• January 2, 2026

MP Mining Scandal: भाजपा विधायक संजय पाठक की मुश्किलें बढ़ीं, ₹443 करोड़ की वसूली को लेकर प्रशासनिक कार्रवाई, विधानसभा में गूंजा मामला

MP Mining Scandal: मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) की राजनीति में एक बार फिर बड़ा भूचाल आ गया है। भाजपा (BJP) विधायक और पूर्व मंत्री संजय पाठक (Sanjay Pathak) से जुड़ी कंपनियों पर ₹443 करोड़ से अधिक की वसूली की कार्रवाई ने सत्ता के गलियारों से लेकर प्रशासनिक हलकों तक हलचल मचा दी है। जबलपुर (Jabalpur) कलेक्टर राघवेंद्र सिंह (Raghvendra Singh) द्वारा 10 नवंबर 2025 को जारी किया गया यह नोटिस अब विधानसभा में भी गूंज चुका है। खनिज उत्खनन में निर्धारित सीमा से अधिक उत्पादन, भारी गड़बड़ी और जीएसटी (GST) चोरी जैसे गंभीर आरोपों के बीच अब सरकार की भूमिका भी सवालों के घेरे में आ गई है। मुख्यमंत्री मोहन यादव (CM Mohan Yadav) ने इस पूरे मामले पर सदन में लिखित जवाब दिया है। आखिर यह ₹443 करोड़ का मामला क्या है, खनिज विभाग की जांच में कौन-से बड़े खुलासे हुए हैं और अब आगे क्या बड़ी कार्रवाई होने वाली है? तो चलिए जानते हैं पूरी खबर क्या है, जानते हैं विस्तार से…

अवैध उत्खनन की शिकायत और तीन कंपनियों का मामला

यह पूरा मामला मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) के जबलपुर जिला (Jabalpur District) स्थित सिहोरा तहसील (Sihora Tehsil) से जुड़ा हुआ है। यहां भाजपा विधायक और पूर्व मंत्री संजय पाठक (Sanjay Pathak) से जुड़े लोगों के नाम पर तीन प्रमुख कंपनियाँ—आनंद माइनिंग कार्पोरेशन (Anand Mining Corporation), निर्मला मिनरल्स (Nirmala Minerals) और मेसर्स पेसिफिक एक्सपोर्ट (M/s Pacific Export)—खनिज उत्खनन का कार्य कर रही थीं। इन कंपनियों पर मुख्य आरोप यह है कि उन्होंने स्वीकृत क्षमता से कहीं अधिक खनिज का उत्खनन किया, जिससे सरकार को देय रॉयल्टी (Royalty) और जीएसटी (GST) राजस्व का भारी नुकसान हुआ। इस गंभीर मामले की शिकायत सबसे पहले आशुतोष मनु दीक्षित (Ashutosh Manu Dixit) द्वारा आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ, भोपाल (Economic Offences Wing, Bhopal) में की गई थी। शिकायत के बाद, खनिज साधन विभाग (Mineral Resources Department) ने एक विशेष जांच दल गठित कर पूरे प्रकरण की विस्तृत जांच शुरू की।

₹443 करोड़ 4 लाख की देनदारी तय, नोटिस जारी

खनिज विभाग की विस्तृत जांच रिपोर्ट में एक चौंकाने वाला और बड़ा खुलासा सामने आया। रिपोर्ट के आधार पर, इन तीनों कंपनियों पर कुल ₹443 करोड़ 4 लाख 86 हजार 890 रुपये की भारी-भरकम देनदारी तय की गई। इस राशि में अवैध उत्खनन से अर्जित अनुमानित आय के साथ-साथ सरकारी खजाने को हुए जीएसटी (GST) राजस्व के नुकसान की राशि भी शामिल है। इस रिपोर्ट को आधार बनाते हुए, जबलपुर (Jabalpur) कलेक्टर राघवेंद्र सिंह (Raghvendra Singh) ने 10 नवंबर 2025 को संबंधित कंपनियों को एक सख्त नोटिस जारी किया। नोटिस में कंपनियों से तुरंत जवाब मांगा गया और स्पष्ट चेतावनी दी गई कि यदि तय समयसीमा में संतोषजनक जवाब नहीं मिला तो प्रशासन सख्त राजस्व वसूली कार्रवाई शुरू करेगा। विधायक संजय पाठक (Sanjay Pathak) ने इस नोटिस के जवाब के लिए विभाग से 15 दिनों का अतिरिक्त समय मांगा है, जिस पर विभाग विचार कर रहा है।

विधानसभा में उठा मामला, हाई कोर्ट के जज ने भी खुद को अलग किया

इस भारी-भरकम वसूली के मामले को कांग्रेस विधायक डॉ. हीरालाल अलावा (Dr. Hiralal Alawa) ने विधानसभा (Vidhan Sabha) में जोर-शोर से उठाया। उन्होंने सीधे सरकार से सवाल किया कि जांच रिपोर्ट में अवैध उत्खनन और टैक्स चोरी की पुष्टि होने के बावजूद इतनी बड़ी राशि की वसूली में अब तक देरी क्यों की जा रही है? इस पर मुख्यमंत्री मोहन यादव (CM Mohan Yadav) ने सदन में लिखित जवाब दिया कि जांच दल का प्रतिवेदन मिल चुका है और कलेक्टर (Collector) द्वारा राशि जमा कराने के लिए नोटिस जारी किया गया है। दूसरी ओर, यह मामला न्यायिक हलकों में भी गरमाया। सूत्रों के मुताबिक, जबलपुर हाई कोर्ट (Jabalpur High Court) के एक जज ने इस मामले की सुनवाई से खुद को इसलिए अलग कर लिया था, क्योंकि उन्होंने कथित तौर पर आरोप लगाया था कि विधायक संजय पाठक ने इस मामले को लेकर उनसे फोन पर संपर्क साधने की कोशिश की थी।

कुर्की की तलवार और राजनीतिक संघर्ष

फिलहाल ₹443 करोड़ की वसूली का यह मामला पूरी तरह से प्रशासनिक और राजनीतिक निगरानी में है। जबलपुर (Jabalpur) कलेक्टर के नोटिस के बाद, अगला कदम कंपनियों द्वारा दिए जाने वाले जवाब और उनके कानूनी रुख पर निर्भर करेगा। यदि कंपनियों द्वारा तय समयसीमा में संतोषजनक जवाब और राशि जमा नहीं कराई जाती है, तो प्रशासन राजस्व वसूली अधिनियम के तहत सख्त कार्रवाई कर सकता है, जिसमें संबंधित संपत्ति की कुर्की (Attachment of Property) और बैंक खातों की जब्ती (Seizure of Bank Accounts) तक शामिल है। इस पूरे प्रकरण ने मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) की राजनीति को गरमा दिया है। विपक्ष इसे भाजपा सरकार की कथित संरक्षण नीति से जोड़कर देख रहा है, जबकि सरकार कानून के अनुसार कार्रवाई की बात पर अड़ी हुई है। आने वाले दिनों में यह मामला ईओडब्ल्यू (EOW), हाई कोर्ट (High Court) और विधानसभा, तीनों स्तरों पर एक बड़ा कानूनी और राजनीतिक संघर्ष बन सकता है।

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