• January 2, 2026

The Path of Renunciation: 30 साल के हर्षित बने जैन मुनि, करोड़ों का व्यापार-संपत्ति छोड़ अपनाया संयम; बोले- कोरोना काल में देखा, कोई किसी का नहीं।

उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) के बागपत (Baghpat) जिले से एक ऐसी खबर सामने आई है, जिसने आधुनिक भौतिकवादी जीवन पर गहरा सवाल खड़ा कर दिया है। बागपत (Baghpat) के दोघट कस्बे के रहने वाले 30 वर्षीय सफल व्यापारी हर्षित जैन (Harshit Jain) ने दिल्ली (Delhi) के चांदनी चौक (Chandni Chowk) में स्थापित करोड़ों रुपये का कपड़ों का कारोबार, इंजीनियरिंग की शिक्षा और सुख-सुविधाओं भरा जीवन अचानक त्याग दिया है। हर्षित ने संसार की नश्वरता को महसूस करते हुए संयम (Renunciation) और आध्यात्मिक जीवन का कठिन मार्ग अपना लिया है। उनके इस वैराग्य का टर्निंग पॉइंट कोरोना महामारी (Corona Pandemic) के दौरान आया, जब उन्होंने अपनों को भी दूर होते देखा। बागपत (Baghpat) के बामनौली जैन मंदिर (Bamnoli Jain Mandir) में भव्य तिलक समारोह के साथ हर्षित ने मोह-माया त्यागने का दृढ़ संकल्प लिया है। कैसे एक सफल व्यापारी ने वैराग्य को जीवन का नया आधार बना लिया और उनकी इस यात्रा का प्रेरणा स्रोत क्या रहा, आइए जानते हैं…

सफलता के शिखर से वैराग्य की ओर: पृष्ठभूमि

बागपत (Baghpat) जिले के दोघट कस्बे से संबंध रखने वाले हर्षित जैन (Harshit Jain) ने संयम और अध्यात्म के मार्ग पर चलकर एक बड़ा निर्णय लिया है। हर्षित एक अत्यंत संपन्न और प्रतिष्ठित परिवार से आते हैं। उनके पिता सुरेश जैन (Suresh Jain) दिल्ली (Delhi) में विद्युत उपकरणों (Electrical Equipment) के बड़े व्यापारी हैं, जबकि बड़े भाई संयम जैन (Sanyam Jain) दिल्ली (Delhi) के जैन अस्पताल (Jain Hospital) में डॉक्टर (Doctor) के पद पर कार्यरत हैं। हर्षित ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा बड़ौत (Baraut) कस्बे से पूरी की और इसके बाद गाजियाबाद (Ghaziabad) से इंजीनियरिंग (Engineering) की उच्च शिक्षा प्राप्त की थी। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने दिल्ली (Delhi) के चांदनी चौक (Chandni Chowk) में कपड़ों का एक बेहद सफल व्यापार शुरू किया और महज़ 30 साल की उम्र में ही उन्होंने खुद को आर्थिक रूप से सशक्त (Financially Strong) बना लिया था।

कोरोना काल ने दिखाया संसार का सच और नश्वरता

हर्षित जैन (Harshit Jain) के जीवन में निर्णायक मोड़ कोरोना महामारी (Corona Pandemic) के दौरान आया। इस संकटकाल में उन्होंने बहुत करीब से संसार की नश्वरता और अस्थायित्व को महसूस किया। हर्षित ने बताया कि कोविड काल (Covid Period) में उन्होंने देखा कि इंसान अपनों से दूर हो रहे थे, और यहाँ तक कि परिवार के सदस्य भी एक-दूसरे को छूने से कतरा रहे थे। उन्होंने कहा, “कोविड काल में मैंने इंसानों को अपनों से दूर होते देखा। कोई किसी को हाथ लगाने से भी डर रहा था। भाई-भाई के करीब नहीं जा रहा था।” इस भयावह दृश्य ने हर्षित की आत्मा को गहरे तक झकझोरा। इस दौरान जीवन और मृत्यु (Life and Death) के संघर्ष को देखकर उनके भीतर वैराग्य की भावना प्रबल हो गई और उन्होंने यह दृढ़ संकल्प लिया कि संसार की मोह-माया त्यागकर उन्हें प्रभु की शरण में जाना है।

सामूहिक दीक्षा समारोह और परिवार का आशीर्वाद

हर्षित जैन (Harshit Jain) ने अपने इस कठोर और पवित्र संकल्प को केवल अकेले पूरा नहीं किया। बागपत (Baghpat) के बामनौली गांव स्थित जैन मंदिर (Bamnoli Jain Mandir) में आयोजित भव्य तिलक समारोह (Tilak Ceremony) में उनके साथ दो अन्य युवाओं—उत्तराखंड (Uttarakhand) के संभव जैन (Sambhav Jain) (छात्र) और हरियाणा (Haryana) के श्रेयस जैन (Shreyas Jain) ने भी दीक्षा लेकर सांसारिक जीवन (Mundane Life) का त्याग किया। इस सामूहिक दीक्षा कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं (Devotees) और जैन समाज के गणमान्य व्यक्ति सम्मिलित हुए। हर्षित ने बताया कि उनके परिवार पर बचपन से ही जैन संतों (Jain Saints) का आशीर्वाद रहा है, इसलिए परिवार ने उनके वैराग्य (Renunciation) के मार्ग में कोई बाधा नहीं डाली, बल्कि उन्हें पूर्ण सहयोग और आशीर्वाद दिया।

“अकेले आए हैं, अकेले ही जाएंगे”

हर्षित जैन (Harshit Jain) ने अपने वैराग्य का सार बताते हुए कहा, “मैंने देखा कि कोविड के दौरान परिवार के लोग भी एक-दूसरे के पास आने से डरते थे। दूर से थाली पकड़ाई जाती थी। यह दृश्य देखकर मन में गहरा परिवर्तन आया।” उन्होंने दृढ़ता से कहा कि इस संसार में कोई स्थायी नहीं है, “अकेले आए हैं और अकेले ही जाएंगे।” यही अटल सत्य उनके वैराग्य का मूल कारण बना। अब वे अपनी समस्त भौतिक संपत्ति, सफल व्यापार और आधुनिक जीवन शैली को त्यागकर पूर्णतः संयम और साधना के मार्ग पर अग्रसर हैं। उनका यह निर्णय समाज के उन युवाओं के लिए एक बड़ा संदेश है, जो भौतिक सफलता को ही जीवन का अंतिम लक्ष्य मानते हैं। आने वाले समय में, हर्षित जैन जैन मुनि (Jain Muni) के रूप में देश भर में धर्म का प्रचार और साधना का कठिन मार्ग अपनाएंगे।

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