• January 20, 2026

जेएनयू दीक्षांत समारोह: उपराष्ट्रपति ने बताया लोकतंत्र में ‘टकराव’ का महत्व, तो मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने ‘देश विरोधी’ नारों पर जताई कड़ी नाराजगी

नई दिल्ली: जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) एक बार फिर वैचारिक विमर्श और विवादों के केंद्र में है। सोमवार को विश्वविद्यालय के नौवें दीक्षांत समारोह के अवसर पर जहाँ एक ओर अकादमिक उपलब्धियों का उत्सव मनाया गया, वहीं दूसरी ओर परिसर में हुए हालिया विरोध प्रदर्शनों को लेकर राजनीतिक सरगर्मियां तेज रहीं। दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने जेएनयू में लगे कथित ‘देश विरोधी’ नारों पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए इसे पूरे राष्ट्र के लिए स्तब्ध करने वाला बताया। वहीं, समारोह के मुख्य अतिथि उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने स्वस्थ लोकतंत्र की परिभाषा गढ़ते हुए बहस और असहमति को आवश्यक बताया, लेकिन राष्ट्र निर्माण के प्रति सामूहिक संकल्प को सर्वोपरि रखा।

मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता का प्रहार: ‘दंगा आरोपियों का समर्थन दुर्भाग्यपूर्ण’

दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने सोमवार को संवाददाताओं से बातचीत करते हुए जेएनयू परिसर में हुई हालिया घटनाओं की कड़े शब्दों में निंदा की। उन्होंने कहा कि एक प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थान में दंगा आरोपियों की जमानत की मांग करना और आतंकवादियों का समर्थन करना बेहद चिंताजनक है। मुख्यमंत्री ने 5 जनवरी की घटना का उल्लेख करते हुए कहा कि जिस तरह से परिसर के अंदर प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के खिलाफ अशोभनीय और उकसाने वाले नारे लगाए गए, उसने पूरे देश को सदमे में डाल दिया है।

मुख्यमंत्री ने राष्ट्रीय युवा दिवस के अवसर पर युवाओं को बधाई देते हुए याद दिलाया कि राष्ट्र को प्रगति की ओर ले जाने में उनकी भूमिका निर्णायक है। उन्होंने दुख व्यक्त करते हुए कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे छात्र राष्ट्र के खिलाफ बोल रहे हैं। उनके अनुसार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर देश की अखंडता और सुरक्षा से समझौता करने वाली मानसिकता को बढ़ावा देना किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं है। रेखा गुप्ता ने जोर देकर कहा कि शिक्षण संस्थान ज्ञान के मंदिर होने चाहिए, न कि ऐसी गतिविधियों के केंद्र जहाँ देश विरोधी भावनाओं को हवा दी जाए।

उपराष्ट्रपति का संदेश: बहस और असहमति लोकतंत्र की शक्ति

जेएनयू के नौवें दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने लोकतंत्र के सूक्ष्म पहलुओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि एक जीवंत और स्वस्थ लोकतंत्र में बहस, चर्चा और असहमति का होना अनिवार्य है। उन्होंने यहाँ तक कहा कि विचारों का टकराव भी लोकतंत्र का एक आवश्यक तत्व है, क्योंकि इसी प्रक्रिया से समाज परिपक्व होता है। हालांकि, उन्होंने सचेत किया कि इन सभी प्रक्रियाओं का अंतिम उद्देश्य किसी सकारात्मक निष्कर्ष पर पहुँचना होना चाहिए।

उपराष्ट्रपति ने छात्रों को संबोधित करते हुए कहा कि एक बार जब लोकतांत्रिक रूप से निर्णय ले लिया जाता है, तो सुचारू प्रशासन और राष्ट्रीय हित के लिए उसे लागू करने में सभी की सामूहिक इच्छा और सहयोग होना चाहिए। स्वामी विवेकानंद की जयंती का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि वास्तविक शिक्षा वही है जो व्यक्ति के चरित्र का निर्माण करे और उसे आत्मनिर्भर बनाए। उन्होंने स्नातक होने वाले छात्रों से आह्वान किया कि वे अपनी बुद्धि और कौशल का उपयोग 2047 तक ‘विकसित भारत’ के सपने को साकार करने में करें। उन्होंने छात्रों को तीन मुख्य जिम्मेदारियों—बौद्धिक ईमानदारी, सामाजिक समावेशन और राष्ट्रीय विकास—की शपथ भी दिलाई।

कानूनी कार्रवाई: दिल्ली पुलिस ने दर्ज की एफआईआर

जेएनयू में 5 जनवरी को हुए विरोध प्रदर्शन के मामले में प्रशासन की शिकायत पर दिल्ली पुलिस ने कड़ा रुख अपनाया है। पुलिस ने इस संबंध में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न गंभीर धाराओं के तहत प्राथमिकी दर्ज की है। इसमें शांति भंग करने के इरादे से जानबूझकर अपमान (धारा 352), सार्वजनिक उपद्रव को उकसाने वाले बयान (धारा 353-1) और सामान्य इरादे (धारा 3-5) के तहत मामला दर्ज किया गया है।

यह विवाद तब शुरू हुआ था जब सुप्रीम कोर्ट ने 2020 के दिल्ली दंगों की साजिश के मामले में आरोपी उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत अर्जी खारिज कर दी थी। इसके विरोध में कुछ छात्रों ने कथित तौर पर परिसर के अंदर आपत्तिजनक नारेबाजी की थी। पुलिस अब वीडियो फुटेज और गवाहों के आधार पर उन चेहरों की पहचान कर रही है जिन्होंने कानून व्यवस्था को चुनौती देने और संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी करने का प्रयास किया।

जेएनयू की उपलब्धियां: ऐतिहासिक भर्ती और वित्तीय मजबूती

इन विवादों के बीच जेएनयू की कुलपति शांतिश्री धूलिपुडी पंडित ने विश्वविद्यालय की अकादमिक और प्रशासनिक सफलताओं का ब्योरा पेश किया। दीक्षांत समारोह में उन्होंने गर्व के साथ घोषणा की कि विश्वविद्यालय ने अपनी अकादमिक उत्कृष्टता को पुनः बहाल किया है। उन्होंने बताया कि प्रशासन ने एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए संकायों की भर्ती प्रक्रिया को सफलतापूर्वक पूरा किया है और पदोन्नति की प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी और समावेशी बनाया गया है।

कुलपति ने विश्वविद्यालय की वित्तीय स्थिति पर जानकारी देते हुए बताया कि जेएनयू ने 70 करोड़ रुपये का एक विशाल ‘कॉर्पस फंड’ जुटाया है, जो भविष्य के शोध और विकास कार्यों में सहायक होगा। उन्होंने बताया कि 1969 में अपनी स्थापना के बाद से जेएनयू निरंतर विस्तार कर रहा है और आज यहाँ 14 स्कूल और नौ विशेष केंद्र संचालित हैं। वर्तमान में विश्वविद्यालय 80 पीएचडी कार्यक्रमों सहित स्नातक और स्नातकोत्तर स्तर के दर्जनों पाठ्यक्रम चला रहा है। इस वर्ष प्रवेश के लिए मिली भारी प्रतिक्रिया पर खुशी जताते हुए उन्होंने बताया कि 3,000 से अधिक नए दाखिलों के साथ जेएनयू की छात्र संख्या अब लगभग 9,100 तक पहुँच गई है।

राष्ट्र निर्माण और संवैधानिक मूल्यों के प्रति सामूहिक प्रतिबद्धता

दीक्षांत समारोह का समापन एक नई ऊर्जा के साथ हुआ, जहाँ उपराष्ट्रपति ने छात्रों से संवैधानिक मूल्यों और भारत के सभ्यतागत लोकाचार द्वारा निर्देशित रहने का आह्वान किया। उन्होंने छात्रों से अपील की कि वे अपने ज्ञान का उपयोग समाज की असमानताओं को कम करने के लिए करें। जेएनयू का यह दीक्षांत समारोह इस बात का गवाह बना कि वैचारिक मतभेदों के बावजूद, शिक्षा का अंतिम लक्ष्य राष्ट्र सेवा ही है। मुख्यमंत्री के कड़े बयानों और उपराष्ट्रपति के संतुलित मार्गदर्शन ने यह स्पष्ट कर दिया कि आगामी समय में जेएनयू जैसे संस्थानों को अपनी गौरवशाली अकादमिक विरासत और लोकतांत्रिक मर्यादाओं के बीच एक महीन संतुलन बनाकर चलना होगा।

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