• January 19, 2026

बीएमसी चुनाव: दुनिया के सबसे अमीर नगर निगम के लिए मतदान आज, जानें इतिहास, बजट और राजनीतिक समीकरणों की पूरी कहानी

भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई के भविष्य का फैसला करने के लिए आज यानी 15 जनवरी को मतदान हो रहा है। बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) के ये चुनाव करीब चार साल की लंबी प्रतीक्षा के बाद आयोजित किए जा रहे हैं। इसे केवल एक स्थानीय निकाय का चुनाव कहना कम होगा, क्योंकि बीएमसी के चुनाव अपनी भव्यता, बजट और राजनीतिक प्रभाव के कारण किसी विधानसभा या संसदीय चुनाव से कम नहीं माने जाते। इस बार का चुनाव विशेष रूप से चर्चा में है क्योंकि यह महाराष्ट्र की बदली हुई राजनीतिक तस्वीर के बीच हो रहा है, जहां प्रमुख दल अब दो फाड़ होकर एक-दूसरे के सामने खड़े हैं।

बीएमसी का गौरवशाली इतिहास और इसकी वैश्विक महत्ता

बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) न केवल भारत का, बल्कि दुनिया के सबसे पुराने और शक्तिशाली नगर निकायों में से एक है। इसकी स्थापना के इतिहास को लेकर अलग-अलग मत हैं; कुछ रिकॉर्ड्स के अनुसार इसकी शुरुआत 1865 में ब्रिटिश शासन के दौरान हुई थी, जबकि आधिकारिक तौर पर इसे 1873 या 1888 के अधिनियमों से मजबूती मिली। आज बीएमसी 24 प्रशासनिक वार्डों में फैली मुंबई की विशाल आबादी की देखभाल करती है। यह दुनिया का सबसे अमीर नगर निगम है, जिसका वार्षिक बजट भारत के कई छोटे राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के कुल बजट से भी अधिक होता है। इसकी महत्ता इसी बात से समझी जा सकती है कि मुंबई में रहने वाले आम नागरिक से लेकर बॉलीवुड के सितारों और बड़े उद्योगपतियों तक का दैनिक जीवन बीएमसी की सेवाओं पर टिका है।

शहर की लाइफलाइन और बुनियादी ढांचे का प्रबंधन

बीएमसी की सबसे बड़ी जिम्मेदारी मुंबई के जटिल और व्यस्त बुनियादी ढांचे का रखरखाव करना है। यह निगम शहर के करीब 2,050 किलोमीटर लंबे सड़क नेटवर्क के निर्माण और मरम्मत के लिए उत्तरदायी है। मानसून के दौरान मुंबई की चुनौतियों को देखते हुए ड्रेनेज और सीवेज सिस्टम का प्रबंधन भी बीएमसी के कंधों पर होता है। पानी की आपूर्ति के मामले में बीएमसी एक मिसाल पेश करती है, जहां सात विशाल झीलों के माध्यम से पूरे मुंबई को पीने का शुद्ध पानी पहुंचाया जाता है। केवल रखरखाव ही नहीं, बल्कि शहर की भविष्यवादी परियोजनाओं जैसे मुंबई कोस्टल रोड, विशाल फ्लाईओवर और नए पुलों का निर्माण भी इसी निगम की देखरेख में होता है। स्वच्छता के मोर्चे पर, मुंबई हर दिन लगभग 8,000 से 10,000 मीट्रिक टन कचरा पैदा करता है, जिसे व्यवस्थित रूप से इकट्ठा करना और प्रबंधित करना बीएमसी की एक बड़ी उपलब्धि मानी जाती है।

जन कल्याण: स्वास्थ्य और शिक्षा का विशाल नेटवर्क

बीएमसी का प्रभाव सड़कों और पानी से आगे बढ़कर सार्वजनिक स्वास्थ्य और शिक्षा तक फैला हुआ है। यह देश की सबसे बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों में से एक का संचालन करती है। इसके पास अपने चार बड़े मेडिकल कॉलेज अस्पताल, 16 सामान्य अस्पताल और सैकड़ों छोटे-बड़े औषधालय (डिस्पेंसरी) हैं, जहां रोजाना हजारों नागरिकों का इलाज होता है। शिक्षा के क्षेत्र में, बीएमसी 1100 से अधिक स्कूल चलाती है, जो मुख्य रूप से समाज के आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करते हैं। इसके अलावा, मुंबई की प्रसिद्ध ‘बेस्ट’ बस सेवा की देखरेख और शहर के 800 से ज्यादा पार्कों और उद्यानों का सौंदर्यीकरण भी बीएमसी के कार्यों की सूची में शामिल है।

वित्तीय शक्ति: आखिर कहां से आता है इतना पैसा

बीएमसी का वित्तीय ढांचा इसे अन्य नगर निकायों से अलग बनाता है। इसका मौजूदा बजट लगभग 74,000 करोड़ रुपये के आसपास है। इस विशाल राशि का बड़ा हिस्सा बीएमसी अपने आंतरिक स्रोतों से जुटाती है। ‘संपत्ति कर’ (प्रॉपर्टी टैक्स) इसकी आय का सबसे बड़ा स्तंभ है, जो मुंबई की आवासीय और व्यावसायिक संपत्तियों से वसूला जाता है। इसके अलावा, जलापूर्ति और सीवेज जैसी नागरिक सुविधाओं के बदले लिया जाने वाला शुल्क, भवन निर्माण की अनुमति से मिलने वाली भारी-भरकम फीस और विज्ञापनों के लिए दिए जाने वाले टेंडर इसकी तिजोरी भरते हैं। पार्किंग शुल्क और विभिन्न नियमों के उल्लंघन पर लगने वाले जुर्माने भी राजस्व का हिस्सा हैं। अपनी मजबूत आर्थिक स्थिति के कारण बीएमसी को बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए राज्य या केंद्र सरकार पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहना पड़ता, हालांकि उसे समय-समय पर सरकारी अनुदान प्राप्त होते हैं।

चुनावी प्रक्रिया और वार्डों का जटिल गणित

बीएमसी के चुनाव की प्रक्रिया काफी व्यवस्थित है। पूरी मुंबई को 24 प्रशासनिक वार्डों में बांटा गया है, जिन्हें आगे 227 छोटे चुनावी वार्डों (सीटों) में विभाजित किया गया है। हर वार्ड का प्रतिनिधित्व करने के लिए एक पार्षद (कॉरपोरेटर) चुना जाता है। आरक्षण की व्यवस्था के तहत 227 में से 114 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की गई हैं, जिनमें विभिन्न श्रेणियों (एससी, एसटी, ओबीसी) की महिलाओं का प्रतिनिधित्व शामिल है। आमतौर पर ये चुनाव हर पांच साल में होते हैं, लेकिन 2017 के बाद कोरोना महामारी और राज्य में हुए राजनीतिक उलटफेर के कारण इस बार ये चुनाव लगभग 9 साल बाद हो रहे हैं। चुनाव लड़ने के लिए उम्मीदवार की न्यूनतम आयु 21 वर्ष और मुंबई की मतदाता सूची में नाम होना अनिवार्य है। किसी भी दल को बहुमत साबित करने और अपना मेयर (महापौर) बनाने के लिए 114 सीटों के जादुई आंकड़े को छूना होता है।

वर्तमान राजनीतिक समीकरण और बदली हुई चुनौतियां

इस बार के चुनाव पहले के मुकाबले कहीं अधिक पेचीदा हैं। 2017 के चुनावों में शिवसेना और भाजपा के बीच कड़ी टक्कर थी, लेकिन तब शिवसेना एकजुट थी। आज की स्थिति यह है कि शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) दोनों ही दो-दो गुटों में बंट चुकी हैं। एक तरफ भाजपा, शिवसेना (एकनाथ शिंदे) और राकांपा (अजित पवार) का ‘महायुति’ गठबंधन है, तो दूसरी तरफ शिवसेना (उद्धव गुट), कांग्रेस और राकांपा (शरद पवार) का ‘महा विकास अघाड़ी’ मैदान में है। इस बार कुल 1700 उम्मीदवार चुनावी मैदान में हैं। एक चौंकाने वाला आंकड़ा यह है कि इस बार 32.8% निर्दलीय उम्मीदवार मैदान में हैं, जो 2017 की तुलना में अधिक है। इसका मुख्य कारण प्रमुख पार्टियों में बड़े पैमाने पर हुई बगावत है, जहां टिकट न मिलने से नाराज कई दिग्गज नेता अपनी ही पार्टी के खिलाफ निर्दलीय या बागी के रूप में चुनाव लड़ रहे हैं।

राष्ट्रीय राजनीति पर प्रभाव और ऐतिहासिक नतीजे

बीएमसी के चुनाव को अक्सर ‘शहरी भारत के मिजाज’ का थर्मामीटर कहा जाता है। चूंकि मुंबई देश का आर्थिक केंद्र है, इसलिए यहां के चुनावी नतीजे सीधे तौर पर राष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित करते हैं। पिछले चुनावों में शिवसेना का दबदबा रहा था, लेकिन इस बार खंडित जनादेश की संभावना और बागियों की बढ़ती संख्या ने परिणामों को अनिश्चित बना दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बीएमसी के नतीजे यह तय करेंगे कि असली शिवसेना और असली राकांपा के दावों पर जनता किसकी मुहर लगाती है। 15 जनवरी का यह मतदान न केवल अगले पांच वर्षों के लिए मुंबई की नगर सरकार चुनेगा, बल्कि 2029 के बड़े चुनावों के लिए भी एक मजबूत पिच तैयार करेगा।

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