भारत–यूरोपीय यूनियन की शीर्ष बैठक 27 जनवरी को: व्यापार, टैरिफ और चीन-अमेरिका निर्भरता से मुक्ति पर होगी अहम चर्चा
भारत और यूरोपीय यूनियन (EU) के बीच व्यापारिक और रणनीतिक साझेदारी को नई दिशा देने वाली एक बेहद अहम उच्चस्तरीय बैठक 27 जनवरी को नई दिल्ली में आयोजित होने जा रही है। इस बैठक को भारत की वैश्विक आर्थिक रणनीति के लिहाज से मील का पत्थर माना जा रहा है। माना जा रहा है कि इस बैठक में भारत और यूरोपीय यूनियन के बीच व्यापार को नई ऊंचाइयों पर ले जाने, अमेरिका और चीन पर निर्भरता कम करने और दीर्घकालिक आर्थिक सहयोग को मजबूत करने पर व्यापक चर्चा होगी।
प्रधानमंत्री मोदी और यूरोपीय नेतृत्व होंगे शामिल
इस शीर्ष बैठक में भारत की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हिस्सा लेंगे। वहीं यूरोपीय यूनियन की ओर से यूरोपीय काउंसिल के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा और यूरोपियन कमीशन की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर येलेन बैठक में भाग लेंगी। खास बात यह है कि ये दोनों नेता भारत के गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में भी शामिल होंगे।
यूरोपियन कमीशन की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर येलेन पहले ही भारत–यूरोपीय यूनियन व्यापार समझौते को “मदर ऑफ ऑल डील्स” करार दे चुकी हैं। इससे संकेत मिलते हैं कि दोनों पक्ष इस साझेदारी को केवल व्यापार तक सीमित नहीं रखना चाहते, बल्कि इसे रणनीतिक और तकनीकी सहयोग तक विस्तार देना चाहते हैं।
हालांकि उर्सुला वॉन डेर येलेन ने यह भी स्पष्ट किया है कि इस एक बैठक में सभी मुद्दों पर अंतिम समझौता हो जाना संभव नहीं है, लेकिन यह बैठक एक मजबूत और संतुलित डील की दिशा में निर्णायक कदम साबित हो सकती है।
अमेरिकी टैरिफ और चीन की रणनीति से सबक
बीते वर्षों में भारत को अमेरिका और चीन दोनों के साथ व्यापारिक मोर्चे पर कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। अमेरिका द्वारा लगाए गए टैरिफ के बावजूद भारत ने 2025-26 में दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में अपनी जगह बनाए रखी। हालांकि आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिकी टैरिफ बाधा न बने होते तो भारत की आर्थिक वृद्धि और अधिक मजबूत हो सकती थी।
दूसरी ओर, चीन ने ‘रेयर अर्थ मेटल’ की आपूर्ति पर नियंत्रण रखकर न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया को यह एहसास कराया कि रणनीतिक उत्पादों के लिए एक देश पर अत्यधिक निर्भरता कितनी खतरनाक हो सकती है। चीन की इस नीति ने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को झटका दिया और भारत के लिए वैकल्पिक साझेदारों की तलाश को अनिवार्य बना दिया।
यूरोपीय यूनियन: दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति
यूरोपीय यूनियन में कुल 27 देश शामिल हैं और वर्ष 2026 तक इसकी संयुक्त जीडीपी लगभग 22.52 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। जर्मनी, फ्रांस, इटली और स्पेन जैसे देश इस जीडीपी में लगभग 60 प्रतिशत का योगदान करते हैं।
अमेरिका के बाद यूरोपीय यूनियन को दुनिया की दूसरी सबसे मजबूत आर्थिक शक्ति माना जाता है। भारत के इन सभी देशों के साथ पहले से ही अच्छे द्विपक्षीय व्यापारिक संबंध हैं, लेकिन एक व्यापक भारत–EU समझौता इन संबंधों को संस्थागत और दीर्घकालिक रूप दे सकता है।
जहां अमेरिका के साथ भारत का व्यापार समझौता अभी भी अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा है, वहीं यूरोपीय यूनियन ने भारत के साथ आगे बढ़ने को लेकर सकारात्मक रुख दिखाया है।
भारत को क्या लाभ मिल सकता है?
वर्ष 2024-25 में भारत और यूरोपीय यूनियन के बीच लगभग 11.8 लाख करोड़ रुपये का द्विपक्षीय व्यापार हुआ था। यह व्यापार संतुलित रहा, लेकिन थोड़ा भारत के पक्ष में झुका हुआ था। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत टैक्स-फ्री या कम-टैरिफ व्यापार के लिए यूरोपीय यूनियन की सहमति हासिल कर लेता है, तो यह व्यापार 136 अरब डॉलर से बढ़कर 200 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है।
यूरोपीय यूनियन विश्व स्तर पर तैयार वस्तुओं (मैन्युफैक्चर्ड गुड्स) और सेवाओं का सबसे बड़ा निर्यातक है। भारत को EU से उन्नत मशीनरी, वाहन, सौर ऊर्जा उपकरण, लिथियम-आयन बैटरियों की तकनीक, हाई-कैपेसिटी इंजन और अन्य औद्योगिक कलपुर्जों के सस्ते और कर-मुक्त आयात की उम्मीद है।
रक्षा, विमानन और रेल क्षेत्र में सहयोग की संभावना
भारत लड़ाकू और यात्री विमानों के निर्माण में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। इस क्षेत्र में फ्रांस भारत का प्रमुख साझेदार बन सकता है। पहले से ही राफेल लड़ाकू विमान सौदे के बाद दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग मजबूत हुआ है।
वहीं जर्मनी अत्याधुनिक वाहन इंजन, रेल इंजन और यात्री डिब्बों के निर्माण में वैश्विक स्तर पर अग्रणी है। यदि भारत और यूरोपीय यूनियन के बीच तकनीकी सहयोग बढ़ता है, तो इससे ‘मेक इन इंडिया’ को बड़ा बल मिल सकता है।
भारतीय निर्यात को मिलेगा नया बाजार
यूरोपीय देश भारत के लिए एक बड़ा निर्यात बाजार साबित हो सकते हैं। भारत पहले से ही यूरोपीय यूनियन को कृषि उत्पाद, फल-सब्जियां, अनाज, प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ, पेट्रोलियम उत्पाद, वस्त्र, आभूषण और दवाइयां निर्यात करता है।
यदि यूरोपीय यूनियन भारतीय उत्पादों पर टैक्स कम करने को राजी हो जाती है, तो भारतीय सामान यूरोप में सस्ते और अधिक प्रतिस्पर्धी हो जाएंगे। इससे न केवल भारत के निर्यात में वृद्धि होगी, बल्कि किसानों, लघु उद्योगों और रोजगार क्षेत्र को भी सीधा लाभ मिलेगा।
वीजा और रोजगार: अमेरिका की सख्ती, यूरोप से उम्मीद
आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ डॉ. नागेंद्र कुमार शर्मा के अनुसार, अमेरिका ने टैरिफ वॉर के साथ-साथ वीजा और ग्रीन कार्ड नियमों को सख्त कर भारतीय कामगारों के लिए बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। इससे अमेरिका में नौकरी करने की चाह रखने वाले भारतीयों को नुकसान हुआ है।
इसके विपरीत, यदि यूरोपीय यूनियन भारतीय पेशेवरों के लिए वीजा प्रक्रिया को सरल बनाती है और अपने देशों में काम करने को प्रोत्साहित करती है, तो यह भारत के लिए बड़ी राहत साबित हो सकती है। खासतौर पर आईटी, हेल्थकेयर और सर्विस सेक्टर में भारतीयों की मांग पहले से ही काफी है।
चीन पर निर्भरता घटाने का मौका
भारत फिलहाल सौर ऊर्जा उपकरणों, दवा उद्योग के कच्चे माल और कई अहम तकनीकी उत्पादों के लिए चीन पर अत्यधिक निर्भर है। चीन की निर्यात नीति में जरा-सा बदलाव भारत के लिए गंभीर संकट खड़ा कर सकता है।
यूरोपीय यूनियन के देश इन क्षेत्रों में मजबूत उत्पादन क्षमता रखते हैं। यदि भारत को EU से तकनीकी सहयोग और निवेश मिलता है, तो इससे चीन पर निर्भरता कम करने और आत्मनिर्भरता बढ़ाने में मदद मिलेगी।
अमेरिका पर भी बनेगा दबाव
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत और यूरोपीय यूनियन के बीच एक मजबूत व्यापार समझौता होता है, तो इससे अमेरिका पर भी दबाव बढ़ेगा। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा लगाए गए टैरिफ और भारत–रूस तेल व्यापार पर पड़े प्रभाव से दोनों देशों को नुकसान हुआ है।
भारत–EU डील अमेरिका को अपने टैरिफ रुख पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर सकती है।
भारत की आर्थिक प्रगति पर भाजपा का भरोसा
भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने कहा कि आईएमएफ, संयुक्त राष्ट्र और अन्य वैश्विक एजेंसियों ने 2026 में भारत की मजबूत आर्थिक प्रगति का अनुमान जताया है। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार आगामी बजट में भी ऐसे प्रावधान करेगी जिससे मध्य वर्ग, किसान, श्रमिक और व्यापारियों को मजबूती मिले।
उनके अनुसार, टैक्स सुधार, सस्ता कर्ज और संरचनात्मक सुधारों के जरिए भारत आने वाले वर्षों में वैश्विक आर्थिक शक्ति के रूप में और मजबूत होकर उभरेगा।