• January 19, 2026

कर्नाटक के लाकुंडी में ‘गोल्ड रश’: सोने के सिक्कों और आभूषणों की तलाश में सरकार ने शुरू किया बड़ा खुदाई अभियान

कर्नाटक का गडग जिला इन दिनों एक बार फिर देश के पुरातात्विक मानचित्र पर चमक उठा है। राज्य सरकार ने ऐतिहासिक लाकुंडी गांव में छिपे हुए प्राचीन खजाने की खोज के लिए एक व्यापक खुदाई अभियान शुरू करने का आधिकारिक निर्णय लिया है। यह कदम तब उठाया गया है जब हाल ही में इस क्षेत्र से सोने के सिक्कों और बेशकीमती आभूषणों से भरा एक प्राचीन घड़ा बरामद हुआ। इस खोज ने न केवल पुरातत्वविदों के बीच उत्साह भर दिया है, बल्कि सरकार को भी विश्वास दिलाया है कि लाकुंडी की मिट्टी के नीचे सदियों पुराने साम्राज्यों का विशाल खजाना दबा हो सकता है।

लाकुंडी, जो कभी दक्षिण भारत के महान साम्राज्यों की राजधानी और व्यापारिक केंद्र हुआ करता था, आज अपनी खोई हुई विरासत को वापस पाने की दहलीज पर खड़ा है। कर्नाटक सरकार का पर्यटन विभाग, पुरातत्व विभाग, लाकुंडी विकास प्राधिकरण और जिला प्रशासन मिलकर इस मिशन को अंजाम दे रहे हैं। खुदाई के लिए आवश्यक मशीनरी, जिसमें जेसीबी, ट्रक और ट्रैक्टर शामिल हैं, को पहले ही कोटे वीरभद्रेश्वर मंदिर परिसर में तैनात कर दिया गया है, जो इस अभियान का मुख्य केंद्र है।

ऐतिहासिक विरासतों का संगम और स्वर्ण निर्माण का केंद्र

लाकुंडी कोई साधारण गांव नहीं है; यह भारतीय इतिहास के कुछ सबसे शक्तिशाली राजवंशों की कर्मस्थली रहा है। प्राचीन काल में यह स्थल चालुक्य, राष्ट्रकूट, होयसल, कलचूरी और विजयनगर जैसे महान साम्राज्यों के अधीन था। इन राजवंशों के शासनकाल के दौरान लाकुंडी न केवल कला और वास्तुकला का केंद्र था, बल्कि यह आर्थिक रूप से भी अत्यंत समृद्ध था।

पुरातत्व विभाग के विशेषज्ञों के अनुसार, लाकुंडी के बारे में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि प्राचीन काल में यहाँ सोने के सिक्के ढालने की टकसाल (Mint) हुआ करती थी। ऐतिहासिक अभिलेखों और अब तक मिली कलाकृतियों से संकेत मिलते हैं कि इस क्षेत्र में सोने का बड़े पैमाने पर व्यापार और प्रसंस्करण होता था। यही कारण है कि सरकार और इतिहासकारों का मानना है कि मंदिर परिसरों और पुराने किलों के आसपास के क्षेत्रों में भारी मात्रा में मुद्राएं और आभूषण दबे हो सकते हैं।

तांबे के घड़े और 470 ग्राम सोने की वह रहस्यमयी खोज

इस ताजा खुदाई अभियान की नींव हाल ही में हुई एक आकस्मिक खोज ने रखी। दरअसल, इलाके के एक स्थानीय युवक को खुदाई के दौरान तांबे का एक पुराना घड़ा मिला था। जब इस घड़े को खोला गया, तो इसमें से लगभग 470 ग्राम वजन के सोने के आभूषण और प्राचीन सिक्के बरामद हुए। इस खोज की खास बात यह थी कि युवक ने ईमानदारी का परिचय देते हुए इस अमूल्य निधि को जिला प्रशासन को सौंप दिया।

इस घटना के बाद पुरातत्व विभाग के कान खड़े हो गए। अधिकारियों का कहना है कि जिस स्थान से यह घड़ा मिला है, वह केवल एक छोटा सा हिस्सा हो सकता है। लाकुंडी की भौगोलिक और ऐतिहासिक स्थिति को देखते हुए यह प्रबल संभावना है कि यहाँ सोने, चांदी के अलावा हीरे और मोतियों के भंडार भी दबे हो सकते हैं। इससे पहले नवंबर 2024 में भी इसी क्षेत्र में प्रारंभिक खुदाई की गई थी, जिसके दौरान हजारों की संख्या में प्राचीन मूर्तियां और शिलालेख प्राप्त हुए थे, जो इस जगह की सांस्कृतिक समृद्धि की पुष्टि करते हैं।

कोटे वीरभद्रेश्वर मंदिर परिसर में वैज्ञानिक खुदाई की तैयारी

सरकार ने अपनी योजना के तहत कोटे वीरभद्रेश्वर मंदिर के आसपास के 10 गुणा 10 मीटर के क्षेत्र को प्राथमिक खुदाई के लिए चिन्हित किया है। इस अभियान को बहुत ही सावधानी और वैज्ञानिक तरीके से अंजाम दिया जा रहा है ताकि किसी भी प्राचीन अवशेष को नुकसान न पहुंचे। भारी मशीनरी के साथ-साथ मानवीय श्रम का भी बखूबी इस्तेमाल किया जा रहा है। एक प्रशासनिक अधिकारी ने जानकारी दी कि खुदाई के कार्य में 15 महिला श्रमिकों और पांच पुरुष श्रमिकों की एक विशेष टीम लगाई गई है, जो पुरातत्वविदों की देखरेख में मिट्टी की परतों को हटाने का काम करेंगे।

पुरातत्व विभाग के विशेषज्ञों का मानना है कि मंदिर परिसर के नीचे गुप्त तहखाने या कक्ष हो सकते हैं, जिनका उपयोग युद्ध या आक्रमण के समय खजाने को सुरक्षित रखने के लिए किया जाता था। चूंकि लाकुंडी कई बार सत्ता के संघर्ष का केंद्र रहा, इसलिए तत्कालीन राजाओं और व्यापारियों द्वारा अपनी संपत्ति को जमीन के नीचे छिपाना एक सामान्य प्रक्रिया थी।

पर्यटन और पुरातत्व के लिए एक नया सवेरा

कर्नाटक सरकार का मानना है कि यदि इस खुदाई में उम्मीद के मुताबिक खजाना और ऐतिहासिक वस्तुएं मिलती हैं, तो लाकुंडी विश्व पर्यटन के मानचित्र पर हम्पी की तरह उभर सकता है। लाकुंडी पहले से ही अपने ’50 मंदिरों और 101 कुओं’ के लिए प्रसिद्ध है, लेकिन इस नए खजाने की खोज इसे एक ‘ओपन एयर म्यूजियम’ में बदल सकती है।

जिला प्रशासन और लाकुंडी विकास प्राधिकरण इस बात पर भी ध्यान दे रहे हैं कि खुदाई के दौरान मिलने वाली हर छोटी से छोटी वस्तु का दस्तावेजीकरण किया जाए। यह अभियान केवल खजाने की खोज तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दक्षिण भारत के मध्यकालीन इतिहास के अनसुलझे पहलुओं को सुलझाने का एक बड़ा प्रयास भी है। स्थानीय लोगों में भी इस अभियान को लेकर भारी उत्साह है और उन्हें उम्मीद है कि उनके गांव का स्वर्णिम अतीत एक बार फिर दुनिया के सामने आएगा।

जैसे-जैसे खुदाई आगे बढ़ेगी, यह देखना दिलचस्प होगा कि लाकुंडी की गहराई में और कौन-कौन से रहस्य छिपे हैं। क्या यह केवल कुछ सिक्कों तक सीमित रहेगा या भारत को एक और ‘स्वर्ण भंडार’ मिलने वाला है, इसका फैसला आने वाले कुछ हफ्तों की मेहनत करेगी।

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