• February 11, 2026

तमिलनाडु की सियासत में ‘अम्मा’ की विरासत का पुनर्मिलन: एनडीए में टीटीवी दिनकरन की वापसी और डीएमके विरोधी मोर्चा मजबूत

चेन्नई: तमिलनाडु की राजनीति में एक बार फिर बड़े बदलाव के संकेत मिल रहे हैं, जहां पूर्व मुख्यमंत्री दिवंगत जे. जयललिता की विरासत का दावा करने वाले गुट एक मंच पर आते दिख रहे हैं। बुधवार को एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम में, टीटीवी दिनकरन के नेतृत्व वाली अम्मा मक्कल मुनेत्र कड़गम (AMMK) ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) में अपनी वापसी का औपचारिक ऐलान कर दिया। कुछ महीनों पहले भाजपा और एआईएडीएमके के नेतृत्व वाले इस गठबंधन से अलग हुए दिनकरन ने केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल से मुलाकात के बाद घर वापसी का फैसला किया। इस कदम को तमिलनाडु में सत्तारूढ़ डीएमके (DMK) के खिलाफ एक मजबूत और एकजुट मोर्चा तैयार करने की दिशा में सबसे बड़ा कदम माना जा रहा है।

एनडीए का बढ़ता कुनबा और एकजुट होती ‘अम्मा’ की ताकत

तमिलनाडु में वर्तमान में ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (AIADMK) एनडीए गठबंधन का नेतृत्व कर रही है। टीटीवी दिनकरन की वापसी के साथ ही जयललिता की राजनीति से निकले प्रमुख धड़ों के बीच की दूरियां कम होती नजर आ रही हैं। एआईएडीएमके के महासचिव एडप्पादी के. पलानीस्वामी (EPS) ने खुद दिनकरन का स्वागत किया, जो कभी उनके कट्टर राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी माने जाते थे।

इस गठबंधन में पिछले कुछ हफ्तों से लगातार विस्तार हो रहा है। इससे पहले, 7 जनवरी को डॉ. अंबुमणि रामदास के नेतृत्व वाली पट्टाली मक्कल कड़ची (PMK) ने भी एनडीए का हाथ थामा था। अब एएमएमके के आने से दक्षिण तमिलनाडु और डेल्टा क्षेत्रों में गठबंधन की स्थिति और मजबूत होने की उम्मीद है, जहां दिनकरन का विशेष प्रभाव माना जाता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा और एआईएडीएमके मिलकर एक ऐसा सामाजिक समीकरण बनाने की कोशिश कर रहे हैं जो डीएमके के ‘द्रविड़ मॉडल’ को कड़ी चुनौती दे सके।

पलानीस्वामी का हमला: “वंशवादी राजनीति और अत्याचारी शासन का होगा अंत”

टीटीवी दिनकरन की वापसी पर खुशी जाहिर करते हुए एआईएडीएमके प्रमुख एडप्पादी के. पलानीस्वामी ने सोशल मीडिया पर एक तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने इस गठबंधन को केवल चुनावी नहीं, बल्कि एक ‘वैचारिक धर्मयुद्ध’ करार दिया। पलानीस्वामी ने लिखा कि दिनकरन का एनडीए में शामिल होना उस “बुरी ताकत” (DMK) के अत्याचारी शासन को खत्म करने की दिशा में एक बड़ा कदम है, जिसने राज्य को अपनी वंशवादी राजनीति के जाल में फंसा रखा है।

पलानीस्वामी ने अपने समर्थकों को याद दिलाया कि इस गठबंधन का मूल उद्देश्य एक बार फिर ‘अम्मा’ (जे. जयललिता) के सुनहरे शासन को वापस लाना है। उन्होंने कहा कि जिस तरह से डीएमके सरकार प्रशासन चला रही है, उससे जनता ऊब चुकी है और अब अन्नाद्रमुक की विरासत से निकले सभी नेताओं का एक साथ आना समय की मांग थी। यह बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में एआईएडीएमके के भीतर वर्चस्व की जंग ने पार्टी को कमजोर किया था, लेकिन अब पलानीस्वामी सभी छोटे धड़ों को एकजुट कर डीएमके के खिलाफ एक ‘महागठबंधन’ बनाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं।

कड़वाहट से समझौते तक: एआईएडीएमके के भीतर बदलता समीकरण

टीटीवी दिनकरन और एडप्पादी पलानीस्वामी के बीच का रिश्ता उतार-चढ़ाव से भरा रहा है। साल 2017 का वह दौर तमिलनाडु की राजनीति का सबसे नाटकीय समय था, जब पूर्व मुख्यमंत्री जे. जयललिता के निधन के बाद पार्टी बिखरने की कगार पर थी। उस समय दिनकरन की चाची वी.के. शशिकला, जो जयललिता की सबसे करीबी विश्वासपात्र थीं, ने पलानीस्वामी को मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुँचाने में अहम भूमिका निभाई थी। हालांकि, जल्द ही सत्ता संघर्ष शुरू हुआ और पलानीस्वामी ने ओ. पन्नीरसेल्वम (OPS) के साथ हाथ मिलाकर शशिकला और दिनकरन को पार्टी से निष्कासित कर दिया।

उस समय पलानीस्वामी सह-समन्वयक थे और पन्नीरसेल्वम समन्वयक की भूमिका में थे। वक्त का पहिया घूमा और 2022 में पन्नीरसेल्वम को भी पार्टी की आम परिषद ने पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया, जिससे पलानीस्वामी निर्विवाद नेता बनकर उभरे। अब, दिनकरन की वापसी यह दर्शाती है कि राजनीति में कोई भी स्थाई शत्रु या मित्र नहीं होता। ‘समान दुश्मन’ (DMK) को हराने की चुनौती ने इन नेताओं को अपने पुराने मतभेदों को दरकिनार करने पर मजबूर कर दिया है। हालांकि, पन्नीरसेल्वम की स्थिति को लेकर अब भी सस्पेंस बना हुआ है, लेकिन दिनकरन का आना पलानीस्वामी के लिए एक बड़ी कूटनीतिक जीत मानी जा रही है।

आगामी चुनावों पर प्रभाव और एनडीए का रोडमैप

तमिलनाडु में लोकसभा और विधानसभा चुनावों की तैयारियों के बीच एनडीए का यह नया स्वरूप काफी प्रभावशाली दिख रहा है। एआईएडीएमके के संगठनात्मक ढांचे, भाजपा की राष्ट्रीय अपील और पीएमके एवं एएमएमके के जातीय और क्षेत्रीय प्रभाव के मिलने से डीएमके-कांग्रेस गठबंधन के लिए राह आसान नहीं होगी। पीयूष गोयल और दिनकरन की मुलाकात ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि भाजपा आलाकमान तमिलनाडु में किसी भी कीमत पर वोटों के बिखराव को रोकना चाहता है।

एनडीए का मुख्य फोकस अब उन सीटों पर होगा जहाँ पिछले चुनावों में विपक्षी दलों के बीच मामूली अंतर रहा था। दिनकरन के साथ आने से थेवर और अन्य प्रभावशाली समुदायों का वोट बैंक एनडीए की ओर झुक सकता है। अब सबकी नजर इस बात पर है कि यह गठबंधन सीटों के बंटवारे को कितनी सहजता से सुलझा पाता है और क्या वे जमीनी स्तर पर अपने कार्यकर्ताओं के बीच उस कड़वाहट को खत्म कर पाएंगे जो पिछले सात सालों के संघर्ष के दौरान पैदा हुई थी। तमिलनाडु की जनता अब एक त्रिकोणीय या द्विध्रुवीय मुकाबले की ओर बढ़ रही है, जहाँ ‘अम्मा’ की विरासत और ‘द्रविड़ गौरव’ के बीच जोरदार टक्कर देखने को मिलेगी।

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