• January 20, 2026

खुदरा महंगाई में मामूली उछाल: दिसंबर में दर बढ़कर 1.33% हुई, तीन महीने के उच्चतम स्तर पर पहुँची लेकिन अभी भी आरबीआई के सुरक्षित दायरे के नीचे

नई दिल्ली: भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए महंगाई के मोर्चे पर मिश्रित संकेत सामने आए हैं। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) द्वारा जारी ताजा आंकड़ों के अनुसार, दिसंबर 2025 में खुदरा मुद्रास्फीति की दर बढ़कर 1.33 प्रतिशत पर पहुँच गई है। यह पिछले महीने यानी नवंबर के 0.71 प्रतिशत के मुकाबले एक उल्लेखनीय वृद्धि है। हालांकि, यह दर तीन महीने के उच्चतम स्तर पर है, लेकिन राहत की बात यह है कि यह अभी भी भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा निर्धारित ‘न्यूनतम सहनशीलता सीमा’ (2 प्रतिशत) से काफी नीचे बनी हुई है। रसोई के बजट पर सब्जियों और प्रोटीन युक्त खाद्य पदार्थों के बढ़ते बोझ ने इस मामूली वृद्धि में मुख्य भूमिका निभाई है।

महंगाई के आंकड़ों का विश्लेषण और खाद्य मुद्रास्फीति की स्थिति

दिसंबर के आंकड़े यह स्पष्ट करते हैं कि हेडलाइन महंगाई में भले ही तेजी आई हो, लेकिन खाद्य मुद्रास्फीति का रुख अब भी थोड़ा अलग है। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) पर आधारित खाद्य मुद्रास्फीति लगातार सातवें महीने नकारात्मक क्षेत्र में बनी रही, जो कि एक दुर्लभ आर्थिक स्थिति है। दिसंबर में खाद्य महंगाई (-) 2.71 प्रतिशत दर्ज की गई, जो नवंबर के (-) 3.91 प्रतिशत के मुकाबले थोड़ी अधिक है।

खाद्य महंगाई का लगातार नकारात्मक बने रहना यह दर्शाता है कि ग्रामीण और कृषि मांग में अब भी वह तेजी नहीं आई है जिसकी उम्मीद की जा रही थी। हालांकि, नवंबर की तुलना में आंकड़ों में जो सुधार हुआ है, वह इस बात का संकेत है कि खाद्य कीमतों में आंशिक रूप से उभार शुरू हो गया है। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि मांग में कमी और आपूर्ति श्रृंखला में सुधार के कारण कीमतें अब भी नियंत्रित हैं, लेकिन आने वाले समय में बेस इफेक्ट (Base Effect) के चलते यह दर ऊपर जा सकती है।

रसोई का बजट और महंगाई बढ़ाने वाले प्रमुख कारक

दिसंबर महीने में महंगाई दर को ऊपर ले जाने में कई घरेलू कारकों का हाथ रहा है। एनएसओ के आंकड़ों के मुताबिक, पर्सनल केयर और इफेक्ट्स (व्यक्तिगत देखभाल से जुड़े उत्पाद), सब्जियां, मांस, मछली, अंडे, मसाले और दालों की कीमतों में बढ़ोतरी देखी गई है। विशेष रूप से सब्जियों और मसालों के दामों में उछाल आने से आम आदमी की रसोई का बजट प्रभावित हुआ है।

प्रोटीन के मुख्य स्रोत जैसे मांस, मछली और अंडे की कीमतों में बढ़ोतरी ने भी हेडलाइन महंगाई को गति दी है। इसके अलावा, व्यक्तिगत देखभाल से जुड़े उत्पादों (Personal Care Products) की कीमतों में इजाफे ने शहरी मध्यम वर्ग के खर्चों को थोड़ा बढ़ा दिया है। दालों और उनके उत्पादों की कीमतों में भी मामूली तेजी देखी गई है, जो खाद्य टोकरी (Food Basket) के प्रमुख हिस्से हैं। इन वस्तुओं की कीमतों में आया यह बदलाव ही है जिसने महंगाई दर को 0.71 प्रतिशत से खींचकर 1.33 प्रतिशत पर ला खड़ा किया है।

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के लिए इन आंकड़ों के मायने

मौद्रिक नीति के लिहाज से यह डेटा अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सरकार ने भारतीय रिजर्व बैंक को मुद्रास्फीति को 4 प्रतिशत के लक्ष्य पर रखने की जिम्मेदारी दी है, जिसमें प्लस-माइनस 2 प्रतिशत का मार्जिन (यानी 2% से 6% की रेंज) तय किया गया है। दिसंबर का 1.33 प्रतिशत का आंकड़ा लगातार चौथे महीने आरबीआई की 2 प्रतिशत की ‘निचली सहनशीलता सीमा’ से कम रहा है।

एक तरफ जहाँ महंगाई का कम होना उपभोक्ताओं के लिए अच्छी खबर है, वहीं दूसरी तरफ 2 प्रतिशत से नीचे की महंगाई दर नीति निर्माताओं के लिए चिंता का विषय भी हो सकती है। यह इस बात का संकेत देता है कि अर्थव्यवस्था में कुल मांग (Aggregate Demand) अब भी कमजोर है। मूल्य वृद्धि की यह धीमी दर आर्थिक सुस्ती की ओर भी इशारा कर सकती है। आगामी मौद्रिक नीति समिति (MPC) की बैठक में आरबीआई गवर्नर और सदस्य इन आंकड़ों पर गहराई से विचार करेंगे। वर्तमान स्थिति में, आरबीआई के पास विकास दर को बढ़ावा देने के लिए ब्याज दरों में कटौती या उन्हें स्थिर रखने की गुंजाइश बनी हुई है।

ग्रामीण मांग और भविष्य की आर्थिक चुनौतियां

खाद्य महंगाई का सात महीनों से लगातार शून्य से नीचे रहना कृषि अर्थव्यवस्था के लिए एक चेतावनी भी हो सकती है। यदि किसानों को उनकी उपज का सही मूल्य नहीं मिल रहा है, तो इससे ग्रामीण क्षेत्रों में क्रय शक्ति (Purchasing Power) कम हो सकती है। दिसंबर के आंकड़ों ने यह साफ कर दिया है कि भले ही महंगाई दर अपने निचले स्तर से ऊपर उठी है, लेकिन यह अब भी संतुलित नहीं है।

विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले महीनों में वैश्विक तेल कीमतों और भू-राजनीतिक तनावों का असर भी खुदरा महंगाई पर पड़ सकता है। यदि कच्चे तेल की कीमतों में अस्थिरता आती है, तो परिवहन लागत बढ़ेगी और अंततः वस्तुओं की कीमतें बढ़ सकती हैं। फिलहाल, 1.33 प्रतिशत की दर भारत को वैश्विक स्तर पर एक स्थिर मुद्रास्फीति वाली अर्थव्यवस्था के रूप में पेश करती है, लेकिन घरेलू मांग को पुनर्जीवित करना और खाद्य कीमतों को संतुलित दायरे में लाना सरकार और आरबीआई के लिए 2026 की बड़ी चुनौती होगी।

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