• January 20, 2026

पर्यावरण मंजूरी नियमों में बड़े बदलाव पर रार: कांग्रेस ने केंद्र को घेरा, जयराम रमेश बोले- ‘यह जवाबदेह प्रशासन पर करारा प्रहार’

नई दिल्ली: केंद्र सरकार द्वारा गैर-कोयला खनन परियोजनाओं के लिए पर्यावरण मंजूरी (Environmental Clearance) से जुड़े नियमों में किए गए हालिया बदलावों ने एक नया राजनीतिक और पर्यावरणीय विवाद खड़ा कर दिया है। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने इन संशोधनों को लेकर मोदी सरकार पर तीखा हमला बोला है। कांग्रेस का आरोप है कि नए नियमों के तहत भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही पर्यावरण मंजूरी देने का प्रावधान पर्यावरण संरक्षण के बुनियादी सिद्धांतों के खिलाफ है। पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने इसे देश के ‘जिम्मेदार और जवाबदेह पर्यावरण प्रशासन’ के लिए एक बड़ा झटका करार दिया है।

नियमों में क्या हुआ बदलाव: भूमि अधिग्रहण की अनिवार्यता खत्म

केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा जारी एक हालिया आधिकारिक ज्ञापन के अनुसार, अब गैर-कोयला खनन परियोजनाओं (Non-Coal Mining Projects) के विकासकर्ताओं को पर्यावरण मंजूरी (EC) प्राप्त करने के लिए भूमि अधिग्रहण का आधिकारिक प्रमाण प्रस्तुत करने की आवश्यकता नहीं होगी। अब तक के नियमों के अनुसार, किसी भी परियोजना प्रस्तावक को यह साबित करना होता था कि उसके पास परियोजना के लिए आवश्यक भूमि का कानूनी अधिकार या अधिग्रहण का प्रमाण मौजूद है, तभी मंत्रालय उसकी पर्यावरण मंजूरी की फाइल पर आगे बढ़ता था।

मंत्रालय के इस नए कदम का अर्थ यह है कि अब कंपनियां जमीन खरीदे या अधिग्रहित किए बिना ही यह दावा कर सकेंगी कि उनकी परियोजना से पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं होगा और इसके आधार पर वे मंजूरी हासिल कर सकेंगी। सरकार का तर्क है कि इससे व्यापार सुगमता (Ease of Doing Business) बढ़ेगी और परियोजनाओं में होने वाली देरी को कम किया जा सकेगा।

जयराम रमेश का तीखा प्रहार: ‘बिना भूमि की जानकारी के आकलन कैसे?’

कांग्रेस महासचिव और पूर्व पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर इस नीतिगत बदलाव की कड़ी निंदा की है। उन्होंने कहा कि 18 दिसंबर 2025 को मंत्रालय द्वारा लिया गया यह निर्णय पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) की पूरी प्रक्रिया को कमजोर और अर्थहीन बना देता है। रमेश ने तर्क दिया कि जब तक यह स्पष्ट न हो कि खनन किस विशिष्ट भूमि पर होना है और उस भूमि की प्रकृति (वन, कृषि या रिहायशी) क्या है, तब तक उसके पर्यावरणीय प्रभाव का सटीक आकलन करना असंभव है।

जयराम रमेश ने अपने पोस्ट में लिखा, “गैर-कोयला खनन परियोजनाओं के लिए अब तक नीति यह रही है कि पहले कानून के अनुसार भूमि अधिग्रहण पूरा किया जाए और उसके बाद ही पर्यावरण मंजूरी मांगी जाए। यह समझना बहुत मुश्किल है कि परियोजना के अंतर्गत आने वाले क्षेत्र की पूरी जानकारी के बिना कोई सार्थक पर्यावरणीय प्रभाव आकलन कैसे किया जा सकता है? यह मोदी सरकार द्वारा जिम्मेदार पर्यावरण प्रशासन को कमजोर करने की दिशा में एक और कदम है।”

मंत्रालय का तर्क: व्यावहारिक कठिनाइयों को दूर करने की कोशिश

दूसरी ओर, पर्यावरण मंत्रालय ने अपने आधिकारिक ज्ञापन में इस बदलाव के पीछे की वजहों को स्पष्ट किया है। मंत्रालय के अनुसार, गैर-कोयला खनन विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति (EAC) ने इस मुद्दे पर गहराई से विचार-विमर्श किया था। समिति को कई हितधारकों की ओर से यह अनुरोध प्राप्त हुए थे कि पर्यावरण मंजूरी प्रदान करते समय भूस्वामियों की सहमति पर जोर नहीं दिया जाना चाहिए और न ही भूमि अधिग्रहण की स्थिति को मंजूरी की प्रक्रिया से जोड़ा जाना चाहिए।

क्षेत्रीय ईएसी (EAC) का मानना है कि यह अनुरोध उचित है क्योंकि कई मामलों में खनन परियोजनाएं ऐसी होती हैं जहां प्रारंभिक मंजूरी मिलने के बाद काम शुरू होता है और आवश्यकतानुसार चरणबद्ध तरीके से भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया जारी रहती है। ईएसी की सिफारिशों के आधार पर मंत्रालय ने निष्कर्ष निकाला कि मूल्यांकन के समय भूमि अधिग्रहण के दस्तावेजों पर जोर देना कुछ परियोजनाओं के लिए व्यावहारिक रूप से संभव नहीं हो पा रहा था, जिससे विकास कार्य बाधित हो रहे थे।

7 अक्टूबर 2014 के कार्यालय ज्ञापन में संशोधन

यह नया आदेश 7 अक्टूबर 2014 के उस संशोधित कार्यालय ज्ञापन (OM) की समीक्षा के बाद आया है, जिसमें पर्यावरण मंजूरी की शर्तों को कड़ा किया गया था। सरकार का कहना है कि विभिन्न क्षेत्रों से प्राप्त सुझावों और टिप्पणियों के आधार पर यह पाया गया कि पुराने नियम कुछ क्षेत्रों में विकास की गति को धीमा कर रहे थे। विशेषज्ञों की समिति ने पाया कि पर्यावरण मंजूरी (EC) बुनियादी रूप से इस बात का आकलन है कि किसी गतिविधि का प्रकृति पर क्या प्रभाव पड़ेगा, और इसे भूमि के मालिकाना हक जैसे राजस्व संबंधी मामलों से अलग रखा जाना चाहिए।

सरकार का मानना है कि इस कदम से लौह अयस्क, चूना पत्थर और अन्य महत्वपूर्ण खनिजों के खनन की प्रक्रिया में तेजी आएगी, जिससे औद्योगिक विकास को गति मिलेगी। हालांकि, पर्यावरणविदों का एक बड़ा वर्ग कांग्रेस के सुर में सुर मिलाते हुए इसे खतरनाक मान रहा है, क्योंकि उनका कहना है कि भूमि अधिग्रहण से पहले मंजूरी देने का मतलब है कि स्थानीय समुदायों और आदिवासियों की सहमति को नजरअंदाज किया जा सकता है।

पर्यावरणीय प्रभाव और स्थानीय समुदायों की चिंता

कांग्रेस और पर्यावरण कार्यकर्ताओं का मुख्य तर्क यह है कि यदि भूमि अधिग्रहण से पहले पर्यावरण मंजूरी मिल जाती है, तो भूस्वामियों और स्थानीय निवासियों के पास परियोजना का विरोध करने का कानूनी आधार कमजोर हो जाता है। अक्सर खनन परियोजनाओं में स्थानीय जल स्रोतों, वनों और वन्यजीवों पर पड़ने वाले प्रभाव का आकलन भूमि के विशिष्ट टुकड़े के आधार पर किया जाता है।

जयराम रमेश ने आशंका जताई है कि इस नीति से ‘क्रोनी कैपिटलिज्म’ को बढ़ावा मिलेगा, जहां कंपनियां पहले सरकार से कागजी मंजूरी हासिल कर लेंगी और फिर उस मंजूरी के आधार पर छोटे भूस्वामियों और किसानों पर अपनी जमीन बेचने का दबाव बनाएंगी। उन्होंने चेतावनी दी कि यह न केवल पर्यावरण के लिए हानिकारक है, बल्कि सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के भी विरुद्ध है।

निष्कर्ष: विकास और पर्यावरण के बीच छिड़ी जंग

गैर-कोयला खनन परियोजनाओं के नियमों में यह बदलाव एक बार फिर ‘विकास बनाम पर्यावरण’ की पुरानी बहस को केंद्र में ले आया है। जहां सरकार इसे प्रक्रियाओं को सरल बनाने और निवेश आकर्षित करने की दिशा में एक साहसिक कदम बता रही है, वहीं विपक्ष इसे भविष्य के पर्यावरणीय संकट का न्योता मान रहा है। 18 दिसंबर 2025 का यह कार्यालय ज्ञापन अब आने वाले समय में बड़ी कानूनी लड़ाइयों और राजनीतिक बहसों का आधार बन सकता है।

संसदीय गलियारों में यह चर्चा तेज है कि कांग्रेस इस मुद्दे को संसद के आगामी सत्र में पुरजोर तरीके से उठाएगी। जयराम रमेश के बयानों से स्पष्ट है कि विपक्ष इस मामले को केवल प्रशासनिक बदलाव के रूप में नहीं, बल्कि सरकार की ‘पर्यावरण विरोधी’ छवि के रूप में जनता के सामने पेश करने की तैयारी में है।

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