बरसाना में भक्ति का सैलाब: नव वर्ष की पहली भोर में उमड़ी श्रद्धा, बारिश की फुहारों के बीच गूंजा ‘राधे-राधे’
बरसाना (मथुरा): साल 2026 की पहली सुबह राधारानी के धाम बरसाना में किसी दिव्य उत्सव से कम नहीं थी। आधुनिक दुनिया जहां नए साल का स्वागत शोर-शराबे और पार्टी के साथ कर रही थी, वहीं कान्हा की नगरी का यह पावन कस्बा भक्ति, संगीत और आध्यात्मिक आनंद में डूबा नजर आया। कड़ाके की सर्दी और अचानक हुई बेमौसम बारिश भी भक्तों के सैलाब को रोकने में नाकाम रही। मंजीरों की झंकार, ढोलक की थाप और ‘राधा-राधा’ के जयकारों के बीच बरसाना ने एक बार फिर सिद्ध कर दिया कि यहाँ हर नई शुरुआत लौकिक नहीं, बल्कि पारलौकिक प्रेम और श्रद्धा के साथ होती है।
मंजीरों की झंकार और ढोलक की थाप से हुआ साल का आगाज
मथुरा जनपद के बरसाना कस्बे में नववर्ष की पहली किरण फूटने से पहले ही हलचल शुरू हो गई थी। तड़के चार बजे से ही देश के कोने-कोने से आए श्रद्धालुओं का जत्था लाड़ली जी (श्री राधा रानी) के मंदिर की ओर बढ़ने लगा। जैसे-जैसे दिन चढ़ा, पूरा वातावरण भजनों की मधुर ध्वनियों से गुंजायमान हो उठा। मंदिर के रास्तों पर भक्तों की टोलियां हाथों में मंजीरे लिए और गले में ढोलक लटकाए झूमती नजर आईं। संकीर्तन की इस लहर ने कड़ाके की ठंड को भी बेअसर कर दिया। स्थानीय निवासियों के अनुसार, बरसाना की गलियों में साल का पहला दिन हमेशा से ही भक्तिमय रहता है, लेकिन इस बार जनसैलाब पिछले कई वर्षों के रिकॉर्ड तोड़ता दिखाई दिया।
आसमान से बरसा ‘आशीष’: बारिश ने बढ़ाई आस्था की गर्माहट
दोपहर करीब 12 बजे तक मंदिर और उसके आसपास का नजारा पूरी तरह भक्ति के रंग में रंगा था, तभी अचानक मौसम ने करवट ली। आसमान में उमड़ते काले बादलों ने सूरज को ढंक लिया और हल्की बारिश शुरू हो गई। उत्तर भारत में चल रही शीतलहर के बीच इस बारिश ने ठिठुरन को और बढ़ा दिया, लेकिन भक्तों के लिए यह मौसम की मार नहीं बल्कि ‘इंद्र देव’ का आशीष थी। जब फुहारें गिरने लगीं, तो मंदिर की सीढ़ियों पर कतारबद्ध खड़े श्रद्धालु अपनी जगह से हिले तक नहीं। भीगते हुए वस्त्रों और बर्फीली हवाओं के बीच भी उनके कंठ से निकलने वाली राधा नाम की गूंज और तेज हो गई।
बारिश में थिरकते कदम और अटूट श्रद्धा का रेला
बरसाना की संकरी गलियों से लेकर ऊंची पहाड़ी पर स्थित मुख्य मंदिर मार्ग तक, हर जगह केवल भक्तों का रेला दिखाई दे रहा था। बारिश की बूंदों ने जब धुल को शांत किया, तो भक्तों का नृत्य और भी प्रभावी हो उठा। कई भक्त युगल वर्षा के बीच हाथ उठाकर झूमते हुए मंदिर की ओर बढ़ रहे थे। सुरक्षा के लिहाज से तैनात पुलिसकर्मी भी भक्तों के इस उत्साह को देखकर हैरान थे। गलियों में स्थित मठों और आश्रमों से आती भजनों की स्वर लहरियों ने एक ऐसा वातावरण तैयार किया था, जिसमें भौतिक कष्टों की कोई जगह नहीं थी। आस्था का यह प्रवाह ऐसा था कि बूढ़े, बच्चे और महिलाएं सभी समान रूप से लाड़ली जी की एक झलक पाने के लिए व्याकुल थे।
लाड़ली जी के दरबार में दर्शन की लंबी प्रतीक्षा
श्री जी मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ को देखते हुए सुरक्षा व्यवस्था चाक-चौबंद की गई थी। दर्शन के लिए लगी कतारें मंदिर की सीढ़ियों से नीचे मुख्य बाजार तक पहुंच गई थीं। घंटों की प्रतीक्षा के बावजूद भक्तों के चेहरे पर थकान के बजाय एक दिव्य चमक थी। जैसे ही मंदिर के कपाट खुलते, पूरा परिसर ‘वृषभानु दुलारी की जय’ और ‘राधा रानी की जय’ के नारों से दहल उठता। दर्शन पाने के बाद भक्तों ने मंदिर प्रांगण में ही बैठकर संकीर्तन शुरू कर दिया। यहाँ का नियम है कि नए साल का पहला दर्शन अपनी आराध्या को समर्पित किया जाए, और इसी परंपरा का निर्वहन करने के लिए लाखों की संख्या में श्रद्धालु यहाँ जुटे थे।
भक्ति की गर्माहट ने दी ठंड को चुनौती
बरसाना में तापमान गिरकर एकल अंक में पहुंच गया था, लेकिन यहाँ भक्ति की अग्नि इतनी प्रज्वलित थी कि ठंड कहीं पीछे छूट गई। मंदिर के आसपास के दुकानदारों ने बताया कि भक्तों का उत्साह इतना प्रबल था कि लोग गीले कपड़ों में भी घंटों खड़े रहे। चाय की चुस्कियों और राधा नाम के सहारे श्रद्धालुओं ने खुद को ऊर्जावान बनाए रखा। शाम होते-होते जब बारिश थमी, तो हल्की धुंध छाने लगी, जिससे मंदिर का मनोरम दृश्य और भी अलौकिक हो गया। दीपों की रोशनी और सुगंधित अगरबत्तियों के धुएं ने पूरे वातावरण को रहस्यमयी और शांतिपूर्ण बना दिया।
बरसाना का संदेश: शोर नहीं, संकीर्तन से हो नई शुरुआत
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में जहाँ नए साल का मतलब केवल मनोरंजन तक सीमित रह गया है, वहीं बरसाना ने दुनिया को एक अलग संदेश दिया है। यहाँ आने वाले पर्यटकों और श्रद्धालुओं का कहना था कि राधा नाम की महिमा में जो सुकून मिलता है, वह दुनिया के किसी भी शोर-शराबे वाले जश्न में नहीं है। बरसाना ने एक बार फिर यह जता दिया कि भारतीय संस्कृति में नववर्ष का स्वागत केवल कैलेंडर बदलने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि अपनी जड़ों और ईश्वरीय सत्ता के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर है। मेघों के आशीष और भजनों के प्रवाह ने इस दिन को अमिट बना दिया।
प्रशासन और स्थानीय लोगों का सहयोग
इतनी बड़ी भीड़ और अचानक हुई बारिश को संभालने के लिए स्थानीय प्रशासन और मंदिर प्रबंधन ने कड़ी मेहनत की। जगह-जगह अलाव की व्यवस्था की गई और सेवाभावी संस्थाओं ने गरम दूध और प्रसाद का वितरण किया। ट्रैफिक व्यवस्था को सुचारू रखने के लिए वाहनों को बरसाना की बाहरी सीमाओं पर ही रोक दिया गया था, जिससे पैदल चलने वाले यात्रियों को परेशानी न हो। स्थानीय निवासियों ने भी अपने घरों के द्वार भक्तों के लिए खोल दिए ताकि वे बारिश से बचाव कर सकें। यह आपसी भाईचारा और सेवा भाव भी राधा रानी की कृपा का ही एक रूप नजर आया।