• February 3, 2026

‘कागजों में चमकता बजट, पर किसानों के लिए केवल निराशा’: राकेश टिकैत ने एमएसपी और सम्मान निधि पर केंद्र को घेरा, निजीकरण पर जताई बड़ी चिंता

मुजफ्फरनगर: केंद्रीय बजट 2026-27 के पेश होने के बाद देशभर से आ रही प्रतिक्रियाओं के बीच भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) के राष्ट्रीय प्रवक्ता और प्रमुख किसान नेता चौधरी राकेश टिकैत ने सरकार के आर्थिक रोडमैप पर कड़ा प्रहार किया है। मुजफ्फरनगर में मीडिया से बातचीत करते हुए टिकैत ने इस बजट को किसानों की उम्मीदों पर पानी फेरने वाला दस्तावेज़ करार दिया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अन्नदाता लंबे समय से जिन बुनियादी मांगों को लेकर संघर्ष कर रहा था, उन्हें इस बजट में पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया है। टिकैत की यह प्रतिक्रिया ग्रामीण भारत और कृषि क्षेत्र में व्याप्त असंतोष की उस गहरी परत को उजागर करती है, जो सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच की खाई को दर्शाती है।

राकेश टिकैत ने बजट की बारीकियों पर सवाल उठाते हुए सबसे पहले किसान सम्मान निधि का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि बढ़ती महंगाई और खेती की बढ़ती लागत को देखते हुए किसानों की यह पुरजोर मांग थी कि सम्मान निधि की राशि को बढ़ाकर 12,000 रुपये प्रति वर्ष किया जाए। किसानों को उम्मीद थी कि सरकार चुनाव से पहले या ग्रामीण संकट को देखते हुए इस वित्तीय सहायता में बढ़ोतरी करेगी, लेकिन बजट में इस पर चुप्पी साधे रखी गई। टिकैत के अनुसार, 6,000 रुपये की मौजूदा राशि आज के समय में खाद, बीज और डीजल के दामों के सामने ऊंट के मुंह में जीरे के समान है। उन्होंने सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि सरकार वास्तव में किसानों की आय दोगुनी करना चाहती है, तो वह ऐसी प्रत्यक्ष वित्तीय सहायता बढ़ाने से क्यों पीछे हट रही है।

बजट में कुछ विशिष्ट फसलों जैसे अखरोट और चंदन की खेती को बढ़ावा देने के जिक्र पर भी टिकैत ने तंज कसा। उन्होंने कहा कि बजट भाषण में पहाड़ी राज्यों और कुछ खास किस्म की फसलों का नाम लेकर वाहवाही लूटने की कोशिश की गई है, लेकिन सरकार को यह बताना चाहिए कि देश का आम किसान, जो गेहूं, धान, गन्ना और मोटे अनाज उगाता है, उसे इस बजट से क्या मिला? उन्होंने सवाल किया कि क्या अखरोट और चंदन जैसी फसलों के उल्लेख मात्र से उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और बिहार के उन करोड़ों किसानों का भला होगा जो न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के लिए दर-दर भटक रहे हैं। टिकैत ने आरोप लगाया कि सरकार मुख्य मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए इस तरह के प्रतीकात्मक प्रावधान करती है जिनका जमीनी स्तर पर कोई व्यापक प्रभाव नहीं होता।

किसानों के सबसे बड़े और सबसे पुराने मुद्दे यानी एमएसपी गारंटी कानून पर भी राकेश टिकैत ने सरकार को घेरा। उन्होंने बेहद तल्ख लहजे में कहा कि जब तक एमएसपी को कानूनी जामा नहीं पहनाया जाता, तब तक किसी भी बजट का कोई अर्थ नहीं है। उन्होंने कहा कि किसान केवल कागजी आंकड़ों और सर्वेक्षणों की विकास दर से संतुष्ट नहीं होने वाला है। उसे अपनी फसल का वाजिब दाम चाहिए। टिकैत ने चिंता जताई कि इस बजट में भी एमएसपी को लेकर कोई ठोस कानूनी ढांचा तैयार करने का संकेत नहीं दिया गया है, जो यह दर्शाता है कि सरकार अभी भी कॉर्पोरेट घरानों के हितों को किसानों के हितों से ऊपर रख रही है।

भाकियू नेता ने बजट की भाषा और उसके क्रियान्वयन पर भी गहरा संदेह व्यक्त किया। उन्होंने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि दिल्ली के वातानुकूलित कमरों में बैठकर बनाए गए बजट कागजों पर तो बहुत सुंदर और प्रभावी लगते हैं, लेकिन जब ये योजनाएं गांव की पगडंडियों तक पहुँचती हैं, तो इनका दम निकल जाता है। टिकैत ने कहा कि सरकारी दावों और वास्तविक लाभ के बीच एक बहुत बड़ा अंतर है। उनके अनुसार, बजट के आंकड़ों में दिखाई गई चमक से किसानों के घर का अंधेरा दूर नहीं होने वाला है। उन्होंने सरकार को चेतावनी दी कि यदि जमीनी स्तर पर नीतियों में सुधार नहीं किया गया और क्रियान्वयन की खामियों को दूर नहीं किया गया, तो कृषि संकट और गहरा जाएगा।

शिक्षा के क्षेत्र में बजट के प्रावधानों पर भी टिकैत ने ग्रामीण नजरिए से चिंता जताई। उन्होंने कहा कि इस बजट में निजी स्कूलों और निजी शिक्षा तंत्र को बढ़ावा देने की जो मंशा दिख रही है, वह बेहद खतरनाक है। राकेश टिकैत ने आशंका व्यक्त की कि निजीकरण की इस अंधी दौड़ में सरकारी स्कूल धीरे-धीरे बंद होने की कगार पर पहुँच जाएंगे। उन्होंने तर्क दिया कि ग्रामीण क्षेत्रों के गरीब और किसान परिवारों के बच्चे सरकारी स्कूलों पर ही निर्भर हैं। यदि सरकारी शिक्षा व्यवस्था कमजोर होती है, तो इसका सीधा और नकारात्मक प्रभाव गांव के बच्चों के भविष्य पर पड़ेगा। उन्होंने इसे शिक्षा के बाजारीकरण की दिशा में एक कदम बताया, जो ग्रामीण भारत को और पीछे धकेल देगा।

राकेश टिकैत का यह बयान केवल एक बजट प्रतिक्रिया नहीं है, बल्कि यह आगामी समय में किसान आंदोलन की नई दिशा का संकेत भी माना जा रहा है। मुजफ्फरनगर के किसान गलियारों में टिकैत की बातों को बड़ी गंभीरता से सुना जा रहा है। उन्होंने साफ कर दिया है कि भारतीय किसान यूनियन चुप नहीं बैठेगी और बजट की इन खामियों को लेकर गांव-गांव जाकर किसानों को जागरूक किया जाएगा। टिकैत ने सरकार को याद दिलाया कि देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ किसान है, और यदि रीढ़ ही कमजोर रहेगी तो विकसित भारत का सपना कभी पूरा नहीं हो पाएगा।

अंततः, चौधरी राकेश टिकैत ने अपनी बात समाप्त करते हुए सरकार से आग्रह किया कि वह केवल बड़े शहरों और निजी उद्योगों के विकास तक सीमित न रहे। उन्होंने मांग की कि बजट में ऐसे संशोधन किए जाएं जो सीधे तौर पर ग्रामीण बुनियादी ढांचे को मजबूत करें और किसानों को उनकी मेहनत का सही मूल्य दिला सकें। किसान सम्मान निधि में बढ़ोतरी और एमएसपी गारंटी कानून की मांग को लेकर टिकैत ने एक बार फिर आर-पार की लड़ाई का आह्वान किया है।

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