• February 1, 2026

राष्ट्रमंडल संसदीय सम्मेलन 2026: प्रधानमंत्री मोदी करेंगे CSPOC का उद्घाटन, दिल्ली में जुटेगा 42 देशों के स्पीकर्स का महाकुंभ

नई दिल्ली: भारत की राजधानी आज एक बार फिर वैश्विक लोकतंत्र की धुरी बनने जा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज नई दिल्ली में 28वीं ‘कॉन्फ्रेंस ऑफ स्पीकर्स एंड प्रेसिडिंग ऑफिसर्स ऑफ द कॉमनवेल्थ’ (CSPOC) का भव्य उद्घाटन करेंगे। यह सम्मेलन ऐसे समय में हो रहा है जब दुनिया भर में लोकतांत्रिक संस्थाओं के स्वरूप और उनकी कार्यप्रणाली में बदलाव की मांग उठ रही है। इस प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन की अध्यक्षता लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला करेंगे। भारत की संसद की मेजबानी में आयोजित यह कार्यक्रम राष्ट्रमंडल देशों के बीच विधायी सहयोग और लोकतांत्रिक मूल्यों को साझा करने का एक बड़ा मंच साबित होगा।

इस सम्मेलन का आयोजन भारत के बढ़ते वैश्विक कद और विधायी प्रक्रियाओं में उसके द्वारा अपनाए जा रहे आधुनिक दृष्टिकोण को प्रदर्शित करने का एक सुनहरा अवसर है। प्रधानमंत्री का उद्घाटन भाषण इस सम्मेलन की दिशा तय करेगा, जिसमें वे संभवतः भारतीय लोकतंत्र की जड़ों और भविष्य की चुनौतियों पर अपना दृष्टिकोण साझा करेंगे।

वैश्विक लोकतंत्र का समागम: 42 देशों के प्रतिनिधियों की भागीदारी

दिल्ली के इस सम्मेलन में राष्ट्रमंडल देशों का भारी जमावड़ा देखने को मिल रहा है। आधिकारिक जानकारी के अनुसार, इसमें 42 कॉमनवेल्थ देशों के 61 स्पीकर्स और प्रेसिडिंग ऑफिसर्स (पीठासीन अधिकारी) शामिल हो रहे हैं। इसके अतिरिक्त, चार अर्ध-स्वायत्त संसदों के प्रतिनिधि भी इस चर्चा का हिस्सा बनेंगे। राष्ट्रमंडल देशों का यह समूह न केवल सांस्कृतिक रूप से विविध है, बल्कि इसमें शासन की विभिन्न प्रणालियां भी शामिल हैं।

इतनी बड़ी संख्या में वैश्विक विधायी प्रमुखों का एक साथ आना इस बात का प्रतीक है कि वैश्विक स्तर पर संसद की गरिमा और उसकी भूमिका को लेकर एक नई चेतना जागृत हो रही है। इस सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य संसदीय कूटनीति को बढ़ावा देना और उन सर्वोत्तम प्रथाओं को साझा करना है जिन्हें अलग-अलग देशों ने अपने लोकतंत्र को जीवंत बनाए रखने के लिए अपनाया है।

संसदीय मजबूती और पीठासीन अधिकारियों की बदलती भूमिका

सम्मेलन के दौरान होने वाली चर्चाओं का केंद्र बिंदु ‘संसद की मजबूती’ और ‘लोकतांत्रिक संस्थाओं का संरक्षण’ होगा। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में स्पीकर्स और प्रेसिडिंग ऑफिसर्स की भूमिका केवल सदन के संचालन तक सीमित नहीं रह गई है। वे अब संविधान के रक्षक और जनता व सरकार के बीच एक सेतु की तरह कार्य कर रहे हैं।

इस सत्र में विस्तार से चर्चा की जाएगी कि कैसे पीठासीन अधिकारी अपनी तटस्थता बनाए रखते हुए विधायी कार्यों की गुणवत्ता में सुधार कर सकते हैं। संसदीय मर्यादाओं का पालन सुनिश्चित करने और सदस्यों के बीच संवाद के स्तर को ऊंचा उठाने के उपायों पर भी विभिन्न देशों के स्पीकर्स अपने अनुभव साझा करेंगे। यह चर्चा इस बात पर भी केंद्रित होगी कि कैसे विधायी संस्थाओं को अधिक समावेशी और उत्तरदायी बनाया जाए।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और संसदीय संचालन: संभावनाओं का नया द्वार

इस सम्मेलन का सबसे आधुनिक और महत्वपूर्ण विषय कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence) का संसदीय संचालन में उपयोग है। तकनीक जिस गति से बदल रही है, संसदों को भी उसे अपनाना होगा। चर्चा का विषय रहेगा कि कैसे एआई (AI) विधायी ड्राफ्टिंग, शोध, और डेटा विश्लेषण में मदद कर सकती है।

तकनीक के उपयोग से न केवल संसद की कार्यकुशलता बढ़ेगी, बल्कि सदस्यों को बेहतर और सटीक जानकारी तक पहुंच मिलेगी। हालांकि, इसके साथ ही एआई के नैतिक उपयोग और इसकी सीमाओं पर भी गंभीर मंथन होगा। राष्ट्रमंडल देशों के प्रतिनिधि इस बात पर विचार करेंगे कि तकनीक का लाभ उठाते हुए संसदीय प्रक्रियाओं की गोपनीयता और गरिमा को कैसे सुरक्षित रखा जाए।

सोशल मीडिया का प्रभाव और सांसदों के समक्ष चुनौतियां

आज के दौर में सोशल मीडिया एक ऐसा उपकरण बन गया है जो जनमत को पल भर में प्रभावित कर सकता है। सम्मेलन के एक विशेष सत्र में सोशल मीडिया के सांसदों और उनकी छवि पर पड़ने वाले प्रभाव पर चर्चा होगी। जहाँ एक तरफ सोशल मीडिया जनता से सीधे जुड़ने का अवसर देता है, वहीं दूसरी तरफ यह फेक न्यूज और दुष्प्रचार का जरिया भी बन सकता है।

प्रेसिडिंग ऑफिसर्स इस बात पर चर्चा करेंगे कि कैसे सोशल मीडिया के दबाव के बीच सांसद अपने विधायी कर्तव्यों का निर्वहन निष्पक्षता से कर सकते हैं। क्या सोशल मीडिया के लिए किसी विशेष आचार संहिता की आवश्यकता है? या सदस्यों को डिजिटल साक्षरता के प्रति और अधिक जागरूक किया जाना चाहिए? इन प्रश्नों के उत्तर इस सम्मेलन के निष्कर्षों से मिलने की उम्मीद है।

नागरिक भागीदारी और मतदान से इतर जन-सहभागिता

लोकतंत्र का अर्थ केवल पांच साल में एक बार मतदान करना नहीं है। CSPOC सम्मेलन का एक प्रमुख एजेंडा ‘नागरिक भागीदारी’ को बढ़ाना है। प्रतिनिधि इस बात पर मंथन करेंगे कि चुनाव के अलावा सामान्य दिनों में भी नागरिक कैसे विधायी प्रक्रियाओं का हिस्सा बन सकते हैं।

इसमें ‘पब्लिक पिटीशन’ (जन याचिकाएं), संसदीय समितियों में जनता की राय, और डिजिटल माध्यमों से कानून बनाने की प्रक्रिया में आम आदमी के सुझावों को शामिल करने जैसे आधुनिक तरीकों पर विचार किया जाएगा। इसके साथ ही, युवाओं और स्कूली बच्चों में संसद की कार्यप्रणाली के प्रति समझ विकसित करने के लिए नई रणनीतियों पर भी काम होगा। प्रधानमंत्री मोदी अक्सर ‘सहभागितापूर्ण लोकतंत्र’ की बात करते हैं, और यह सम्मेलन उस विचार को वैश्विक धरातल पर ले जाने का कार्य करेगा।

निष्कर्ष: वैश्विक संसदीय सहयोग का नया अध्याय

28वीं CSPOC कॉन्फ्रेंस भारत के लिए अपनी लोकतांत्रिक परंपराओं को वैश्विक मंच पर प्रस्तुत करने का एक बड़ा अवसर है। ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की भावना के साथ आयोजित यह सम्मेलन न केवल राष्ट्रमंडल देशों के बीच संबंधों को मजबूत करेगा, बल्कि भविष्य के लोकतंत्र के लिए एक नया ‘रोडमैप’ भी तैयार करेगा।

प्रधानमंत्री द्वारा उद्घाटन और ओम बिड़ला की अध्यक्षता में होने वाली यह बैठक वैश्विक राजनीति में विधायी सर्वोच्चता को पुन: स्थापित करने की दिशा में एक मिल का पत्थर साबित होगी। सम्मेलन के अंत में जारी होने वाले निष्कर्ष और सिफारिशें दुनिया भर की संसदों के लिए मार्गदर्शक का कार्य करेंगी।

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