वैश्विक कूटनीति में नई हलचल: राष्ट्रपति मैक्रों की अमेरिका-चीन को चेतावनी और भारत के साथ रणनीतिक तालमेल
पेरिस/नई दिल्ली: दुनिया की महाशक्तियों के बीच बढ़ते प्रभुत्व की जंग को लेकर फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने एक कड़ा और स्पष्ट रुख अपनाया है। पेरिस में आयोजित फ्रांसीसी दूतावासों के वार्षिक सम्मेलन में, भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर की गरिमामयी उपस्थिति में मैक्रों ने अमेरिका और चीन की नीतियों पर सीधा प्रहार किया। उन्होंने दुनिया को ‘नई औपनिवेशिकता’ के खतरों से आगाह करते हुए साफ कर दिया कि फ्रांस किसी भी ऐसे साम्राज्यवादी रवैये का समर्थन नहीं करेगा जो छोटे देशों की संप्रभुता को खतरे में डालता हो।
नई औपनिवेशिकता के खिलाफ फ्रांस की हुंकार
राष्ट्रपति मैक्रों का संबोधन वैश्विक व्यवस्था में आ रहे बदलावों का एक आईना था। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में दुनिया एक ऐसे दौर से गुजर रही है जहां महाशक्तियां अपने प्रभाव क्षेत्र को बढ़ाने के लिए पुराने औपनिवेशिक तरीकों का आधुनिक रूप में इस्तेमाल कर रही हैं। मैक्रों के अनुसार, चीन की आर्थिक विस्तारवादी नीतियां और अमेरिका का कुछ मोर्चों पर एकतरफा रुख, वैश्विक स्थिरता के लिए चुनौती है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि फ्रांस एक ऐसी स्वतंत्र विदेश नीति का पक्षधर है जो महाशक्तियों के बीच दुनिया को बांटने की ‘लालसा’ का विरोध करती है। मैक्रों ने जोर देकर कहा कि संप्रभुता केवल बड़ी ताकतों का विशेषाधिकार नहीं होनी चाहिए, बल्कि छोटे और विकासशील राष्ट्रों को भी अपनी नियति तय करने का पूर्ण अधिकार होना चाहिए। उन्होंने इस बात पर चिंता जताई कि दुनिया को फिर से दो ध्रुवों में बांटने की कोशिश की जा रही है, जो कि बहुपक्षवाद (Multilateralism) के सिद्धांतों के खिलाफ है।
अमेरिका की विदेश नीति पर गंभीर सवाल
मैक्रों का सबसे तीखा हमला अमेरिका पर रहा, जिसे परंपरागत रूप से फ्रांस का सहयोगी माना जाता है। उन्होंने अमेरिका पर आरोप लगाया कि वह एक स्थापित वैश्विक शक्ति होने के बावजूद धीरे-धीरे अंतरराष्ट्रीय नियमों से खुद को अलग कर रहा है। मैक्रों ने कहा कि अमेरिका की वर्तमान नीतियों में अपने पुराने सहयोगियों से दूरी बनाने की प्रवृत्ति देखी जा रही है, जो भविष्य के गठबंधन के लिए एक चेतावनी है।
यूरोपीय नेतृत्व में अमेरिका के प्रति यह अविश्वास पिछले कुछ विवादों से उपजा है। मैक्रों ने वेनेजुएला में अमेरिकी सैन्य अभियानों और ग्रीनलैंड जैसे क्षेत्रों को लेकर आए बयानों का संदर्भ देते हुए संकेत दिया कि वाशिंगटन का रवैया कई बार यूरोपीय हितों और वैश्विक संप्रभुता के मानकों से मेल नहीं खाता। नाटो के भीतर भी बढ़ती खींचतान और अमेरिका की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति ने फ्रांस को अपनी रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) पर जोर देने के लिए मजबूर किया है।
विदेश मंत्री एस. जयशंकर और मैक्रों की मुलाकात
इस कूटनीतिक हलचल के बीच भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर की पेरिस यात्रा ने भारत-फ्रांस संबंधों की गहराई को एक बार फिर रेखांकित किया है। जयशंकर ने राष्ट्रपति मैक्रों से मुलाकात कर उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से शुभकामनाएं दीं। इस मुलाकात को वैश्विक भू-राजनीति के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि भारत और फ्रांस दोनों ही ‘बहुध्रुवीय विश्व’ (Multipolar World) के प्रबल समर्थक हैं।
मुलाकात के बाद एस. जयशंकर ने सोशल मीडिया पर अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि राष्ट्रपति मैक्रों के साथ वैश्विक घटनाक्रमों पर चर्चा करना हमेशा प्रेरणादायक होता है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय चुनौतियों पर मैक्रों के दूरदर्शी विचारों की सराहना की। जयशंकर ने भारत-फ्रांस रणनीतिक साझेदारी की मजबूती को दोहराते हुए कहा कि दोनों देश न केवल रक्षा और सुरक्षा, बल्कि वैश्विक शासन के सिद्धांतों पर भी समान सोच रखते हैं।
भारत एआई-इम्पैक्ट शिखर सम्मेलन 2026 और मैक्रों की यात्रा
फ्रांस और भारत के बीच यह संवाद महज औपचारिक नहीं है, बल्कि इसके पीछे भविष्य की एक बड़ी कार्ययोजना छिपी है। राष्ट्रपति मैक्रों अगले महीने भारत की यात्रा पर आने वाले हैं। उनकी यह यात्रा ऐसे समय में हो रही है जब भारत ‘ग्लोबल भारत एआई-इम्पैक्ट शिखर सम्मेलन 2026’ की मेजबानी करने जा रहा है।
यह शिखर सम्मेलन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के भविष्य और समाज पर इसके प्रभावों को लेकर वैश्विक दिशा तय करेगा। फ्रांस, जो तकनीक और नवाचार के क्षेत्र में भारत का एक प्रमुख भागीदार है, इस शिखर सम्मेलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की उम्मीद कर रहा है। मैक्रों की आगामी यात्रा के दौरान रक्षा सौदों, हिंद-प्रशांत (Indo-Pacific) क्षेत्र में सहयोग और जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दों पर कई बड़े समझौतों पर मुहर लग सकती है।
निष्कर्ष: एक नए कूटनीतिक ध्रुव की ओर
मैक्रों के बयान और जयशंकर की पेरिस उपस्थिति यह संकेत देती है कि भारत और फ्रांस मिलकर एक ऐसा तीसरा ध्रुव विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं, जो न तो अमेरिका के पूर्ण प्रभाव में हो और न ही चीन के विस्तारवाद के आगे झुके। फ्रांस का भारत को ‘विश्व मित्र’ के रूप में देखना और भारत का फ्रांस को यूरोप में अपने सबसे भरोसेमंद रणनीतिक साझेदार के रूप में चुनना, वैश्विक कूटनीति के एक नए अध्याय की शुरुआत है। आने वाले महीनों में मैक्रों की भारत यात्रा इस साझेदारी को नई ऊंचाइयों पर ले जाने का काम करेगी।