• January 20, 2026

वैचारिक मतभेद के बीच कूटनीतिक पहल: भाजपा मुख्यालय पहुंचे चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के प्रतिनिधि, अंतर-दलीय संवाद पर दिया जोर

नई दिल्ली: भारत और चीन के बीच बीते कुछ वर्षों से जारी सीमा विवाद और कूटनीतिक तनाव के बीच एक ऐतिहासिक राजनीतिक हलचल देखने को मिली है। चीन की सत्ताधारी ‘कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना’ (सीपीसी) के एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल ने सोमवार को नई दिल्ली स्थित भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के केंद्रीय मुख्यालय का दौरा किया। यह दौरा कई मायनों में असाधारण माना जा रहा है, क्योंकि भाजपा और सीपीसी न केवल दो अलग-अलग राजनीतिक प्रणालियों का प्रतिनिधित्व करती हैं, बल्कि वैचारिक स्तर पर भी एक-दूसरे की कट्टर विरोधी रही हैं। इस बैठक को दोनों देशों के बीच संबंधों को सामान्य करने की दिशा में ‘ट्रैक-2’ कूटनीति और राजनीतिक स्तर पर संवाद बहाली के एक बड़े प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।

नई दिल्ली में हाई-प्रोफाइल बैठक और नेतृत्व की भूमिका

चीनी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कम्युनिस्ट पार्टी के अंतरराष्ट्रीय विभाग की उप-मंत्री सुन हैयान ने किया। उनके साथ भारत में चीन के राजदूत जू फीहोंग भी मौजूद थे, जो इस बैठक की गंभीरता और कूटनीतिक महत्व को दर्शाता है। भाजपा की ओर से इस संवाद का नेतृत्व पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद अरुण सिंह ने किया। भाजपा ने इस मुलाकात की आधिकारिक जानकारी सोशल मीडिया के माध्यम से साझा की, जिसमें दोनों दलों के बीच हुई औपचारिक बातचीत और शिष्टाचार भेंट की तस्वीरें दिखाई गईं। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि सत्ताधारी दलों के बीच इस तरह का सीधा संवाद अक्सर सरकारी स्तर पर होने वाली वार्ताओं के लिए जमीन तैयार करने का काम करता है।

अंतर-दलीय संचार बढ़ाने पर विस्तृत चर्चा

भाजपा के विदेश मामलों के प्रभारी विजय चौथाईवाले ने इस बैठक के मुख्य एजेंडे के बारे में जानकारी साझा करते हुए बताया कि दोनों दलों के बीच ‘अंतर-दलीय संचार’ (Inter-party communication) को आगे बढ़ाने के विभिन्न साधनों पर गहन चर्चा हुई। बैठक के दौरान इस बात पर गौर किया गया कि कैसे दोनों देशों की सत्ताधारी पार्टियां एक-दूसरे के सांगठनिक ढांचे और कार्यप्रणाली को समझ सकती हैं और किन क्षेत्रों में संवाद के रास्ते खुले रखे जा सकते हैं। इस चर्चा का एक प्रमुख हिस्सा यह भी था कि कैसे राजनीतिक दलों के बीच नियमित संपर्क, सीमा विवाद जैसे कठिन मुद्दों के बावजूद दोनों देशों के बीच गलतफहमियों को कम करने में मददगार साबित हो सकता है।

गलवान संघर्ष के बाद का परिदृश्य और संबंधों में सुधार

भारत और चीन के संबंधों में सबसे बड़ा मोड़ साल 2020 में गलवान घाटी में हुई सैन्य झड़प के बाद आया था। इस घटना ने दशकों से चले आ रहे आपसी विश्वास को हिलाकर रख दिया था और दोनों देशों के बीच संबंधों में जबरदस्त तल्खी आ गई थी। सीमा पर तनाव और सैन्य जमावड़े के कारण व्यापार और राजनीतिक संवाद लगभग ठप हो गया था। हालांकि, अक्टूबर 2024 में एक बड़ी सफलता तब मिली जब दोनों देश एलएसी (LAC) पर तैनात सैनिकों को पीछे हटाने और गश्त करने के पुराने अधिकारों को बहाल करने पर सहमत हुए। सीमा पर इस ‘डिसएंगेजमेंट’ के बाद से ही दोनों देशों के बीच उच्चस्तरीय मुलाकातों का दौर फिर से शुरू हुआ है, और भाजपा मुख्यालय में चीनी प्रतिनिधिमंडल का आना इसी सिलसिले की एक अहम कड़ी माना जा रहा है।

वैचारिक विरोध और व्यावहारिक राजनीति का संतुलन

पारंपरिक तौर पर देखा जाए तो भाजपा की विचारधारा राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक मूल्यों पर आधारित है, जबकि सीपीसी मार्क्सवादी-लेनिनवादी और माओवादी सिद्धांतों का पालन करती है। अतीत में भाजपा ने अक्सर चीन की विस्तारवादी नीतियों और वैचारिक विस्तार की आलोचना की है। वहीं, सीपीसी का रुख भी भारत के प्रति अक्सर नकारात्मक रहा है। लेकिन वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में, जहां आर्थिक हित और क्षेत्रीय स्थिरता सर्वोपरि है, दोनों दल अपने वैचारिक मतभेदों को दरकिनार कर व्यावहारिक राजनीति (Realpolitik) की ओर बढ़ते दिख रहे हैं। सत्ताधारी दलों के बीच संबंध बेहतर होने का सीधा मतलब यह है कि नीतिगत स्तर पर फैसलों को लागू करना आसान हो सकता है, क्योंकि दोनों ही दल अपने-अपने देशों की सत्ता पर मजबूत पकड़ रखते हैं।

संबंधों में बेहतरी की नई पहल के संकेत

इस बैठक को केवल एक औपचारिक मुलाकात के रूप में देखना भूल होगी। यह दौरा संकेत देता है कि चीन अब भारत के साथ राजनीतिक स्तर पर भी जुड़ाव बढ़ाने का इच्छुक है। भारत के लिए भी यह जरूरी है कि वह चीन के साथ केवल सैन्य स्तर पर ही नहीं, बल्कि राजनीतिक और कूटनीतिक स्तर पर भी संवाद की खिड़की खुली रखे। यदि दोनों देशों के सत्ताधारी दलों के बीच आपसी समझ विकसित होती है, तो इसका सकारात्मक असर भविष्य में होने वाली द्विपक्षीय वार्ताओं और आर्थिक समझौतों पर भी पड़ सकता है। हालांकि, भारतीय पक्ष ने हमेशा यह स्पष्ट किया है कि संबंधों की सामान्य स्थिति सीमा पर शांति और स्थिरता पर निर्भर करती है।

निष्कर्ष और भविष्य की राह

भाजपा मुख्यालय में हुई यह बैठक इस बात का प्रमाण है कि कूटनीति में स्थायी शत्रु या मित्र नहीं होते, बल्कि राष्ट्रीय हित सर्वोपरि होते हैं। सीमा पर सैनिकों के पीछे हटने के बाद अब राजनीतिक संवाद का शुरू होना एक शुभ संकेत है, लेकिन यह देखना अभी बाकी है कि सीपीसी का यह बदला हुआ रुख धरातल पर कितना स्थायी रहता है। भारत के लिए यह एक संतुलित रास्ता है—जहाँ एक ओर वह अपनी सीमाओं की रक्षा के प्रति अडिग है, वहीं दूसरी ओर वह क्षेत्रीय शांति के लिए संवाद के किसी भी अवसर को गंवाना नहीं चाहता।

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