससे न केवल मवेशियों की नस्ल खराब होगी, बल्कि दूध की गुणवत्ता पर भी गंभीर प्रतिकूल असर पड़ेगा।
इस मुद्दे को राजनीति और विचारधारा से जोड़ते हुए खरगे ने भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) पर भी तंज कसा। उन्होंने कहा कि एक तरफ भाजपा और आरएसएस गाय के नाम पर लिंचिंग करने वालों का मौन समर्थन करते हैं, तो दूसरी तरफ उनकी सरकार ऐसे निर्णय ले रही है जो देश की मवेशी नस्ल को नष्ट करने की कोशिश है। उन्होंने दावा किया कि अमेरिकी जीएम चारे के आयात से देश के लगभग दो करोड़ डेयरी किसानों की आजीविका पर सीधा प्रहार होगा, जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं।
समझौते के औद्योगिक प्रभावों पर बात करते हुए कांग्रेस अध्यक्ष ने कपड़ा (टेक्सटाइल) उद्योग को हुए नुकसान का भी मुद्दा उठाया। उन्होंने सरकार के उस दावे को खारिज कर दिया जिसमें 18 प्रतिशत टैरिफ (सीमा शुल्क) को एक ‘ऐतिहासिक जीत’ के रूप में प्रचारित किया जा रहा है। खरगे ने इसकी तुलना अमेरिका-बांग्लादेश समझौते से करते हुए इसे एक ‘रणनीतिक आत्मसमर्पण’ करार दिया। उन्होंने तर्क दिया कि अमेरिका ने बांग्लादेश को अमेरिकी कॉटन का इस्तेमाल करने के बदले शून्य-शुल्क की सुविधा प्रदान की है, जबकि भारत के कपड़ा उद्योग को अभी भी 18 प्रतिशत के भारी शुल्क का सामना करना पड़ रहा है। खरगे के अनुसार, इस असमानता के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय कपड़ा उद्योग की प्रतिस्पर्धात्मकता खत्म हो जाएगी और लाखों लोगों के रोजगार पर खतरा मंडराएगा।
कुल मिलाकर, मल्लिकार्जुन खरगे ने इस व्यापार समझौते को पारदर्शिता की कमी और राष्ट्रीय हितों के साथ समझौते का एक बड़ा उदाहरण बताया है। कांग्रेस ने मांग की है कि सरकार इस समझौते के सभी बिंदुओं को सार्वजनिक करे और देश को बताए कि किन शर्तों के आधार पर यह व्यापारिक संधि की गई है। खरगे का यह बयान आने वाले दिनों में संसद के भीतर और बाहर एक बड़े राजनीतिक संघर्ष का संकेत दे रहा है, जहां विपक्ष सरकार को घेरने की तैयारी में है।