आरएसएस के 100 वर्ष: सरसंघचालक मोहन भागवत बोले- राष्ट्र सशक्त तो व्यक्ति सुरक्षित, तकनीक साधन है साध्य नहीं; महिलाओं की 50% भागीदारी का आह्वान
देहरादून, 23 फरवरी 2026: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में देहरादून के हिमालयन कल्चरल सेंटर में आयोजित प्रमुख जन गोष्ठी और संवाद कार्यक्रम में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने अपने विचारपूर्ण मार्गदर्शन से सभा को संबोधित किया। कार्यक्रम का विषय था “100 वर्ष की संघ यात्रा- नए क्षितिज, नए आयाम”। इस अवसर पर सामाजिक, सांस्कृतिक, राष्ट्रीय और वैश्विक मुद्दों पर विस्तृत चर्चा हुई और उपस्थित हजारों श्रोताओं ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।
व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण
डॉ. मोहन भागवत ने संघ के मूल उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए कहा, “संघ की किसी से प्रतिस्पर्धा नहीं है। राष्ट्र सशक्त होगा, तो राष्ट्रवासी भी सशक्त होंगे। यदि राष्ट्र दुर्बल होगा, तो व्यक्ति अपने ही देश में सुरक्षित नहीं रह पाएगा। संघ का उद्देश्य व्यक्ति निर्माण है, क्योंकि सशक्त व्यक्ति से ही सशक्त समाज और सशक्त राष्ट्र का निर्माण होता है।”
डॉ. मोहन भागवत ने संघ के मूल उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए कहा, “संघ की किसी से प्रतिस्पर्धा नहीं है। राष्ट्र सशक्त होगा, तो राष्ट्रवासी भी सशक्त होंगे। यदि राष्ट्र दुर्बल होगा, तो व्यक्ति अपने ही देश में सुरक्षित नहीं रह पाएगा। संघ का उद्देश्य व्यक्ति निर्माण है, क्योंकि सशक्त व्यक्ति से ही सशक्त समाज और सशक्त राष्ट्र का निर्माण होता है।”
उन्होंने कहा कि लंबी ऐतिहासिक यात्रा के बाद आज पूरी दुनिया भारत को फिर से नेतृत्वकारी भूमिका में देखने की आशा कर रही है। उन्होंने उपस्थित जनसमूह से आह्वान किया कि वे “पंच परिवर्तन” के सिद्धांतों के माध्यम से समाज और राष्ट्र को सशक्त बनाने में सक्रिय भागीदारी करें और भारत को परम वैभव तक पहुंचाने का संकल्प लें।
भेदभाव का मूल कारण मन है, व्यवस्था नहीं
सरसंघचालक ने सामाजिक कुरीतियों और भेदभाव पर गहन टिप्पणी करते हुए कहा, “भेदभाव का मूल कारण कोई व्यवस्था नहीं, बल्कि मन है। अंधकार को पीटने से नहीं, प्रकाश जलाने से समाप्त किया जाता है। व्यवहार में परिवर्तन से ही भेदभाव मिटेगा।” उन्होंने संघ के स्वयंसेवकों का उदाहरण देते हुए कहा कि कई स्वयंसेवक दशकों तक कार्य करते हैं, लेकिन पहचान की अपेक्षा नहीं रखते, क्योंकि कार्य ही प्रधान है।डिजिटल युग में संयम और अनुशासन की जरूरत
डिजिटल युग और तकनीक पर बोलते हुए डॉ. भागवत ने कहा, “तकनीक साधन है, साध्य नहीं। उसका उपयोग संयम और अनुशासन से होना चाहिए। परिवार में आत्मीयता और समय देना आवश्यक है; तकनीक के लिए मनुष्य की बलि नहीं चढ़ाई जा सकती।” उन्होंने जोर दिया कि जो जोड़ने का कार्य करे, वही हिंदू है और मातृभूमि के प्रति भक्ति अनिवार्य है।
सरसंघचालक ने सामाजिक कुरीतियों और भेदभाव पर गहन टिप्पणी करते हुए कहा, “भेदभाव का मूल कारण कोई व्यवस्था नहीं, बल्कि मन है। अंधकार को पीटने से नहीं, प्रकाश जलाने से समाप्त किया जाता है। व्यवहार में परिवर्तन से ही भेदभाव मिटेगा।” उन्होंने संघ के स्वयंसेवकों का उदाहरण देते हुए कहा कि कई स्वयंसेवक दशकों तक कार्य करते हैं, लेकिन पहचान की अपेक्षा नहीं रखते, क्योंकि कार्य ही प्रधान है।डिजिटल युग में संयम और अनुशासन की जरूरत
डिजिटल युग और तकनीक पर बोलते हुए डॉ. भागवत ने कहा, “तकनीक साधन है, साध्य नहीं। उसका उपयोग संयम और अनुशासन से होना चाहिए। परिवार में आत्मीयता और समय देना आवश्यक है; तकनीक के लिए मनुष्य की बलि नहीं चढ़ाई जा सकती।” उन्होंने जोर दिया कि जो जोड़ने का कार्य करे, वही हिंदू है और मातृभूमि के प्रति भक्ति अनिवार्य है।
शक्ति अर्जित करो, लेकिन मर्यादित उपयोग करो
विश्व राजनीति पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा, “विश्व सत्य से अधिक शक्ति को समझता है। इसलिए शक्ति अर्जित करना आवश्यक है, किंतु उसका उपयोग मर्यादित होना चाहिए।”महिलाओं की 50% भागीदारी का आह्वान
महिलाओं की भूमिका पर बोलते हुए सरसंघचालक ने कहा, “महिलाएं पूर्णतः स्वतंत्र हैं। देश संचालन में उनकी भागीदारी 33 प्रतिशत ही नहीं, 50 प्रतिशत तक होनी चाहिए। प्रतिबंध काल में महिलाओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।”
विश्व राजनीति पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा, “विश्व सत्य से अधिक शक्ति को समझता है। इसलिए शक्ति अर्जित करना आवश्यक है, किंतु उसका उपयोग मर्यादित होना चाहिए।”महिलाओं की 50% भागीदारी का आह्वान
महिलाओं की भूमिका पर बोलते हुए सरसंघचालक ने कहा, “महिलाएं पूर्णतः स्वतंत्र हैं। देश संचालन में उनकी भागीदारी 33 प्रतिशत ही नहीं, 50 प्रतिशत तक होनी चाहिए। प्रतिबंध काल में महिलाओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।”
हिंदुत्व की राजनीति नहीं, व्यक्ति निर्माण का कार्य
उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ हिंदुत्व की राजनीति नहीं करता, बल्कि व्यक्ति निर्माण के माध्यम से समाज उत्थान का कार्य करता है। भ्रष्टाचार को मन से प्रारंभ और वहीं समाप्त करने की बात कही। जनसंख्या को बोझ और संसाधन दोनों दृष्टियों से देखने और समान रूप से लागू होने वाली विचारपूर्ण नीति की आवश्यकता पर बल दिया।कार्यक्रम में संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी, सामाजिक कार्यकर्ता और विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिनिधि मौजूद थे। यह गोष्ठी आरएसएस के शताब्दी वर्ष के उत्सव की एक महत्वपूर्ण कड़ी मानी जा रही है, जिसमें संगठन के भविष्य के आयामों और नए लक्ष्यों पर प्रकाश डाला गया।
उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ हिंदुत्व की राजनीति नहीं करता, बल्कि व्यक्ति निर्माण के माध्यम से समाज उत्थान का कार्य करता है। भ्रष्टाचार को मन से प्रारंभ और वहीं समाप्त करने की बात कही। जनसंख्या को बोझ और संसाधन दोनों दृष्टियों से देखने और समान रूप से लागू होने वाली विचारपूर्ण नीति की आवश्यकता पर बल दिया।कार्यक्रम में संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी, सामाजिक कार्यकर्ता और विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिनिधि मौजूद थे। यह गोष्ठी आरएसएस के शताब्दी वर्ष के उत्सव की एक महत्वपूर्ण कड़ी मानी जा रही है, जिसमें संगठन के भविष्य के आयामों और नए लक्ष्यों पर प्रकाश डाला गया।