आईआईटी में भारतीय ज्ञान प्रणाली पर राष्ट्रीय युवा सम्मेलन का शुभारम्भ
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान रुड़की ने जी-20 यूनिवर्सिटी कनेक्टः सेलिब्रेटिंग द इंडिक विजडम के हिस्से के रूप में एमएसी ऑडिटोरियम में भारतीय ज्ञान प्रणाली पर राष्ट्रीय युवा सम्मेलन हो रहा है। सम्मेलन का आयोजन आईकेएस प्रभाग, एमओईय केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्लीय पतंजलि विश्वविद्यालयय सीसीआरवाईएन, आयुष मंत्रालय एवं आईआईटी रुड़की पूर्व छात्र संघ के सहयोग से किया जा रहा है।
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान रुड़की में आयोजित भारतीय ज्ञान प्रणाली (आईकेएस) पर राष्ट्रीय युवा सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में आईकेएस से संबंधित वास्तविक अध्ययन सामग्री विकसित करने के महत्व पर जोर दिया गया। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान रुड़की में आईकेएस पर तीन दिवसीय राष्ट्रीय युवा सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में वक्ताओं का मुख्य जोर भारतीय ज्ञान प्रणाली पर वास्तविक अध्ययन सामग्री विकसित करना समय की मांग है।
उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि डॉ. निर्मलजीत सिंह कलसी, अध्यक्ष, एनसीवीईटी, कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय ने भारतीय ज्ञान प्रणाली के बारे में विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने आईकेएस में उपलब्ध 64 कलाओं पर प्रकाश डाला जो मानव जीवन के सभी पहलुओं को छू रहे हैं। उन्होंने उल्लेख किया कि भारत सरकार ने इनमें से कुछ कौशलों में प्रमाणन शुरू कर दिया है।
उद्घाटन सत्र के अतिथि केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के कुलपति प्रोफेसर श्रीनिवास वरखेड़ी ने इस बात पर प्रकाश डाला कि आईकेएस को भारत का भविष्य बनाने के लिए देखा जाना चाहिए। आईकेएस का अध्ययन केवल सामग्री के रूप में नहीं किया जाना चाहिए और इसके लिए नए सिरे से प्रतिमान अध्ययन की आवश्यकता है। इसे एक मृत ज्ञान प्रणाली नहीं माना जाना चाहिए बल्कि इसे भविष्य के दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए। प्रोफेसर गंतीमुथी, राष्ट्रीय समन्वयक, आईकेएस डिवीजन, एआईसीटीई, नई दिल्ली ने क्षेत्र में नए शोध की आवश्यकता पर बल दिया
समारोह की अध्यक्षता भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान रुड़की के निदेशक प्रोफेसर केके पंत ने की। उन्होंने आईआईटी रुड़की के कुलगीत का जिक्र किया जहां विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में समृद्ध प्राचीन ज्ञान का वर्णन किया गया है।
उद्घाटन सत्र में अतिथियों द्वारा तीन पुस्तकों का विमोचन भी किया गया। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान रुड़की के पूर्व छात्र सत्य नारायण और नवीन चंद्र द्वारा लिखित पुस्तक ऋग्वेद से वाल्मीकि रामायण तक भारत की पुरातत्वविद्या, दूसरी पुस्तक का नाम सुभाषितसंस्कृतम् है, और तीसरी का शीर्षक महावीरकीर्तिसौरभम् है, जिसके लेखक महाकवि डॉ. मनोहरलाल आर्य हैं।
सम्मेलन के आयोजन सचिव प्रोफेसर अनिल गौरीशेट्टी ने सभी अतिथियों और प्रतिनिधियों का स्वागत किया। सम्मेलन में देश के विभिन्न हिस्सों से लगभग 400 प्रतिनिधि भाग ले रहे हैं।





