• February 1, 2026

सुप्रीम कोर्ट में आज ‘सुपर थर्सडे’: मतदाता सूची से लेकर जेल सुधारों तक, इन 4 बड़े मामलों पर टिकी हैं देश की नजरें

नई दिल्ली: भारत की सर्वोच्च अदालत आज कई ऐसे कानूनी और संवैधानिक मोर्चों पर सुनवाई करने जा रही है, जिनके परिणाम देश की लोकतांत्रिक जड़ों और सामाजिक न्याय की दिशा बदल सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट की विभिन्न पीठों के समक्ष आज चुनावी प्रक्रिया की शुद्धता, भ्रष्टाचार के हाई-प्रोफाइल मामले, न्यायपालिका में लैंगिक समानता और जेलों में बंद कैदियों के मानवाधिकारों जैसे संवेदनशील विषय सूचीबद्ध हैं। मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ समेत अन्य बेंचों में होने वाली इन सुनवाइयों को कानूनी विशेषज्ञ ‘न्यायिक सक्रियता’ के एक महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में देख रहे हैं।

आज की कार्यवाही न केवल राजनीतिक दलों के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यह आम नागरिक के वोट देने के अधिकार और समाज के सबसे उपेक्षित वर्ग यानी कैदियों के जीवन स्तर से भी जुड़ी है। आइए विस्तार से समझते हैं कि आज देश की सबसे बड़ी अदालत किन बड़े मुद्दों पर अपना फैसला सुना सकती है या दलीलें सुन सकती है।

मतदाता सूची पुनरीक्षण: लोकतंत्र की शुचिता पर अंतिम प्रहार

आज की सबसे महत्वपूर्ण सुनवाई चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूचियों के ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (Special Intensive Revision) के फैसले को लेकर है। विभिन्न राज्यों से आई याचिकाओं में चुनाव आयोग के इस कदम को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि चुनाव से ऐन पहले मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर नाम जोड़ना या हटाना चुनावी निष्पक्षता को प्रभावित कर सकता है। वहीं, चुनाव आयोग का पक्ष है कि यह प्रक्रिया केवल यह सुनिश्चित करने के लिए है कि कोई भी पात्र मतदाता छूट न जाए और फर्जी मतदाताओं के नाम हटाए जा सकें।

चूंकि यह मामला अब अपनी ‘अंतिम सुनवाई’ (Final Hearing) के चरण में है, इसलिए कोर्ट का आज का रुख यह तय करेगा कि आने वाले विधानसभा और स्थानीय निकाय चुनावों में मतदाता सूची का स्वरूप क्या होगा। कोर्ट इस बात की बारीकी से जांच कर रहा है कि क्या इस प्रक्रिया में पारदर्शिता बरती गई है या नहीं। यदि कोर्ट इसमें किसी भी प्रकार की अनियमितता पाता है, तो यह चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर एक बड़ा सवालिया निशान होगा और इसका सीधा असर आगामी चुनावी नतीजों पर पड़ सकता है।

भ्रष्टाचार का मामला: चैतन्य बघेल की याचिका पर टिकी राजनीतिक नजरें

राजनीतिक गलियारों में आज छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के बेटे चैतन्य बघेल से जुड़ी याचिका पर भी गहन चर्चा है। सुप्रीम कोर्ट आज चैतन्य बघेल की उस अर्जी पर सुनवाई करेगा, जिसमें उन्होंने एक कथित भ्रष्टाचार मामले में राहत की मांग की है। यह मामला राज्य की पिछली सरकार के दौरान हुए कुछ वित्तीय लेनदेन और प्रशासनिक निर्णयों से जुड़ा हुआ बताया जा रहा है।

चैतन्य बघेल की ओर से दलील दी गई है कि उनके खिलाफ की जा रही कार्रवाई राजनीतिक विद्वेष से प्रेरित है और कानूनी प्रक्रियाओं का उल्लंघन किया गया है। दूसरी ओर, जांच एजेंसियां सबूतों के आधार पर अपनी कार्रवाई को जायज ठहरा रही हैं। इस सुनवाई के नतीजे न केवल एक व्यक्ति के भविष्य को तय करेंगे, बल्कि छत्तीसगढ़ की वर्तमान राजनीति में भी एक बड़ी हलचल पैदा कर सकते हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि कोर्ट उन्हें अंतरिम राहत देता है या जांच को जारी रखने का आदेश देता है।

न्यायिक व्यवस्था में महिलाओं की हिस्सेदारी: बार काउंसिल आरक्षण पर बहस

सुप्रीम कोर्ट आज एक ऐसी याचिका पर भी विचार करेगा जो कानूनी पेशे में ऐतिहासिक बदलाव ला सकती है। मामला राज्य बार काउंसिल की कार्यकारिणी समितियों में महिला वकीलों के लिए आरक्षण सुनिश्चित करने का है। वर्तमान में, विभिन्न राज्यों की बार काउंसिलों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व उनकी बढ़ती संख्या के अनुपात में काफी कम है।

महिला वकीलों के समूहों ने तर्क दिया है कि नीति-निर्माण और वकीलों के कल्याण से जुड़ी समितियों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना समय की मांग है। यह याचिका न्यायिक ढांचे के भीतर ‘ग्लास सीलिंग’ को तोड़ने की एक कोशिश के रूप में देखी जा रही है। यदि कोर्ट इस दिशा में सकारात्मक निर्देश जारी करता है, तो यह देश भर की अदालतों में महिला वकीलों के लिए नेतृत्व के नए रास्ते खोलेगा और कानूनी समुदाय में लैंगिक समानता की नींव मजबूत करेगा।

जेल सुधार और मानवाधिकार: 1382 जेलों की अमानवीय स्थिति पर स्वतः संज्ञान

संविधान के संरक्षक के रूप में, सुप्रीम कोर्ट आज देश भर की 1382 जेलों में कैदियों की स्थिति पर एक बेहद संवेदनशील स्वतः संज्ञान (Suo Motu) मामले की सुनवाई करेगा। कोर्ट ने पहले ही इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की थी कि जेलों में कैदी क्षमता से अधिक भरे हुए हैं और वहां बुनियादी सुविधाएं जैसे स्वच्छ पानी, चिकित्सा सहायता और रहने की जगह का भारी अभाव है।

इस सुनवाई में ‘कैदियों के मानवाधिकारों’ पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। अक्सर जेलों को सजा के घर के बजाय सुधार गृह माना जाता है, लेकिन अमानवीय स्थितियों के कारण वे शोषण का केंद्र बन जाती हैं। कोर्ट आज एमिकस क्यूरी (न्यायालय मित्र) की रिपोर्ट पर गौर कर सकता है और केंद्र व राज्य सरकारों को जेलों के आधुनिकीकरण और कैदियों की गरिमा बनाए रखने के लिए सख्त दिशानिर्देश दे सकता है। यह मामला सीधे तौर पर अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) से जुड़ा है, जो कैदियों को भी उपलब्ध है।

निष्कर्ष: न्यायिक पारदर्शिता और जवाबदेही का दिन

सुप्रीम कोर्ट में आज होने वाली ये सुनवाइयां यह दर्शाती हैं कि देश की सर्वोच्च न्यायपीठ किस तरह लोकतंत्र के हर स्तंभ—चाहे वह चुनाव हो, राजनीति हो, पेशेवर संगठन हो या फिर जेल जैसा बंद संस्थान—में सुधार के लिए तत्पर है। इन चारों मामलों के तार कहीं न कहीं भारतीय समाज के भविष्य और न्याय की अवधारणा से जुड़े हुए हैं। शाम तक इन मामलों में आने वाले आदेश या टिप्पणियां यह तय करेंगी कि देश में आने वाले समय में प्रशासनिक और कानूनी सुधारों की गति क्या होगी।

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