बॉलीवुड का ‘डार्क पीआर गेम’: तापसी पन्नू ने खोली फिल्म इंडस्ट्री की पोल, कहा- “आजकल दूसरों को गिराने के लिए भी दिए जा रहे हैं पैसे”
मुंबई: अपनी दमदार अदाकारी और बेबाक बयानों के लिए मशहूर अभिनेत्री तापसी पन्नू एक बार फिर चर्चा में हैं। इस बार उन्होंने किसी फिल्म या विवाद पर नहीं, बल्कि फिल्म इंडस्ट्री के उस अदृश्य तंत्र पर हमला बोला है जिसे ‘पीआर’ (पब्लिक रिलेशंस) कहा जाता है। तापसी ने खुलासा किया है कि पिछले कुछ वर्षों में बॉलीवुड में पीआर का स्वरूप पूरी तरह बदल गया है। अब यह केवल खुद को प्रमोट करने का जरिया नहीं रहा, बल्कि दूसरों की छवि खराब करने और उन्हें नीचे गिराने का एक ‘हथियार’ बन चुका है। अभिनेत्री ने इस व्यवस्था की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि वह खुद को इस बनावटी खेल से दूर रखना ही बेहतर समझती हैं।
पीआर गेम का बदला स्वरूप: “अब दूसरों को गिराने की होड़ है”
एक हालिया साक्षात्कार के दौरान तापसी पन्नू ने इंडस्ट्री के मौजूदा हालातों पर विस्तार से बात की। उन्होंने कहा कि पिछले डेढ़-दो सालों में पीआर का खेल एक अलग ही और खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है। पहले पीआर का मतलब होता था कि कलाकार खुद को आगे बढ़ाने और अपनी उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने के लिए पैसे देते थे, जो एक हद तक व्यावसायिक जरूरत मानी जाती थी। लेकिन अब माहौल बदल चुका है। तापसी के अनुसार, आज के दौर में लोग न केवल खुद को ऊपर उठाने के लिए निवेश कर रहे हैं, बल्कि किसी और को नीचे गिराने या उनकी असफलता को भुनाने के लिए भी भारी-भरकम रकम खर्च कर रहे हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर कब से किसी एक कलाकार की सफलता, दूसरे की असफलता पर निर्भर होने लगी?
व्यक्तित्व का नया मुखौटा और प्रासंगिकता की जंग
तापसी ने इंडस्ट्री में कलाकारों द्वारा ‘प्रासंगिक’ बने रहने की कोशिशों पर भी तीखा प्रहार किया। उन्होंने कहा कि आज के दौर में लोग सोशल मीडिया और पीआर के माध्यम से अपने व्यक्तित्व का एक नया मुखौटा तैयार कर रहे हैं। अक्सर यह देखा जाता है कि पर्दे पर कलाकार जो इमेज बनाने की कोशिश करता है और वास्तविक जीवन में उसका काम जो कहता है, उन दोनों के बीच एक गहरा विरोधाभास होता है। तापसी के मुताबिक, कलाकार एक ‘सशक्त आवाज’ बनाने की कोशिश तो कर रहे हैं, लेकिन वह आवाज उनकी अपनी नहीं होती, बल्कि पीआर एजेंसी द्वारा रची गई होती है। उन्होंने साफ किया कि केवल हिट फिल्में देना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि एक कलाकार की अपनी मौलिक और सच्ची पहचान होनी चाहिए।
पैसे देकर आर्टिकल छपवाने के खिलाफ तापसी का रुख
फिल्मों से अपनी रफ्तार धीमी करने के फैसले पर बात करते हुए तापसी ने कहा कि यह उनकी एक सोची-समझी कोशिश थी। वह इस शोर-शराबे और बनावटीपन से दूर होकर अपने काम पर ध्यान केंद्रित करना चाहती थीं। उन्होंने स्पष्ट किया कि वह पेड मीडिया और पीआर आर्टिकल्स के पक्ष में बिल्कुल नहीं हैं। तापसी ने कहा, “मेरा मानना है कि झूठे और पैसे देकर छपवाए गए आर्टिकल्स पर निवेश करने से कहीं बेहतर है कि मैं वह पैसा खुद पर और अपने करीबियों की खुशी पर खर्च करूं।” यह बयान दर्शाता है कि तापसी फिल्म जगत की उस भेड़-चाल का हिस्सा नहीं बनना चाहतीं जहाँ सफलता को खरीदा जाता है।
विरोधाभास और ‘सशक्त आवाज’ का संकट
तापसी ने इस बात पर जोर दिया कि एक कलाकार की असली पहचान उसके काम से होनी चाहिए, न कि उसके द्वारा बनाए गए ‘पर्सोना’ से। उन्होंने कहा कि अक्सर कलाकार फिल्मों से परे एक अलग छवि बनाने की कोशिश करते हैं, लेकिन जब उनके काम (फिल्मों) को देखा जाता है, तो वह उनकी बनाई गई इमेज से मेल नहीं खाता। यही वह विरोधाभास है जिसे आज की पीढ़ी के कलाकार समझ नहीं पा रहे हैं। तापसी के अनुसार, एक सशक्त आवाज तभी प्रभावी होती है जब उसमें ईमानदारी हो और वह आपके काम का ही विस्तार हो, न कि केवल एक मार्केटिंग टूल।
वर्कफ्रंट: ‘गांधारी’ के साथ ओटीटी पर धमाके की तैयारी
तापसी पन्नू के करियर ग्राफ पर नजर डालें तो उन्होंने 2010 में तेलुगु फिल्म ‘झुम्मंडी नादम’ से अपना सफर शुरू किया था और 2012 में ‘चश्मे बद्दूर’ से बॉलीवुड में कदम रखा। ‘पिंक’, ‘थप्पड़’, ‘बदला’ और ‘हसीन दिलरुबा’ जैसी फिल्मों से उन्होंने अपनी एक अलग पहचान बनाई है। 2024 में वह अक्षय कुमार के साथ फिल्म ‘खेल खेल में’ नजर आई थीं, जिसे दर्शकों की मिली-जुली प्रतिक्रिया मिली। अब फैंस को उनकी आगामी फिल्म ‘गांधारी’ का बेसब्री से इंतजार है। यह फिल्म ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज होगी और उम्मीद जताई जा रही है कि इसमें एक बार फिर तापसी का वह सशक्त और बेबाक अंदाज देखने को मिलेगा जिसके लिए वह जानी जाती हैं।
तापसी पन्नू का यह ताजा बयान बॉलीवुड के भीतर चल रही गलाकाट प्रतिस्पर्धा और छवि निर्माण के व्यापार पर एक गंभीर टिप्पणी है, जो आने वाले दिनों में इंडस्ट्री के भीतर नई बहस छेड़ सकता है।