• January 31, 2026

यूजीसी नियमों पर सुप्रीम कोर्ट की रोक के बाद गरमाई सियासत: विपक्ष ने भाजपा को घेरा, सत्तापक्ष ने जताया कोर्ट और पीएम मोदी पर भरोसा

नई दिल्ली: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नए इक्विटी नियमों पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा लगाई गई अंतरिम रोक ने देश की राजनीति में एक नया उबाल ला दिया है। ‘यूजीसी (उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने) विनियम, 2026’ के क्रियान्वयन पर शीर्ष अदालत के स्टे के बाद अब कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और समाजवादी पार्टी सहित पूरे विपक्ष ने एकजुट होकर केंद्र की भाजपा सरकार पर तीखा हमला बोला है। विपक्षी दलों का आरोप है कि सरकार जानबूझकर समाज को जाति और वर्ग के आधार पर बांटने की कोशिश कर रही है। दूसरी ओर, भाजपा और उसके सहयोगी दलों ने कोर्ट के फैसले का स्वागत करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व पर अटूट विश्वास जताया है।

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को विभिन्न रिट याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया कि अगले आदेश तक वर्ष 2012 के पुराने नियम ही प्रभावी रहेंगे। न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 19 मार्च की तारीख तय की है। इस कानूनी हस्तक्षेप के तुरंत बाद विपक्षी खेमे ने सरकार की मंशा पर सवाल उठाने शुरू कर दिए। कांग्रेस की राज्यसभा सांसद रंजीत रंजन ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह सुनिश्चित करना अनिवार्य है कि किसी भी छात्र के साथ उसकी जाति के आधार पर भेदभाव न हो। उन्होंने इस मुद्दे को अत्यंत संवेदनशील बताते हुए संसद और सार्वजनिक पटल पर इस पर पुन: चर्चा की आवश्यकता पर जोर दिया।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सांसद प्रमोद तिवारी ने सरकार पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा कि भारतीय जनता पार्टी की सरकार अपने मूलभूत सिद्धांतों को भूल चुकी है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार का प्राथमिक दायित्व अशांति को दूर कर शांति स्थापित करना होता है, लेकिन वर्तमान सत्तापक्ष वर्ग, जाति और धर्म के नाम पर देश में सामाजिक विद्वेष की आग लगा रहा है। तिवारी के अनुसार, यह सब केवल वास्तविक मुद्दों, जैसे बेरोजगारी और महंगाई से जनता का ध्यान भटकाने के लिए किया जा रहा है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि न्यायपालिका ने समय रहते इस असंवैधानिक कदम पर रोक लगाकर देश के सामाजिक ताने-बाने को बचाया है।

पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी टीएमसी ने भी इस मुद्दे पर कड़ा रुख अख्तियार किया है। टीएमसी सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बनर्जी ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर हर्ष व्यक्त करते हुए कहा कि यूजीसी की नई गाइडलाइंस पूरी तरह से असंवैधानिक थीं। उन्होंने तर्क दिया कि नियमों में जिस तरह की अस्पष्टता थी, वह सीधे तौर पर मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती थी, इसलिए अदालत ने स्टे लगाकर बिल्कुल सही कदम उठाया है। विपक्ष का मानना है कि ये नियम समानता लाने के बजाय समुदायों के बीच एक नई खाई खोदने का काम कर रहे थे।

उत्तर प्रदेश की राजनीति के केंद्र और समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने नोएडा में मीडिया से बातचीत के दौरान संतुलित लेकिन स्पष्ट रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि हम सभी इस बात पर सहमत हैं कि जो लोग दोषी हैं, उन्हें किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाना चाहिए, लेकिन इसके साथ ही यह भी सुनिश्चित होना चाहिए कि किसी भी निर्दोष व्यक्ति के साथ अन्याय न हो। अखिलेश यादव ने सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही का हवाला देते हुए कहा कि अभी इस मामले के कई कानूनी और सामाजिक पहलुओं पर बहस चल रही है और जल्द ही कई नए तथ्य देश के सामने आएंगे।

क्षेत्रीय दलों में राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (RLP) के सांसद हनुमान बेनीवाल ने भी अपनी राय बेबाकी से रखी। उन्होंने कहा कि जब यूजीसी ने ये नियम तैयार किए थे, तब निश्चित रूप से सरकार को इसकी पूरी जानकारी थी। बेनीवाल ने मांग की कि सरकार को अब सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष पूरी पारदर्शिता के साथ रखना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे किसी भी वर्ग या ‘जनरल कैटेगरी’ के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन साथ ही उन्होंने यह भी जोड़ा कि जो छात्र अनुसूचित जाति, जनजाति या ओबीसी वर्ग के छात्रों का अपमान करते हैं या रैगिंग में शामिल होते हैं, उन्हें कड़ी सजा मिलनी चाहिए। उन्होंने इस अवसर पर जातिगत जनगणना के बाद ओबीसी आरक्षण को बढ़ाने की अपनी पुरानी मांग को भी दोहराया।

विपक्ष के इन हमलों के बीच केंद्र सरकार के मंत्रियों और भाजपा नेताओं ने मोर्चा संभाल लिया है। केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का स्वागत करते हुए इसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के विजन की सराहना की। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी ने अपने कार्यकाल में कभी किसी के साथ भेदभाव नहीं किया और उनके नेतृत्व में ही सवर्ण वर्ग के गरीबों के लिए ईडब्ल्यूएस (EWS) आरक्षण की व्यवस्था की गई। सिंह ने विश्वास जताया कि अदालत के इस हस्तक्षेप से शैक्षणिक संस्थानों में और अधिक स्पष्टता आएगी।

उत्तर प्रदेश सरकार के कैबिनेट मंत्रियों ने भी इस मुद्दे पर सरकार का बचाव किया। निषाद पार्टी के प्रमुख और मंत्री संजय निषाद ने कहा कि केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि किसी भी छात्र के साथ कोई भेदभाव नहीं होगा। उन्होंने कोर्ट के आदेश का स्वागत करते हुए कहा कि सरकार पूरी तरह आश्वस्त है कि अंतिम निर्णय न्यायसंगत होगा। वहीं, सुभासपा अध्यक्ष और मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का आदेश सर्वोपरि है और उस पर कोई उंगली नहीं उठा सकता। राजभर ने तर्क दिया कि केंद्र और राज्य सरकारें पूरी तरह से संविधान का पालन कर रही हैं और कोर्ट में सभी को अपनी राय रखने का लोकतांत्रिक अधिकार है।

राजस्थान से भाजपा विधायक बालमुकुंद आचार्य ने प्रधानमंत्री मोदी के ‘सबका साथ, सबका विकास’ के नारे को दोहराते हुए कहा कि एनडीए सरकार के सत्ता में आने के बाद से देश में समग्र विकास हुआ है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री ने समाज के हर वर्ग का विश्वास जीता है और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों पर अनावश्यक टिप्पणी करने के बजाय हमें न्यायपालिका और सरकार की मंशा पर भरोसा रखना चाहिए।

अब सभी की नजरें 19 मार्च को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मुद्दा केवल एक प्रशासनिक फेरबदल नहीं है, बल्कि आगामी चुनावों में एक बड़ा चुनावी हथियार बन सकता है। एक ओर जहां विपक्ष इसे भाजपा की ‘विभाजनकारी राजनीति’ के रूप में पेश कर रहा है, वहीं भाजपा इसे ‘संवैधानिक प्रक्रिया और सुधार’ का हिस्सा बता रही है। आने वाले दिनों में केंद्र सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट में पेश किया जाने वाला हलफनामा यह तय करेगा कि यूजीसी के इन विवादित नियमों का भविष्य क्या होगा।

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