• January 31, 2026

संगम में आस्था बनाम अधिकार: माघी पूर्णिमा स्नान के लिए शंकराचार्य की चार कठोर शर्तें, क्या झुकेगा प्रशासन?

प्रयागराज/लखनऊ: उत्तर प्रदेश की आध्यात्मिक राजधानी प्रयागराज में चल रहे माघ मेले में इस समय भारी गहमागहमी का माहौल है। ज्योतिर्मठ के पीठाधीश्वर जगद्गुरु स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद महाराज और स्थानीय प्रशासन के बीच चला आ रहा लंबा गतिरोध अब एक नए मोड़ पर पहुंच गया है। लखनऊ के गलियारों से लेकर प्रयागराज के रेतीले तटों तक इस बात की चर्चा तेज है कि शंकराचार्य आगामी माघी पूर्णिमा के पावन अवसर पर संगम में आस्था की डुबकी लगा सकते हैं। हालांकि, यह जितना सरल दिख रहा है, उतना है नहीं। खबर है कि उत्तर प्रदेश शासन के कुछ उच्चाधिकारियों ने शंकराचार्य से संपर्क साध कर उन्हें मनाने की कवायद शुरू कर दी है, लेकिन महाराज ने प्रशासन के सामने ऐसी चार शर्तें रख दी हैं, जिन्होंने शासन को धर्मसंकट में डाल दिया है। इन शर्तों पर सहमति बनने के बाद ही यह तय होगा कि शंकराचार्य स्नान के लिए आएंगे या गतिरोध बरकरार रहेगा।

इस पूरे विवाद की जड़ें 18 जनवरी 2026 को मौनी अमावस्या के दिन हुई उस अप्रिय घटना से जुड़ी हैं, जिसने संत समाज को झकझोर कर रख दिया था। उस दिन जब शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अपनी पालकी और समर्थकों के साथ संगम की ओर प्रस्थान कर रहे थे, तब पुलिस प्रशासन ने उनके रथ को रोक दिया था। अधिकारियों का तर्क था कि भीड़ अधिक होने के कारण सुरक्षा कारणों से रथ आगे नहीं जा सकता और महाराज को पैदल स्नान के लिए जाना चाहिए। इस बात को लेकर पुलिस और साधु-संतों के बीच तीखी नोकझोंक हुई, जिसने देखते ही देखते हिंसक मोड़ ले लिया। शंकराचार्य का आरोप है कि गृह सचिव मोहित गुप्ता, मंडलायुक्त सौम्या अग्रवाल और पुलिस कमिश्नर जोगेंद्र कुमार की उपस्थिति में पुलिसकर्मियों ने संन्यासियों, ब्राह्मण बटुकों और वृद्ध संतों के साथ मारपीट की। महाराज ने अत्यंत मर्माहत होकर बताया कि पुलिसकर्मियों ने ब्राह्मणों की चोटी पकड़कर उन्हें घसीटा और अपमानित किया, जो सनातन परंपरा में एक अक्षम्य अपराध माना जाता है।

इस अपमान के विरोध में शंकराचार्य ने 18 जनवरी से ही माघ मेले में त्रिवेणी मार्ग स्थित अपने बद्रिकाश्रम हिमालय शिविर के बाहर सड़क किनारे धरना शुरू कर दिया था। यह धरना लगातार 11 दिनों तक चला, जिसने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा। कड़ाके की ठंड में सड़क पर बैठे शंकराचार्य इस बात पर अड़े रहे कि जब तक दोषी अधिकारी माफी नहीं मांगते, वे वहां से नहीं हटेंगे। आश्चर्यजनक रूप से, इन 11 दिनों के दौरान प्रशासन का कोई भी जिम्मेदार अधिकारी उनसे वार्ता करने या खेद प्रकट करने नहीं पहुंचा। अंततः, 28 जनवरी को महाराज अपना धरना समाप्त कर वाराणसी के लिए रवाना हो गए, लेकिन उनके मन में प्रशासन के प्रति गहरा रोष बना रहा।

अब जबकि माघी पूर्णिमा का पर्व करीब है, प्रशासन को अपनी गलती का अहसास होता दिख रहा है। लखनऊ के शीर्ष अधिकारियों ने इस कड़वाहट को दूर करने के लिए शंकराचार्य से संपर्क किया है। लेकिन शंकराचार्य के राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी शैलेंद्र योगीराज सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि महाराज केवल आश्वासन से नहीं मानेंगे। उन्होंने प्रशासन के सामने चार प्रमुख मांगें रखी हैं। पहली शर्त यह है कि मौनी अमावस्या के दिन अभद्रता करने वाले सभी उच्चाधिकारी लिखित में सार्वजनिक माफी मांगें। दूसरी मांग के तहत संन्यासियों और बटुकों की पिटाई करने वाले पुलिसकर्मियों पर सख्त विभागीय कार्रवाई के साथ-साथ आपराधिक मुकदमा (FIR) दर्ज किया जाए। तीसरी और अत्यंत महत्वपूर्ण मांग यह है कि गाय माता को ‘राज्यमाता’ घोषित किया जाए, जो कि शंकराचार्य का लंबे समय से चला आ रहा आंदोलन है। चौथी शर्त में उन्होंने मांग की है कि भविष्य में चारों पीठों के शंकराचार्यों के संगम स्नान के लिए एक स्थाई और गरिमापूर्ण प्रोटोकॉल निर्धारित किया जाए, ताकि दोबारा किसी भी धर्माचार्य का अपमान न हो।

इस विवाद के बीच मेला प्रशासन की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठे हैं। मौनी अमावस्या की घटना के बाद, जब माहौल को शांत करने की जरूरत थी, तब प्रयागराज मेला प्राधिकरण ने शंकराचार्य को एक नोटिस जारी कर दिया। इस नोटिस में महाराज से उनके ‘शंकराचार्य’ होने के प्रमाण मांगे गए और सुप्रीम कोर्ट के पुराने आदेशों का हवाला देते हुए उनसे स्पष्टीकरण मांगा गया कि वे अपने नाम के आगे यह पदवी क्यों लगा रहे हैं। इतना ही नहीं, प्रशासन ने उन्हें एक और नोटिस देकर उनके शिविर की भूमि का आवंटन निरस्त करने और माघ मेले में उनके प्रवेश पर आजीवन प्रतिबंध लगाने तक की चेतावनी दे डाली। प्रशासन के इस अड़ियल और आक्रामक रुख ने आग में घी डालने का काम किया, जिसकी चौतरफा निंदा हुई।

राजनीतिक रूप से भी यह मुद्दा तूल पकड़ चुका है। उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव समेत विपक्षी दलों के कई बड़े नेताओं ने शंकराचार्य का खुला समर्थन किया है और सरकार पर संतों के अपमान का आरोप मढ़ा है। विपक्ष का कहना है कि एक तरफ सरकार सनातन संस्कृति के संरक्षण की बात करती है और दूसरी तरफ देश के सर्वोच्च धर्माचार्यों के साथ अपराधियों जैसा व्यवहार किया जा रहा है। इस राजनीतिक दबाव और आगामी चुनावों की सुगबुगाहट ने शासन को बैकफुट पर ला दिया है, जिसके चलते अब समझौते के रास्ते तलाशे जा रहे हैं।

शंकराचार्य के रुख से स्पष्ट है कि वे सिद्धांतों के साथ समझौता करने को तैयार नहीं हैं। उनका मानना है कि यह केवल उनके व्यक्तिगत अपमान की बात नहीं है, बल्कि यह संपूर्ण सनातन परंपरा और सन्यास धर्म की गरिमा का प्रश्न है। यदि प्रशासन उनकी इन चार मांगों को मान लेता है, तो माघी पूर्णिमा पर उनकी वापसी न केवल एक धार्मिक अनुष्ठान होगी, बल्कि यह सत्य और धर्म की जीत के रूप में देखी जाएगी। फिलहाल, पूरी दुनिया की नजरें उत्तर प्रदेश सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं। क्या प्रशासन अपने अधिकारियों की गलती स्वीकार कर लिखित माफी मांगेगा? क्या गाय को राज्यमाता का दर्जा देने की दिशा में कोई ठोस कदम उठाया जाएगा? इन सवालों के जवाब ही यह तय करेंगे कि माघी पूर्णिमा पर संगम की लहरें शंकराचार्य का स्वागत करेंगी या यह विवाद एक बड़े आंदोलन का रूप ले लेगा।

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