सबरीमाला मंदिर सोना चोरी मामला: 90 दिन में चार्जशीट दाखिल न होने पर पूर्व प्रशासनिक अधिकारी मुरारी बाबू को मिली जमानत, जांच पर उठे सवाल
केरल के प्रसिद्ध सबरीमाला श्री अयप्पा मंदिर से जुड़े कथित सोना चोरी मामले में एक बार फिर बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। इस हाई-प्रोफाइल मामले में शुक्रवार को अदालत ने त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड (TDB) के पूर्व प्रशासनिक अधिकारी मुरारी बाबू को कानूनी जमानत दे दी। यह जमानत किसी ठोस जांच निष्कर्ष के आधार पर नहीं, बल्कि एक कानूनी प्रक्रिया के तहत दी गई है, क्योंकि विशेष जांच टीम (SIT) गिरफ्तारी के 90 दिन पूरे होने के बावजूद अब तक चार्जशीट दाखिल करने में असफल रही।
इस फैसले के बाद न केवल जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगे हैं, बल्कि राज्य सरकार, देवस्वोम बोर्ड और मंदिर प्रशासन की भूमिका भी एक बार फिर कठघरे में आ गई है। सबरीमाला मंदिर करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है और इससे जुड़ा कोई भी विवाद स्वाभाविक रूप से राज्य और देशभर में गंभीर चर्चा का विषय बन जाता है।
क्या है पूरा मामला?
सबरीमाला मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाए गए सोने और कीमती धातुओं के रखरखाव, गिनती और सुरक्षा को लेकर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। बीते वर्ष जांच के दौरान यह सामने आया कि मंदिर के भंडार में दर्ज सोने की मात्रा और वास्तविक उपलब्धता में अंतर है। प्रारंभिक आकलन में यह दावा किया गया कि मंदिर से काफी मात्रा में सोना या तो गायब है या उसका सही रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है।
इसी कथित वित्तीय और संपत्ति संबंधी अनियमितताओं के चलते केरल सरकार ने मामले की गंभीरता को देखते हुए एक विशेष जांच टीम (SIT) गठित की थी। जांच का जिम्मा मंदिर प्रशासन से जुड़े अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका की पड़ताल करना था।
जांच के दौरान त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड के तत्कालीन प्रशासनिक अधिकारी मुरारी बाबू का नाम सामने आया, जिसके बाद उन्हें दो अलग-अलग मामलों में गिरफ्तार किया गया।
किन मामलों में हुई थी गिरफ्तारी?
मुरारी बाबू पर आरोप था कि उनके कार्यकाल के दौरान:
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मंदिर के सोने की गिनती और सत्यापन प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताएं हुईं
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सोने के भंडारण और लेखा-जोखा में लापरवाही बरती गई
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उच्च पद पर होने के बावजूद सुरक्षा और पारदर्शिता सुनिश्चित नहीं की गई
इन आरोपों के आधार पर उनके खिलाफ दो अलग-अलग एफआईआर दर्ज की गईं और SIT ने उन्हें हिरासत में लिया। मामले को बेहद संवेदनशील मानते हुए जांच एजेंसियों ने इसे बड़े स्तर की साजिश या संगठित लापरवाही के तौर पर देखा।
अदालत ने क्यों दी जमानत?
शुक्रवार को संबंधित अदालत ने मुरारी बाबू को डिफॉल्ट बेल (कानूनी जमानत) प्रदान की। भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) के अनुसार, यदि किसी आरोपी को गिरफ्तार किए जाने के बाद तय समय सीमा (आमतौर पर 60 या 90 दिन) के भीतर चार्जशीट दाखिल नहीं की जाती, तो आरोपी को जमानत का अधिकार मिल जाता है।
इस मामले में:
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मुरारी बाबू की गिरफ्तारी को 90 दिन पूरे हो चुके थे
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SIT अब तक दोनों मामलों में चार्जशीट दाखिल नहीं कर सकी
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अदालत ने इसे आरोपी का वैधानिक अधिकार मानते हुए जमानत मंजूर की
अदालत ने स्पष्ट किया कि यह जमानत जांच की गुणवत्ता या आरोपी की बेगुनाही पर टिप्पणी नहीं है, बल्कि केवल कानूनी प्रक्रिया का पालन है।
अदालत की टिप्पणी
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि जांच एजेंसी को पर्याप्त समय दिया गया था, लेकिन वह तय अवधि में आरोप तय करने में विफल रही। ऐसे में कानून के तहत आरोपी को राहत देना अनिवार्य हो जाता है।
हालांकि अदालत ने यह भी कहा कि:
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जांच जारी रहेगी
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आरोपी को जांच में सहयोग करना होगा
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गवाहों को प्रभावित करने या सबूतों से छेड़छाड़ करने पर जमानत रद्द की जा सकती है
SIT की भूमिका पर सवाल
इस फैसले के बाद विशेष जांच टीम की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। आलोचकों का कहना है कि:
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इतना संवेदनशील मामला होने के बावजूद जांच में अपेक्षित तेजी नहीं दिखाई गई
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90 दिन का समय पर्याप्त था, फिर भी चार्जशीट तैयार नहीं हो सकी
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क्या जांच में जानबूझकर देरी की गई?
कुछ सामाजिक संगठनों और श्रद्धालु समूहों ने आशंका जताई है कि मामला राजनीतिक और प्रशासनिक दबावों की भेंट चढ़ रहा है।
त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड की प्रतिक्रिया
त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड ने अदालत के फैसले का सम्मान करते हुए कहा कि:
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बोर्ड जांच में पूरा सहयोग कर रहा है
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जमानत मिलने का मतलब यह नहीं कि मामला खत्म हो गया
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यदि किसी भी स्तर पर अनियमितता पाई जाती है, तो सख्त कार्रवाई की जाएगी
हालांकि बोर्ड ने SIT की देरी पर कोई सीधी टिप्पणी करने से परहेज किया।
श्रद्धालुओं और संगठनों में नाराज़गी
सबरीमाला मंदिर से जुड़े इस मामले को लेकर श्रद्धालुओं और हिंदू संगठनों में गहरी नाराज़गी देखी जा रही है। उनका कहना है कि:
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मंदिर की संपत्ति श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़ी है
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सोने के कथित नुकसान को हल्के में नहीं लिया जा सकता
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जांच में पारदर्शिता और जवाबदेही जरूरी है
कुछ संगठनों ने केरल हाईकोर्ट से निगरानी में जांच कराने की मांग भी उठाई है।
पहले भी उठ चुके हैं सवाल
यह पहला मौका नहीं है जब सबरीमाला मंदिर के प्रशासन को लेकर सवाल खड़े हुए हों। इससे पहले भी:
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चढ़ावे के प्रबंधन
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सोने और कीमती वस्तुओं की गिनती
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डिजिटल रिकॉर्ड और ऑडिट प्रक्रिया
को लेकर विवाद सामने आते रहे हैं। हालांकि हर बार जांच और समितियों के गठन के बाद मामला ठंडे बस्ते में जाता दिखा।
आगे क्या?
मुरारी बाबू को जमानत मिलने के बाद अब निगाहें इस पर टिकी हैं कि:
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SIT कितनी जल्दी चार्जशीट दाखिल करती है
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क्या जांच का दायरा बढ़ाया जाएगा
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क्या अन्य अधिकारियों या कर्मचारियों की भूमिका भी सामने आएगी
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि अगर चार्जशीट में ठोस सबूत पेश नहीं किए गए, तो यह मामला अदालत में कमजोर पड़ सकता है।
निष्कर्ष
सबरीमाला मंदिर से जुड़े कथित सोना चोरी मामले में पूर्व प्रशासनिक अधिकारी मुरारी बाबू को जमानत मिलना भले ही एक कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा हो, लेकिन इससे जांच एजेंसियों की कार्यक्षमता पर गंभीर सवाल जरूर खड़े हुए हैं। करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़े इस मंदिर के मामले में पारदर्शी, निष्पक्ष और तेज जांच की उम्मीद की जा रही है।
अब यह देखना अहम होगा कि केरल सरकार और जांच एजेंसियां इस मामले को कितनी गंभीरता से आगे बढ़ाती हैं, या फिर यह भी अन्य विवादों की तरह समय के साथ दबकर रह जाएगा।