देश की रक्षा करने वाले पूर्व नौसेना प्रमुख को अब साबित करनी होगी अपनी पहचान: चुनाव आयोग के नोटिस पर एडमिरल अरुण प्रकाश ने जताई हैरानी
पणजी: भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था और नौकरशाही की कार्यप्रणाली कभी-कभी ऐसे मोड़ पर खड़ी हो जाती है, जहाँ नियम और सम्मान के बीच की लकीर धुंधली पड़ जाती है। एक ऐसा ही चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जिसमें देश के पूर्व नौसेना प्रमुख एडमिरल अरुण प्रकाश (सेवानिवृत्त) को निर्वाचन आयोग द्वारा अपनी पहचान साबित करने के लिए नोटिस जारी किया गया है। जिस सैन्य अधिकारी ने दशकों तक समुद्र की सीमाओं पर देश की सुरक्षा का जिम्मा संभाला और ‘आईएनएस विराट’ जैसे विशाल युद्धपोत की कमान संभाली, उन्हें अब एक प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत खुद के ‘भारतीय मतदाता’ होने का साक्ष्य प्रस्तुत करने के लिए बुलाया गया है। इस घटना ने न केवल प्रशासनिक संवेदनशीलता पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि वरिष्ठ नागरिकों और देश के सम्मानित पदों पर रहे व्यक्तियों के प्रति व्यवस्था के रवैये को भी चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
चुनावी सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) का पेंच
पूरा मामला मतदाता सूची के ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (Special Intensive Revision – SIR) प्रक्रिया से जुड़ा है। वर्तमान में गोवा में सेवानिवृत्त जीवन व्यतीत कर रहे एडमिरल अरुण प्रकाश को चुनाव आयोग की ओर से एक नोटिस मिला है। इस नोटिस में उन्हें व्यक्तिगत रूप से एक बैठक में उपस्थित होने और अपनी पहचान सत्यापित करने का निर्देश दिया गया है। चुनाव आयोग के अधिकारियों के अनुसार, एडमिरल प्रकाश का नाम उन मतदाताओं की श्रेणी में है जो ‘अनमैप्ड’ (Unmapped) कहलाते हैं। एक वरिष्ठ अधिकारी ने स्पष्ट किया कि 2002 में अपडेट की गई मतदाता सूची के रिकॉर्ड में उनकी जानकारी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है, जिसके कारण उन्हें अपनी पहचान साबित करने के लिए बुलाया जाना अनिवार्य हो गया।
हालांकि, तकनीकी नियमों के परे यह मुद्दा इसलिए गहरा गया है क्योंकि एडमिरल प्रकाश और उनकी पत्नी, दोनों ही वरिष्ठ नागरिक हैं। पूर्व नौसेना प्रमुख ने इस पूरी प्रक्रिया पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए व्यवस्था की खामियों को उजागर किया है। उन्होंने बताया कि सरकारी रिकॉर्ड और एसआईआर फॉर्म भरने के बावजूद उन्हें कार्यालय बुलाया जाना नौकरशाही की कार्यक्षमता पर सवाल उठाता है।
पूर्व नौसेना प्रमुख का दर्द: ‘बुजुर्ग दंपती को 18 किलोमीटर दूर बुलाना कितना उचित?’
एडमिरल अरुण प्रकाश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (पूर्व में ट्विटर) पर अपनी व्यथा साझा करते हुए चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने बताया कि वह 82 वर्ष के हैं और उनकी पत्नी 78 वर्ष की हैं। इस उम्र में उन्हें अपने घर से 18 किलोमीटर दूर एक दफ्तर में, वह भी दो अलग-अलग तारीखों पर बुलाया गया है। एडमिरल ने तर्क दिया कि जब बीएलओ (Booth Level Officer) उनके घर तीन बार आ चुके थे, तो क्या वे आवश्यक अतिरिक्त जानकारी वहीं एकत्र नहीं कर सकते थे?
उन्होंने चुनाव आयोग को रचनात्मक सुझाव देते हुए कहा कि यदि मौजूदा एसआईआर फॉर्म से आवश्यक डेटा प्राप्त नहीं हो रहा है, तो आयोग को फॉर्म के डिजाइन में बदलाव करना चाहिए ताकि नागरिकों को अनावश्यक परेशानी न हो। एडमिरल ने इस बात पर जोर दिया कि एक तरफ सरकार डिजिटल इंडिया और वरिष्ठ नागरिकों की सुविधा की बात करती है, वहीं दूसरी तरफ धरातल पर प्रक्रियाएं अब भी दशकों पुरानी और जटिल बनी हुई हैं। उनकी इस पोस्ट के बाद सोशल मीडिया पर लोगों ने चुनाव आयोग की आलोचना करते हुए इसे एक ‘सम्मानित योद्धा का अपमान’ करार दिया है।
एडमिरल अरुण प्रकाश: शौर्य और सेवा का एक गौरवशाली इतिहास
इस विवाद के बीच एडमिरल अरुण प्रकाश के उस विराट व्यक्तित्व को याद करना आवश्यक है, जिन्होंने भारतीय नौसेना को एक नई दिशा दी। एडमिरल प्रकाश 31 जुलाई 2004 से 30 अक्टूबर 2006 तक भारतीय नौसेना के अध्यक्ष रहे। उनके करियर का ग्राफ वीरता और रणनीतिक कुशलता की मिसालों से भरा पड़ा है। उन्होंने अपने सेवाकाल के दौरान एक फाइटर-स्क्वाड्रन, एक नेवल एयर स्टेशन और चार प्रमुख युद्धपोतों की कमान संभाली। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वे भारत के गौरव माने जाने वाले विमानवाहक पोत ‘आईएनएस विराट’ के भी कमांडर रहे।
देश के प्रति उनकी निस्वार्थ सेवा और बहादुरी के लिए उन्हें परम विशिष्ट सेवा मेडल (PVSM), अति विशिष्ट सेवा मेडल (AVSM), वीर चक्र (VrC) और विशिष्ट सेवा मेडल (VSM) जैसे शीर्ष सैन्य सम्मानों से नवाजा गया है। ऐसे अलंकृत अधिकारी को महज एक कागजी औपचारिकता के लिए अपनी पहचान साबित करने का नोटिस मिलना, व्यवस्था की ‘मैकेनिकल’ सोच को दर्शाता है, जहाँ व्यक्ति के योगदान और उसकी वर्तमान स्थिति (वृद्धावस्था) का ध्यान नहीं रखा जाता।
प्रशासनिक संवेदनशीलता बनाम नियम: एक बड़ी चुनौती
यह मामला केवल एक व्यक्ति विशेष का नहीं है, बल्कि यह उस व्यापक समस्या की ओर इशारा करता है जिससे देश के लाखों बुजुर्ग नागरिक हर साल मतदाता सूची पुनरीक्षण या पेंशन सत्यापन जैसी प्रक्रियाओं के दौरान गुजरते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं को अपने नियमों में ऐसी लचीली व्यवस्था करनी चाहिए, जिससे 75 वर्ष से अधिक आयु के नागरिकों या विशिष्ट सेवा देने वाले व्यक्तियों का सत्यापन उनके घर पर ही या डिजिटल माध्यमों से सुनिश्चित किया जा सके।
प्रशासनिक अधिकारियों का पक्ष है कि वे केवल नियमों का पालन कर रहे हैं और ‘अनमैप्ड’ मतदाताओं की सूची को पूरी तरह पारदर्शी बनाना चाहते हैं। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या नियम इतने कठोर होने चाहिए कि वे सामान्य तर्क और मानवीय गरिमा को भी नजरअंदाज कर दें? एडमिरल अरुण प्रकाश का मामला आज एक नजीर बन गया है, जो चुनाव आयोग को अपनी ‘फील्ड वेरिफिकेशन’ प्रक्रियाओं को और अधिक मानवीय और आधुनिक बनाने के लिए प्रेरित कर सकता है। फिलहाल, देश के एक पूर्व सैन्य कमांडर का अपनी पहचान के लिए दफ्तर बुलाया जाना, सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में तीखी चर्चा का विषय बना हुआ है।