आधुनिक खुफिया तंत्र की चुनौतियां: वैश्विक अस्थिरता और तकनीक के बीच भारत को बदलनी होगी रणनीति, ORF की रिपोर्ट में बड़ी चेतावनी
नई दिल्ली: वैश्विक राजनीति और सुरक्षा की बदलती लहरों के बीच भारत के खुफिया तंत्र को लेकर एक महत्वपूर्ण चेतावनी सामने आई है। ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन (ORF) की ताजा रिपोर्ट ‘स्वॉर्ड्स एंड शील्ड्स: नेविगेटिंग द मॉडर्न इंटेलिजेंस लैंडस्केप’ में स्पष्ट किया गया है कि वर्तमान भू-राजनीतिक अस्थिरता और तकनीक के तेजी से होते विकास ने पारंपरिक खुफिया प्रणालियों को गंभीर दबाव में डाल दिया है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए न केवल अपने खुफिया तंत्र को मजबूत करना होगा, बल्कि उसे आधुनिक डिजिटल युग की जरूरतों के हिसाब से पूरी तरह बदलना भी होगा।
यह रिपोर्ट ओआरएफ के अध्यक्ष समीर सरन और ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के शोधार्थी आर्चिशमन रे गोस्वामी द्वारा लिखी गई है। लेखकों का तर्क है कि अब वह समय बीत चुका है जब खुफिया एजेंसियां केवल गुप्त सूचनाओं और मानवीय संपर्कों के आधार पर काम करती थीं। आज के दौर में डिजिटल कनेक्टिविटी, निजी खुफिया एजेंसियों का उदय और बदलता वैश्विक शक्ति संतुलन ऐसी नई चुनौतियां पेश कर रहा है, जिनसे निपटने के लिए भारत को एक व्यापक और भविष्यवादी दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है।
जियोटेक्नोग्राफी: डिजिटल और भौगोलिक दुनिया का एकीकरण
रिपोर्ट में एक बेहद महत्वपूर्ण अवधारणा ‘जियोटेक्नोग्राफी’ (Geotechnography) का जिक्र किया गया है। यह वह स्थिति है जहां भौगोलिक सीमाएं और डिजिटल दुनिया आपस में पूरी तरह जुड़ जाती हैं। आज के समय में राजनीतिक पहचान, विचार और जनमत केवल भौतिक सीमाओं के भीतर नहीं बनते, बल्कि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से तेजी से बदलते और प्रसारित होते हैं। रिपोर्ट कहती है कि यह एकीकरण पारंपरिक सुरक्षा ढांचे के लिए सबसे बड़ी चुनौती है क्योंकि अब विचार और अस्थिरता बिजली की गति से एक देश से दूसरे देश तक पहुंच सकते हैं।
ऐसे उथल-पुथल वाले भू-राजनीतिक माहौल में, अचानक होने वाले सामाजिक और राजनीतिक उभार किसी भी देश की स्थिरता को खतरे में डाल सकते हैं। लेखकों का कहना है कि भारत की खुफिया एजेंसियों को वैश्विक घटनाओं और उनके स्थानीय प्रभावों के बीच बेहतर तालमेल बिठाने के लिए अपनी विश्लेषणात्मक क्षमताओं को कई गुना बढ़ाना होगा।
तकनीकी एकीकरण: एआई और बिग डेटा की अनिवार्य भूमिका
आधुनिक इंटेलिजेंस के क्षेत्र में अब केवल ‘ह्यूमन इंटेलिजेंस’ (HUMINT) पर्याप्त नहीं रह गई है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और मशीन लर्निंग जैसी उन्नत तकनीकों को अपने सिस्टम का अभिन्न अंग बनाना होगा। आज के समय में सूचनाओं का अंबार लगा हुआ है, लेकिन उन सूचनाओं में से काम की जानकारी निकालना और बड़े ‘डाटा सेट’ का विश्लेषण करना इंसानी क्षमताओं के लिए कठिन होता जा रहा है।
रिपोर्ट ने विशेष रूप से ‘बिग टेक’ कंपनियों के पास मौजूद विशाल डेटा भंडार के प्रति आगाह किया है। गूगल, मेटा और अन्य बड़ी तकनीकी कंपनियों के पास नागरिकों और राष्ट्रों की जो जानकारी है, वह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए नई और जटिल चुनौतियां पैदा कर रही है। यदि भारत इन तकनीकों के इस्तेमाल में पीछे रहता है, तो वह साइबर युद्ध और सूचना युद्ध (Information Warfare) के इस दौर में पिछड़ सकता है।
संसाधनों के लिए संघर्ष: पारंपरिक अभियानों से परे नई रणनीति
एक और महत्वपूर्ण मुद्दा जो इस रिपोर्ट में उठाया गया है, वह है महत्वपूर्ण भौतिक संसाधनों पर नियंत्रण की जंग। वर्तमान में प्रतिस्पर्धी राष्ट्र दुर्लभ-पृथ्वी तत्वों (Rare-Earth Elements) और अन्य रणनीतिक सामग्रियों पर अपना प्रभाव जमाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। ये सामग्रियां केवल व्यापार का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि आधुनिक सैन्य तकनीक और सेमीकंडक्टर जैसे भविष्य के उद्योगों के लिए रीढ़ की हड्डी हैं।
ORF की रिपोर्ट के अनुसार, खुफिया एजेंसियों को अब केवल क्षेत्रीय सीमाओं की रक्षा तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उन्हें आर्थिक कूटनीति और संसाधन सुरक्षा के क्षेत्र में भी नए तरीके अपनाने होंगे। रणनीतिक प्रतिस्पर्धा में बढ़ती तीव्रता का सामना करने के लिए खुफिया एजेंसियों को यह समझना होगा कि भविष्य के युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं, बल्कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं (Supply Chains) में भी लड़े जाएंगे।
निजी खुफिया एजेंसियों का उभार और सुरक्षा ढांचा
रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया गया है कि अब खुफिया जानकारी जुटाने का काम केवल सरकारी एजेंसियों तक सीमित नहीं रहा है। निजी खुफिया एजेंसियों का वैश्विक स्तर पर उभार पारंपरिक प्रणालियों के लिए एक नया ‘ब्लैक होल’ पैदा कर रहा है। ये एजेंसियां अक्सर बहुराष्ट्रीय कंपनियों या शक्तिशाली समूहों के लिए काम करती हैं और कभी-कभी सरकारी हितों के साथ टकराती हैं। भारत के लिए चुनौती यह है कि वह कैसे अपने आधिकारिक सुरक्षा ढांचे और इन निजी संस्थाओं के बीच एक संतुलन और निगरानी तंत्र विकसित करे ताकि देश की संप्रभुता पर आंच न आए।
निष्कर्ष और भविष्य की राह
कुल मिलाकर, ‘स्वॉर्ड्स एंड शील्ड्स’ रिपोर्ट भारत को अपने सुरक्षा दृष्टिकोण में एक ‘पैराडाइम शिफ्ट’ (बुनियादी बदलाव) लाने की सलाह देती है। लेखकों का कहना है कि यदि भारत को एक महाशक्ति के रूप में उभरना है, तो उसे एक ऐसी ‘प्रतिक्रियाशील खुफिया प्रणाली’ विकसित करनी होगी जो किसी भी संकट के आने से पहले उसे भांप सके। इसके लिए तकनीक, मानव संसाधन और रणनीतिक दूरदर्शिता का एक अनूठा मेल जरूरी है।
यह रिपोर्ट नीति निर्धारकों के लिए एक चेतावनी है कि तकनीक और भूगोल के बदलते संबंधों को समझे बिना आधुनिक दौर की जंग नहीं जीती जा सकती। भारत को अपने ‘शील्ड’ (सुरक्षा कवच) को और मजबूत और ‘स्वॉर्ड’ (तलवार/आक्रामक क्षमता) को और तेज करने के लिए निवेश और नवाचार पर जोर देना होगा।