• January 20, 2026

हैदराबाद: महिला IAS अधिकारी की मानहानि मामले में गिरफ्तार पत्रकारों को मिली जमानत, अदालत ने खारिज की पुलिस की रिमांड याचिका

हैदराबाद: तेलंगाना की राजनीति और प्रशासनिक गलियारों में हलचल मचाने वाले ‘IAS मानहानि मामले’ में गुरुवार को एक महत्वपूर्ण मोड़ आया। हैदराबाद की एक स्थानीय अदालत ने एक प्रमुख तेलुगु टीवी समाचार चैनल के दो वरिष्ठ पत्रकारों को जमानत दे दी है। इन पत्रकारों को एक महिला आईएएस अधिकारी के खिलाफ कथित रूप से आपत्तिजनक और मानहानिकारक सामग्री प्रसारित करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। अदालत ने न केवल पुलिस की रिमांड याचिका को खारिज किया, बल्कि अभिव्यक्ति की आजादी और कानूनी प्रक्रिया के पहलुओं को ध्यान में रखते हुए आरोपियों की तत्काल रिहाई का मार्ग प्रशस्त किया।

यह मामला पिछले कुछ दिनों से तेलंगाना में चर्चा का विषय बना हुआ है, जिसमें एक तरफ प्रशासनिक अधिकारियों की गरिमा का सवाल है, तो दूसरी तरफ मीडिया की स्वतंत्रता और सरकार की कार्रवाई पर विपक्षी दलों के तीखे हमले।

अदालती कार्यवाही और जमानत की शर्तें

गुरुवार को हुई सुनवाई के दौरान पुलिस और बचाव पक्ष के वकीलों के बीच तीखी बहस हुई। पुलिस ने दलील दी कि आरोपियों से और अधिक पूछताछ की जरूरत है ताकि इस कथित साजिश के पीछे के अन्य लोगों का पता लगाया जा सके। हालांकि, पत्रकारों का प्रतिनिधित्व कर रहे अधिवक्ताओं ने अदालत को बताया कि पुलिस के पास रिमांड मांगने के लिए पर्याप्त आधार नहीं हैं और सामग्री पहले ही जब्त की जा चुकी है।

दलीलों को सुनने के बाद, न्यायिक मजिस्ट्रेट ने पुलिस की रिमांड याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि फिलहाल आरोपियों को हिरासत में रखने की आवश्यकता नहीं है। अदालत ने प्रत्येक पत्रकार को 20,000 रुपये के दो जमानती पेश करने पर सशर्त जमानत दे दी। इसके साथ ही, अदालत ने एक सख्त निर्देश जारी करते हुए दोनों आरोपियों को अपने पासपोर्ट सरेंडर करने का आदेश दिया ताकि वे जांच के दौरान देश छोड़कर न जा सकें।

मामला और दर्ज की गई एफआईआर की धाराएं

इस पूरे विवाद की शुरुआत तब हुई जब ‘तेलंगाना आईएएस अधिकारी संघ’ ने पुलिस में एक औपचारिक शिकायत दर्ज कराई। संघ का आरोप था कि कुछ चुनिंदा समाचार चैनलों पर एक महिला आईएएस अधिकारी के बारे में “झूठी, मनगढ़ंत और पूरी तरह से निराधार” सामग्री प्रसारित की जा रही है। शिकायत में कहा गया कि इस प्रकार के प्रसारण से न केवल अधिकारी की व्यक्तिगत छवि धूमिल हुई है, बल्कि पूरे प्रशासनिक ढांचे के मनोबल पर भी बुरा असर पड़ा है।

इस शिकायत के आधार पर, हैदराबाद पुलिस के केंद्रीय अपराध केंद्र (CCS) ने 10 जनवरी को एक प्राथमिकी (FIR) दर्ज की। मामले की गंभीरता को देखते हुए भारतीय न्याय संहिता (BNS), सूचना प्रौद्योगिकी (IT) अधिनियम और महिलाओं के अश्लील चित्रण (निषेध) अधिनियम, 1986 की विभिन्न प्रासंगिक धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया। इन धाराओं के तहत मानहानि, डिजिटल माध्यमों का दुरुपयोग और महिला की गरिमा को ठेस पहुंचाने जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं।

एसआईटी का गठन और पुलिस की कार्रवाई

मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए हैदराबाद के पुलिस आयुक्त वीसी सज्जनार ने आठ अधिकारियों वाली एक विशेष जांच टीम (SIT) का गठन किया था। एसआईटी को निर्देश दिया गया था कि वे तकनीकी साक्ष्यों और डिजिटल फॉरेंसिक के माध्यम से प्रसारित सामग्री के स्रोत का पता लगाएं। जांच के दौरान मिली सूचनाओं और तकनीकी इनपुट के आधार पर, टीम ने 14 जनवरी को कार्रवाई शुरू की।

पुलिस ने चैनल के एक वरिष्ठ पत्रकार और एक इनपुट संपादक को गिरफ्तार किया। पुलिस आयुक्त सज्जनार ने बताया कि इनपुट संपादक को उस समय हिरासत में लिया गया जब वह राजीव गांधी अंतरराष्ट्रीय (RGI) हवाई अड्डे से बैंकॉक भागने की कोशिश कर रहा था। इमिग्रेशन अधिकारियों ने पुलिस द्वारा जारी लुकआउट नोटिस के आधार पर उसे रोका और एसआईटी के हवाले कर दिया। पुलिस ने दावा किया कि उनके पास आरोपियों के खिलाफ डिजिटल सबूत मौजूद हैं, जिन्हें जांच के लिए जब्त कर लिया गया है।

राजनीतिक घमासान: सरकार बनाम विपक्ष

पत्रकारों की गिरफ्तारी के बाद तेलंगाना में सियासी पारा चढ़ गया है। विपक्षी दलों—भारत राष्ट्र समिति (BRS) और भारतीय जनता पार्टी (BJP)—ने इस कार्रवाई को मीडिया की आवाज दबाने की कोशिश करार दिया। बीआरएस नेताओं ने आरोप लगाया कि कांग्रेस सरकार अपनी विफलताओं को छिपाने के लिए पत्रकारों को निशाना बना रही है और राज्य में ‘अघोषित आपातकाल’ जैसी स्थिति पैदा कर दी गई है।

भाजपा ने भी इस मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि मानहानि के मामलों में सीधी गिरफ्तारी के बजाय कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया जाना चाहिए था। विपक्ष ने इसे सीधे तौर पर प्रेस की स्वतंत्रता पर हमला बताया और गिरफ्तार पत्रकारों की तत्काल रिहाई की मांग करते हुए विरोध प्रदर्शन की चेतावनी दी थी। वहीं, सत्ताधारी दल का कहना है कि यह मामला प्रेस की आजादी का नहीं, बल्कि एक महिला की गरिमा और झूठी खबरें फैलाने के खिलाफ कानून की सामान्य प्रक्रिया का है।

निष्कर्ष और मीडिया नैतिकता के सवाल

अदालत द्वारा जमानत मिलने के बाद पत्रकारों की रिहाई तो हो गई है, लेकिन यह मामला मीडिया जगत के लिए कई सवाल छोड़ गया है। डिजिटल युग में ‘ब्रेकिंग न्यूज’ की होड़ में किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत छवि और आधिकारिक प्रतिष्ठा के बीच की रेखा धुंधली होती जा रही है। आईएएस एसोसिएशन का रुख स्पष्ट है कि मीडिया को अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए, जबकि पत्रकार संगठनों का तर्क है कि कानून का इस्तेमाल डराने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।

फिलहाल एसआईटी मामले की जांच जारी रखेगी और यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या पुलिस आरोपियों के खिलाफ अदालत में ठोस सबूत पेश कर पाती है। इस मामले के नतीजे भविष्य में तेलंगाना में मीडिया और प्रशासन के बीच के संबंधों को परिभाषित करेंगे।

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