जमानत नियम है और जेल अपवाद: सुप्रीम कोर्ट ने कहा- विचाराधीन कैदी को अनिश्चितकाल तक कैद रखना अन्यायपूर्ण
नई दिल्ली: देश की शीर्ष अदालत ने एक बार फिर व्यक्तिगत स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों के पक्ष में एक बड़ा न्यायिक संदेश दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा है कि किसी भी विचाराधीन कैदी (Under-trial Prisoner) को अनिश्चितकाल के लिए जेल की सलाखों के पीछे नहीं रखा जा सकता। अदालत ने यह टिप्पणी माल एवं सेवा कर (GST) चोरी के एक मामले में आरोपी अमित मेहरा को जमानत देते हुए की। जस्टिस जेपी पारदीवाला और जस्टिस आलोक आराधे की पीठ ने माना कि जब मुकदमे की सुनवाई शुरू होने में देरी हो और आरोपी लंबे समय से हिरासत में हो, तो उसे लगातार जेल में रखना न्याय के प्राकृतिक सिद्धांतों और संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।
मुकदमे की धीमी गति और हिरासत की अवधि पर पीठ की चिंता
अमित मेहरा के मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ ने इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की कि आरोपी पिछले आठ महीनों से अधिक समय से न्यायिक हिरासत में है, लेकिन अब तक उसके खिलाफ न तो आरोप तय हुए हैं और न ही मुकदमे (Trial) की औपचारिक शुरुआत हो पाई है। अदालत ने परिस्थितियों का आकलन करते हुए कहा कि यदि आज की तारीख में मुकदमा शुरू भी हो जाता है, तो भी इसकी कोई गारंटी नहीं है कि अगले एक साल के भीतर कार्यवाही संपन्न हो जाएगी। पीठ ने तर्क दिया कि सजा मिलने से पहले ही किसी व्यक्ति को इतनी लंबी अवधि तक कैद में रखना एक तरह से बिना दोषसिद्धि के दंड देने जैसा है।
हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए शीर्ष अदालत का रुख
अमित मेहरा पर जीएसटी खुफिया महानिदेशालय (DGGI) ने केंद्रीय वस्तु एवं सेवा कर (CGST) अधिनियम और आईजीएसटी (IGST) अधिनियम की विभिन्न गंभीर धाराओं के तहत मामला दर्ज किया था। इससे पहले, पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए आरोपी की नियमित जमानत याचिका को खारिज कर दिया था। हाईकोर्ट के इसी आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी। सर्वोच्च न्यायालय ने मामले के तथ्यों को देखते हुए पाया कि चूंकि इस अपराध में अधिकतम सजा पांच साल तक की है और मामला मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय है, इसलिए आरोपी को और अधिक समय तक जेल में रखने का कोई कानूनी या तार्किक आधार नहीं बनता है।
व्यक्तिगत स्वतंत्रता और अनुच्छेद 21 का महत्व
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में संविधान के अनुच्छेद 21 का परोक्ष रूप से संदर्भ देते हुए दोहराया कि जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार सर्वोपरि है। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि केवल आरोपों की गंभीरता या जांच की जटिलता किसी व्यक्ति को लंबे समय तक बिना मुकदमे के जेल में रखने का बहाना नहीं हो सकती। न्यायिक पीठ ने स्पष्ट किया कि ‘जमानत नियम है और जेल अपवाद’ (Bail is the rule, jail is an exception) का सिद्धांत केवल हत्या या देशद्रोह जैसे जघन्य अपराधों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आर्थिक अपराधों के मामलों में भी समान रूप से लागू होता है, विशेषकर तब जब मुकदमे की गति धीमी हो।
जमानत की शर्तें और जांच एजेंसी के हितों की सुरक्षा
अमित मेहरा को रिहा करने का आदेश देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह जिम्मेदारी निचली अदालत (Trial Court) को सौंपी है कि वह जमानत के लिए उचित शर्तें तय करे। हालांकि, अदालत ने संतुलन साधते हुए जीएसटी विभाग और जांच एजेंसी के हितों का भी ध्यान रखा है। शीर्ष अदालत ने कहा कि यदि जीएसटी विभाग को लगता है कि आरोपी की रिहाई से जांच प्रभावित हो सकती है या साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ का डर है, तो वह निचली अदालत के समक्ष अतिरिक्त शर्तें लगाने के लिए आवेदन कर सकता है। निचली अदालत को उन आवेदनों पर कानून के दायरे में रहकर विचार करने की स्वतंत्रता दी गई है, ताकि न्याय की प्रक्रिया में कोई बाधा न आए।
न्यायिक प्रणाली के लिए एक व्यापक संदेश
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला केवल एक व्यक्ति की रिहाई तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश भर की जेलों में बंद उन हजारों विचाराधीन कैदियों के लिए एक उम्मीद की किरण है जो छोटे या मध्यम स्तर के अपराधों के आरोपों में वर्षों से सुनवाई का इंतजार कर रहे हैं। इस फैसले के जरिए शीर्ष अदालत ने अधीनस्थ न्यायालयों को भी यह संदेश दिया है कि उन्हें जमानत याचिकाओं पर विचार करते समय केवल जांच एजेंसी के दावों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए, बल्कि आरोपी की हिरासत की अवधि और मुकदमे की संभावित समय सीमा का भी ध्यान रखना चाहिए। कोर्ट ने साफ कर दिया कि न्याय में देरी, जेल में बंदी रखने का आधार नहीं बननी चाहिए।
निष्कर्ष और कानून का शासन
अमित मेहरा बनाम जीएसटी विभाग के इस मामले ने एक बार फिर कानूनी बहस को जन्म दे दिया है कि आर्थिक अपराधों में कठोरता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच की रेखा कहां होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश के साथ अमित मेहरा की विशेष अनुमति याचिका और उससे जुड़े सभी लंबित आवेदनों का निपटारा कर दिया है। यह फैसला भविष्य में जीएसटी और अन्य आर्थिक कानूनों के तहत दर्ज होने वाले मामलों में एक महत्वपूर्ण नजीर (Precedent) साबित होगा, जहां अक्सर जांच के नाम पर आरोपियों को लंबी अवधि तक हिरासत में रखा जाता है।